पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआदि पर्व ] पृथ्वीराजरासो । ३६
सर्वै देव इच्छि वास । तिव्य लब्धै रिषि स्वव्वं ॥
विप्र ब्रज वर वच्छि । सु गुन गंध्रव सव कव्त्रं ॥
किन्नरच्च क्रम सुत धर्म धर । सुरति मान सज्जैति सिर ॥
हरि ब्रह्म ईस संवास सच । जो आक्रम चि इक्क गिर ॥
छं० ॥ १८० ॥ रू० ॥ ८३ ॥
॥ और वहां आगे वाल्मीक ऋषित्व को प्राप्त हुवे हैं ॥
पद्धरी ॥ रमनीक ठाम वाचिष्ट राज । तहां वसहि देव देवच्च विराज ॥
इच्छि थान पुव्व क्रत युग प्रमान । रिषि कियो तप्प जर्जित विधान ॥ १८१ ॥
वाल्मीक वीर इक्क वधिक रूप । अति पाप क्रंम आघात कूप ॥
भंजै सु मग्ग तिन भ्रम्म थान । पायौ सु हरिय दरसन विधान ॥ १८२ ॥
चित संप चक्र गद्द पदम वाहु । तन स्याम सुभित पीतच्च प्रबाहु ॥
दिप्प्यौ सु लछी तन रूप सील । कीनी बह तन तिन निसप ढील ॥ १८३ ॥
आयौ सु दिट्ठ गोविन्द वीर । जानी न पुव्व भ्रम्मह सरीर ॥
द्विति दिप्पि दिट्ठ कामच्च कद्दूर । विंक्यो सु पाप मध्यां सम्मूर ॥ १८४ ॥
तव आय रिप्प उपदेस दीन । किचि काज इच्छां यह क्रंम कीन ॥
अग्नी रु बंध तिय मात पुत्त । वंटहि कि पाप पापच्च सजुत्त ॥ १८५ ॥
तिच्छि जाइ कह्यौ वर भीन्न मान । वंक्यौ न पाप किन अंग थान ॥
लग्ग्यौ चरन्न कर धनुष तोरि । आघात घात बानी सजोरि ॥ १८६ ॥
व्याघात नाम सो वधिक थान । भ्रम भ्रग्यौ इक्क वहूक्रच्छ निधान * ॥
छं० ॥ १८७ ॥ रू० ॥ ८४ ॥
गाथा ॥ यों कत्थियं रिषि राजं । तुम कोइ दिवस भ्रमन करि अध्यं ॥
फुनि हम दरसन प्रापं । सध्यं गुर मंच दे कानं ॥
छं० ॥ १८८ ॥ रू० ॥ ८५ ॥
८४ पाठान्तर :- जु । धर्म । दर्शन । लछि । वीर । धर्मह । धरमह । विंक्यौ । मथांस ।
भूर । रिपि । दृट्ठां । रह्वां । क्रम । त्रिय । पुत । संजुत । चरन । तोरी । भ्रग्यो । इक । वृक्ष ।
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८५ पाठान्तर :- कोई । प्रमं । ससथ्य । मरा । मरा । गहिय । भट्टै । अब । अबयो ॥