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पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

पृष्ठ 60, कुल 470 में से

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पृष्ठ 60

आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासो । ४५
॥ प्रमथाधिपति ने आनन्दित होकर वर मांगने को कहा ॥
दूहा ॥ आनंद्यो प्रमथाधिपति । वर ! वर ! बंद्यौ बानि ॥
रिषि संगहु उतकंठ मन । सोइ समप्यौँ आनि ॥
छं० ॥ २१८ ॥ रू० ॥ ११३ ॥
॥ वशिष्ट ऋषि का नंदगिरि को अचल करने का वर मांगना ॥
दूहा ॥ फिरि रिषि जंप्यौ संभु सों । जो तुट्ठो मुझ भास ॥
नग चलंतौ अचल करि । पुनि सज्जौ सिर वास ॥
छं० ॥ २१९ ॥ रू० ॥ ११४ ॥
सो आबू गिरि राज गुरु । सुर गिर सम सैलास ॥
त्रिपथ नाम मुनि देव का । वसि रु कियो कैलास ॥
छं० ॥ २२० ॥ रू० ॥ ११५ ॥
॥ महादेव का पर्वत को अचल कर उसमें अचल
नाम से विराजना ॥
कवित्त ॥ तब सु ईस मन मुदित । पानि चंप्यौ गिर गौरव ॥
अचल अचल्ल कहि अचल्ल । भयौ अचलेस नाम तब ॥
सुथिर भयौ नग नंदि । अप्प सिर वास सु सज्यौ ॥
उभय आय तिहि थान । सगन प्रमथाधिप रज्यौ ॥
गिरि नंद नाम हेमल्ल सुतन । अर्बुद नाग सु मिच मन ॥
तिहि नाम त्रिविध भय तिध्य हर । पारस अप्पन अर्थ तन ॥
छं० ॥ २२१ ॥ रू० ॥ ११६ ॥
कवित्त ॥ अचल नाम कहि अचल । अचल विद्या अभ्यासिय ॥
अर्बुद गिरि थिर धरम्यौ । बियौ बानारस बासिय ॥
वष्टित नाम इक वरष । मुक्ति खंभेति जगत गुर ॥
इच्छत नाम इक दीह । करै उपवास सोइ नर ॥
११३-११५ पाठान्तरः-प्रथमाधिपति । बानी । समप्योँ ॥ ११३ ॥ मोँ । तुठो । भग्न पास ॥ ११४ ॥
गुरुं । सं० १६४७ की में "मुदगिर सम सैलास" और सं० १७१० की में "सुर गिर सम सैलास" और
सं० १८५६ में "मेरु समल सैलास" पाठ हैं ॥ त्रिपथा । ताप । सुनि वसि । रुकियौ ॥ ११५ ॥
११६ पाठान्तरः-अच । प्रथमाधिपं । रंज्यो । नम । तिद्य । अथि ॥