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पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

पृष्ठ 59, कुल 470 में से

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पृष्ठ 59

४४ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व
॥ वशिष्ठ के वचन सुन महादेव का प्रत्यक्ष हो वर
मांगने को कहना ॥
चौपाई ॥ सुनि मुनि बचन ओद मन ईसं । आय धरौ रह्यौ उद्दरि सीसं ॥
बर ! बर ! वानि जानि मंन अंग्गहु । जंपद्धि ईस आस जिहि जग्गहु ॥
छं० ॥ २१३ ॥ रू० १०८ ॥
मंगहु मुनि सज्जन गुन गुन बर । चलै कित्ति जित्ती जिहि धुर घर ॥
ता कित्ती मुकतीह खों खिज्जै । ब्रह्मासन आसन डोखिज्जै ॥
छं० ॥ २१४ ॥ रू० ॥ १०९ ॥
॥ ईस का स्वरूप देख ऋषि का मुदित होना ॥
चौपाई. ॥ देषि सरूप ईस मन उम्मदि । जै जै जीव धन्य वानी बदि ॥
गौर कपूर तेज तन उद्दित । रिषि रोमांचित तब मन मुदित ॥
छं० ॥ २१५ ॥ रू० ॥ ११० ॥
मुदित मन उद्दित तन भारी । धरि बैकुंठ ईस मनचारी ॥
अर्बुद गिरि धरि ध्यान सु ईसं । करै काल तिहि काल जगीसं ॥
छं० ॥ २१६ ॥ रू० ॥ १११ ॥
॥ वशिष्ठ ऋषि का महादेव को नमस्कार करना ॥
साटक ॥ त्रैनैनं चिजटेव सीस चितयं । चैरूप चोसूलयं ॥
चदेवं चिःदसा चिभू चिगुनयं । चीसंधि वेदत्रयं ॥
चैरग्निं चयलच्छि काल चितयं । ग्रामं चयं चैवयं ॥
गंगा चै त्रिपुरारि भासित तनुं । सोयं नमः संभवे ॥
छं० ॥ २१७ ॥ रू० ॥ ११२ ॥
१०८-१०९ पाठान्तरः-मंगहुं । जगहुं ॥ चलै और कित्ति शब्दो के बीच में "ई" शब्द का पाठ
सं० १६४७ की पुस्तक में नहीं है और इधर के समय की लिखित पुस्तकों में है । धुर धुर ।
कीती । मुक्तीह ॥
११०-१११ पाठान्तरः- उमदि । गौरक । पूर ॥
११२ पांठान्तरः-निजटेवसीस । त्रयलच्छिकालं । त्रितयंयाम ॥