पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआदि पर्व ] पृथ्वीराजरासो । ५१
॥ वशिष्ठ का चाहुवानजी को उत्पन्न करना ॥
कवित्त ॥ अनल कुंड किय अनल । सजि उपगार सार सुर ॥
कसन्नासन आसनह । मंडि जग्योपवीत जुरि ॥
चतुरानन स्तुति सह । संच उच्चार सार किय ॥
सु करि कमंडल वारि । जुजित आव्हान थान दिय ॥
जा अग्नि पानि अव अहुति जजि । भजि सु दुष्ट आव्हान करि ॥
उपज्यौ अनल चहुवान तब । चव सु बाहु असि बाह धरि ॥
॥ छं० ॥ २५५ ॥ रु० ॥ १३२ ॥
दूहा ॥ भुज प्रचंड चव चार मुख । रक्त ब्रन्न तन तुंग ॥
अनल कुंड उपज्यौ अनख । चाहुवान चतुरंग ॥
॥ छं० ॥ २५६ ॥ रु० ॥ १३३ ॥
॥ ऋषियों का चाहुवानजी का स्वरूप देख कर उन को
चाहुवान कहना । उन को राक्षसों से युद्ध करने की शक्ति देने
को आशापूरा देवी का स्मरण करना । देवी का प्रत्यक्ष होकर
चाहुवान जी को राक्षसों से युद्ध करने में सहायता देना । राक्षसों
का रसातल को जाना। देवी का चाहुवान जी को अपनी कुल
देवी मानने की आज्ञा करना और उन का अपने वंश भर की
कुल देवी मानना स्वीकार करना । देवी का उन को वर देकर
पधारना । वशिष्ठ का चाहुवान जी को आशीर्वाद देकर अन्य
अनलों का वर्णन करना और दुर्वासा को शाप देकर पठाना ॥
वाधा ॥ उपज्या अनल अनूपम रूपं । नहि आकृति अवर नर दूपं ॥
अंन अभूत सु उन्नत जिष्टं । वंदन भर कि बइ मनु पिष्टं ॥ छं० ॥ २५७ ॥
१३२ पाठान्तरः-अनलकुंड सजि । मंडि । जज्ञोपवित । आह्वान । नाजाने । आबद्दान ।
उपन्यो । चहुआन ॥ पुरातत्त्ववेत्ताओं के स्मरण में रहे कि प्रायः यह कहा जाता है कि अग्निकुलों
की कब उत्पत्ति आबू पर हुई उस का कोई पौराणिक प्रमाण भी नहीं मिलता । अतएव हम एक
यह प्रमाण विदित करते हैं कि कालिंदिका प्रकाश नामक ग्रंथ में पुराणोक्त यह श्लोक लिखा हैः-
श्लोक ॥ दूषयिष्यन्ति यवना, स्सहस्राब्दे गते कलौ ।
तदा रक्षां करिष्यति, याज्ञिकाः क्षत्रियर्षभाः ॥
१३३ पाठान्तरः-रत । ब्रन । बच ।