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सर्वकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

पृष्ठ 61, कुल 470 में से

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पृष्ठ 61

बाना रभंति बारानसिय । आबू अर्बुद उद्दरिय ॥
जट विकट जाल विब्भूति रँग । सुरग मुकति ढिग ढिग फिरिय ॥
छं० ॥ २२२ ॥ रू० ॥ ११० ॥
॥ आबू को अचल देख कर वशिष्ट का प्रसन्न होना और अन्य
ऋषियों को वहां यज्ञ के लिये बुलाय जप तप
और वास करना ॥
पद्धरी ॥ अग अचल दिषि वाशिष्ट रिष । मन मुदित भयौ सम आय सिष ॥
छर वासदेव सब गुन समान । आबरन रिद्धि चित चिंतं थान ॥ २२३ ॥
आभासि सिष गौतमह तथ्य । आचर्यौ वास अनि रिष सथ्य ॥
आभासि रिष अनेक ताम । संबोधि बोलि पृथु पृथुक नाम ॥ २२४ ॥
देवलह असित अंबावि सूत्र । सौमिच सर्प्प माली विभूत्र ॥
मह मक्षन सनक जैनेय पैल । दाखभ्य वक्र सुमंत औल ॥ २२५ ॥
दीपाय कित शूलंसि राय । तैतरिय जश्ववक्री सुताय ॥
जैमनिय ध्रुव्व वैसंपयान । घर्षनह लोम असुहोच जान ॥ २२६ ॥
मंडव्य अरति कौसिक्कं दाम । उष्णीष चिवन पर्नाद वाम ॥
घटजात सुबल मोजायनेय । बकवाक परासर वायवेय ॥ २२७ ॥
सचिवाक जात क्रन क्रन्न माख । सनिवाक क्रिताश्रम सुचि पाख ॥
सिषि वांसु पर्षत पारिजात । अगस्ति मारकंडे सुभाति ॥ २२८ ॥
पाविच पानि सर्वेन्य रम्य । किरनाषकेत अगु सेष सभ्य ॥
जंघावं भालकी कोप वेग । गालम हरीय ब्रह्म अगेग ॥ २२९ ॥
कौडिन्न बंध माखी सनक्कु । सानंद सनातन कत्त वक्कु ॥
सांडिल्ल करक वाराह पंग । कौमार अश्व हय घोष मंग ॥ २३० ॥
वेनीय जघन जघ नासकेत । कन्हं कलाप वकीव सेत ॥
अष्टाचवक्र उद्दालकेय । च्यवनह कपिल मातंग जेय ॥ २३१ ॥
११० धयौ । बीयो । लभ्यौ । तिजगत । वानार । भंति । वानारसीय । उद्धरीय । मुति ॥
११८ पाठान्तरः-दिषि । वाशिष्ट । सिष । आचर्य्यौ । प्रिथक । अंकवा । विसूत्र । सप्प । ध्रुव । हरष ।
नह । मंडप । कौसिक । उष्णीक । पनदिवाम । घट । जात । बाल । वाक । बालजाक । वाय । वेय ।
सचि वाक । क्रच । क्रनमाल । सनि । वाक । क्रिताश्री । सिषि । वांस । पर्वत । भाल । की । गालं ।
महि । रिय । कौंडिन । सांडिलं । वेनी । जय । घन । घना । सकेत । कन्ह । वसेत अष्टाह ।