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पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

पृष्ठ 62, कुल 470 में से

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पृष्ठ 62

४८ पृथ्वीराजरासो। [ आदि पर्व
॥ यज्ञ का अनुष्ठान सुन कर राक्षसों का एकत्र हो आना ॥
दूहा ॥ जंचकेत दानव दुसह । अरु रषस धुमकेत ।
अप्प सथ्य लीने सकल । आए दुष्टह छेत ॥
॥ छं० ॥ २४३ ॥ रु० ॥ १२१ ॥
॥ ऋषियों का अनलकुंड रचन कर ब्रह्म कर्म प्रारंभ करना ॥
कवित्त ॥ आबू करि रिषि जग्ग। मंच कारन सु मंच जपु ॥
पंड हत्थ नर उंड। अष्ट अंगुल ऊर्द्ध वपु ॥
इय्य तीन अरु अट्ट । मंडि चक्कून समा सम ॥
खप्प समति सम फियौ। फनति बच्यौ देव क्रम ॥
अगिनेव थान अगिनेव धर। बाय कुंड दच्छिन दिसा ॥
नैरत निवर्त धज मंडि कै। ब्रह्म क्रम्म खग्गे रिसा ॥
॥ छं० ॥ २४४ ॥ रु० ॥ १२२ ॥
॥ दैत्यों का ऋषियों के यज्ञ में विघ्न करना ॥
कवित्त ॥ पंच पर्व्व जग्योपवीत । पंच पर्व्वी अधिकारिय ॥
देवो मुनि दुजराज । वैश्य शूद्रह चितकारिय ॥
चर विडाख पशु म्लेच्छ । क्रम चंडाल पंड करि ॥
इह प्रमान दस (विधि*) सुक्रम । जग्ग मंडे सुमंडि हरि ॥
दानव सु दुष्ट दुष्टंसु क्रम । दुष्ट मूच वरिषा करै ॥
पसु मंस रुधिर नंषै सु जल । क्रम विप्र संसुह डरै ॥
छं० ॥ २४५ ॥ रु० ॥ १२३ ॥
वै वेदी वै विप्र। गीत गांयच मंच जप ॥
ता मंझो घन विघ्न । करै आरिष्ट असुर कुप ॥
१२१ पाठान्तर :-यंत्रकेत । राषेस । धुम्रकेत । अप । सथ । अहेत ॥
१२२ पाठान्तर :-आब्बु । रिष्षि । तप । हथ । वर । उरद्ध । वप । अट्ठं । संमंति । खप ।
कीयो । वंचयो । अगिनेव । आगे । नेव थान । अगि । नेव । बाइ । कुंड । दषिन । किसा । रसा ॥
१२३ पाठान्तर :-जग्योपवीत । जुग्योपवीत । सं० १६४७ और १७७० की पुस्तकों में यह पाठ
है "इह विंधि प्रमान दस विधि सुक्रमं"। जंग । जग । सुमंडि । सुदुष्ट । दुष्ट । सुझम्म । वसु ।
मंसु । सुज़ल । कर्म । समुह ॥ (विधि *) विशेष है ॥
१२४ पाठान्तर :-गाइचं । मंडय । मंडे । पर्वत हलावे । मोहिनी । रूप कबाइक धरै ।
नट्टहिं । कबक्क । वै । "वै हथिन तालि न धरै" भी सं० १६४७ की में पाठ है । हरथ्यै ।