पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआदि पर्व ] पृथ्थीराजरासौ । ६१
॥ आना राजा का जन्म होना और उन का बालपन ॥
भुजंगी ॥ धरै गौर जन्मं आनल्ल राजं । बसे देव गामं दुनी कुच बाजं ॥
नवं वृत्त नित्तं नवं वृत्त सिष्यै । नरं तार तारं नवं स्रत्त भिष्यै ॥ छं० ॥ ३१० ॥
चरं संभरी वात पुच्छंत मित्तं । धरै ध्यान दिष्यै अजमेर चित्तं ॥
कला स्त्रव्व सिष्यंमछा मल्ल वीरं । गिनै मग्ग ओसं पढै मंच धीरं ॥ छं० ॥ ३११ ॥
दिनं सीह अण्वीह आखेट षिखै । ननं नेह निद्रा सुरं सिद्ध मिंखै ॥
करं पाइकं विह्न साइक्क नष्य । भरं भै अभैनं सुयं सव्व रख्यै ॥ छं० ॥ ३१२ ॥
वधै काम कामं अलीहो न भष्यै । सुमै राजसं तामसं सत्त चष्यै ॥
रवै जम्म सेना ग्रहै जम्म भारी। सुई संभरी वात दिष्यै करारी ॥ छं० ॥ ३१३ ॥
कव्है काल कालं अकालं ति बंधै । द्रुतं जोर मा वित्त सौं चित्त संधै ॥
दुच्चं वाच परचंड दुग्गं सरूपं । इसो दिष्यियै राज आना अनूपं ॥
छं० ॥ ३१४ ॥ रू० ॥ १४५ ॥
कवित्त ॥ अति बल बंड प्रचंड । हिंड आखेटक षिखै ॥
घिरन रोज वाराह । बंधि वागुव वर मिखै ॥
वन परवत्त झिरना । निवान (राइ *) राजन सँग हिँडै ॥
राग रंग (भाषा *) कवित्त । दिव्य वानी चित्त संडै ॥
हय हत्थिय देय संकै न मन । षग्ग मग्ग पूनी चढै ॥
चहुआन वंस अवतंस दूम । रंग अनेक आना रचै ॥
॥ छं० ॥ ३१५ ॥ रू० ॥ १४६ ॥
१४५ पाठान्तर :-आनल्ल । वृत्त । नितं । बूत । भृत । बान । पुछंत । सेतं । चितं । सब ।
सिषं । सिपं । महामल्ल । गिनी मंगि आमें । औमें । अवीह । सिद्धं । पायकं । साइकं । नंष्ये ।
भरंभे अभैन सोई सब्व रख्यै । भरं भय भैनं सोई सब्वं रप्ये । भरं भेअभैनं सोयं सब्ब रख्यै । वधे ।
लीहो । होन । सत्तं । चषै । जमं । ग्रहे । जम । सोई । साई । सोइ । संभरि । तिबंधे । जो ।
रभावित्त । सों । दुर्गा । दिंषियै । अनूप ॥
इस रूपक से कविने आना राजा के जन्मादि की कथा वर्णन करना प्रारंभ किया हैं ॥
१४६ पाठान्तर :-राहू । संगे । हिंड़े । कवित्तं । संपै । रंगा । (राइ *) (भाषा *) विशेष हैं ॥