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पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

पृष्ठ 57, कुल 470 में से

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पृष्ठ 57

४२ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व
प्रविस कियो गारत्त गिरि । जय जय वचन सरीर हुअ ॥
भै मग मगन सुतन सब्वे सु गिरि । उवरन्नौ नाक सुनाग धुन्न ॥
छं० ॥ १८८ ॥ रु० ॥ १०२ ॥
॥ बिल का पुर जाना और पुष्प वृष्टि सहित जैजैकार होना ॥
दूहा ॥ उबरन्नौ नाक सु नाग धुन्न । दिव अस्तुति परमान ॥
पुष्प वृष्टि इच्छां करिय । जय जय बंधौ तान ॥
छं० ॥ १८९ ॥ रु० ॥ १०३ ॥
॥ नग का हिलना ॥
दूहा ॥ गात सकल गिरि जात को । सब बूड्यौ सम नाग ॥
उबरि नास सैलह तहां । सो हलची बिन लाग ॥
छं० ॥ २०० ॥ रु० ॥ १०४ ॥
॥ नग के हिलने से वशिष्ट चिंता कर ईश आराधन करने लगे ॥
दूहा ॥ नास सुद्दल हल्ल्यौ सुनग । उर अति चिंता जग्ग ॥
अति आतुर वाचिष्ट रिषि । ईस अराधन लग्ग ॥
छं० ॥ २०१ ॥ रु० ॥ १०५ ॥
॥ वाचिष्ट ऋषि ने महादेव का यह आराधन किया ॥
खाटक ॥ ईसंजा गिरिजानने वगरयं । उच्छंग मातंगिनी ॥
चर्मेजा वड्जामवंत जलजं । बुंदं तयं उज्जलं ॥
रख्यं जारति कर्न कामति मलं । दल्यंति तीयं पुरं ॥
त्रिपुरारिं तन तुंग तारन गुरं । जैजै हरं ईसयं ॥
छं० ॥ २०२ ॥ रु० ॥ १०६ ॥
उच्चरि । अगै । पच्छ । संपन । तथ ॥ इस की अंत की तुक का पाठ किसी २ पुस्तक में “भू मग
सुतन सबै सुगिरि । उवस्यौ नाक सु नाक धुन्न” है ॥
१०३ पाठान्तरः-उबयौ । नाक । हयां ॥
१०४ पाठान्तरः-यह रूपक सं० १६४७ की पुस्तक में नहीं है और जब तक कि वह इस
से भी प्राचीन पुस्तक में नहीं मिले तब तक उस को क्षेपक नहीं कह सक्ते । सोह । लह्यो । बुड्यौ ॥
१०५ पाठान्तरः-नाग । वाशिष्ट । आराधन । लग ॥
१०६ पाठान्तरः-उद्धंग । छलजं । जलदं । रिपं । करन । दलंयंति ॥