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पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

पृष्ठ 66, कुल 470 में से

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पृष्ठ 66

आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासौ । ५३


बाहै आवधि सकती सारं । घर आवहि पडै धर भारं ॥
सह्ने धुमरकेत सकतीयं । जंचकेत चहुआन (सु*) छतीयं ॥ छं० ॥ २६५ ॥
अद्द सु रप्पस दानव तद्दे । गए रसातल नट्ठे चद्दे ॥
देवी आइ अनल्लच पासं । जंपी तथ्य प्रसन्नी तासं ॥ छं० ॥ २६६ ॥
आसापूर कद्दै मो नामं । पुज्जै पुत्र पौत्र परिनामं ॥
कुलह गोत्र मुख्य थप्यै नामं । अप्पों रिद्धि अचल्लच तामं ॥ छं० ॥ २६७ ॥
धास्यौ सिर लै कर चहुवानं । ब्रह्महु वंस अंस जस मानं ॥
जीति अप्य देवी चहुआनं । दिय वर दान गई असमानं ॥ छं० ॥ २६८ ॥
गइ असमान कियौ सद् भारी । धुं! धुं! कार नै! जया सारी ॥
है! है! करि हं! हं! चहुआनं । अनल कुंड उपजे परिमानं ॥ छं० ॥ २६९ ॥
चौ मुष्यौ चौ वेद प्रकारं । जैसो मुख देख्यौ अधिकारं ॥
वेदं स्याम अथर्वन रूपं । रिगु जिजु वेद देव गुन नूपं ॥ छं० ॥ २७० ॥
चित्त चंमकार 'चिहूं दिसि जगिगय । पढत ताव्हि ब्रह्मांड सु जग्गिय ॥
बानी धुनि मुनि हरषि वसीसं । वर वचिष्ट तहां दई असीसं ॥ छं० ॥ २७१ ॥
तोचि वंस हांइ कुंडल धारी । जनु कि अर्क राका विस्त्तारी ॥
थुति करि सेव देव तिच्छि पानं । जै जै तप्प जिते चहुवानं ॥ छं० ॥ २७२ ॥
परिचरि वीर वीर नर केकं । तिच्छि चालुक्क भयौ गुन मेकं ॥
परचरि वर पावार ति वारं । क्रोध रूप जाजुल्य निधारं ॥ छं० ॥ २७३ ॥
जाजुल्लति परिचार न दिष्यौ । र्भिज करि विप्र पौरि तह रष्यौ ॥
तिन कारन वाचिष्ट रिषीसं । अर्बुद नाम गिरि नंद जगीसं ॥ छं० ॥ २७४ ॥
ता ऊपर दुरवासा आए । दै सराप वाचिष्ट पठाए ॥
अव वे दानव दुष्ट सु दाषै । तो रष्या चव कुली सु राषै ॥ छं० ॥ २७५ ॥
वंस छतीस गनीजै भारी । च्यार कुली कुल तिन अधिकारी ॥
सब सु जात जोनी मग दिष्यिय । ए ब्रह्मा अविसेष विसिष्यिय ॥
॥ छं० ॥ २७६ ॥ रू० ॥ १२४ ॥


चिहू । पढ । हरपिव । सीसं । वशिष्ठ । रासा । तप । नरकेकं । तिवारं । पारहारन । तहं ।
उपर । रप्य । छत्तीस । गति । नै । जित्ती । (सु*) विशेष है ॥