पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५० पृथ्वीराजरासो । [ आदि पर्व
॥ तथापि राक्षसों का उपद्रव शान्त न होना ॥
रूखया ॥ कारयं जग्ग बंधान निंमानयं । रचियं कुंड षंडं थिरं थानयं ॥
आसनं दिव्य देवान आव्हानयं । असुरं कीन उच्चिष्ट जथानयं ॥
छं० ॥ २५१ ॥ रु० ॥ १२८ ॥
॥ तब वशिष्ट का स्वयं कुंड रचन कर यज्ञार्थ बैठना और
चिंतवन करना ॥
दूहा ॥ जब वाचिष्टह जग्ग कजि । सजि कुंडह सुभ थान ॥
तब आसुर अन संक ह्वे । किय उच्चिष्ट उतान ॥
छं० ॥ २५२ ॥ रु० ॥ १२९ ॥
कवित्त ॥ तब चिंतिय वाचिष्ठं । एह आसुर अविचारिय ॥
जग्ग जीच उच्चिष्ट । करैं कातर अव धारिय ॥
सुरन अंस संगहे । हवै नह हव्य हुआवह ॥
सो उपाव संचियै । (जो *) याहि संवरै असुर सव ॥
निम्म्यौ सु सूर संग्राम भर । अरि अलंध षंडन सु षल ॥
सम धरचि जग्ग कारन सकल । विमल सिष्ट सोमै सथल ॥
छं० ॥ २५३ ॥ रु० ॥ १३० ॥
अरिल्ल ॥ अघट घाटं रिषि दृषि निसाचर । परिसि च्यार धरि ध्यान ग्यान बर ॥
चिंतिय ब्रह्म करम किच्छि कामह । भयौ रूप रिषि ब्रह्म सुतामह ॥
॥ छं० ॥ २५४ ॥ रु० ॥ १३१ ॥
१२८ इस रूपक के छंद का नाम जो चंद ने मलयां प्रयोग किया है यह स्रग्वणी नामक
चार रणण का छंद है ॥
पाठान्तरः-बंधाननि । मानयं । रुचियं । आहवानयं । उशिष्ट ।
१२९ पाठान्तरः-वाशिष्ट । सुथांन । अनं ।
१३० पाठान्तरः-चिंतिय । जिष्ट । जिह । करै । हवै न हव्यहु आवह । संयाम । षंडं ।
समं । सैाभै ॥ (जो *) विशेष है ॥
१३१ पाठान्तरः-ईषि । निसाचरं । वरं । ब्रह्मकरम ॥ सं० १७७० की पुस्तक में "ध्यान"
शब्द नहीं है ॥