पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
अथ आखेटक चूक वर्णनं लिख्यते ॥
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( दसवां समय )
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एक वर्ष बीत गया, परन्तु शहाबुद्दीन के हृदय में
पृथ्वीराज का बैर सालता रहा ॥
दोहा ॥ वरष एक बीते कत्तच । रीस रखि सुरतान ॥
उर अंतर अग्गी जलै । चित सल्लै चहुवान ॥ छं० ॥ १ ॥ रू० ॥ १ ॥
एक महीना पांच दिन गज़नी में रह कर फिर हुसैन
का पृथ्वीराज के पास आप जाना ॥
दूहा ॥ मास एक दिन पंच रचि । बद्धि धाइ हुसैन * ॥
पग लग्यौ चौहान कै । राज प्रसन्निय वैन ॥ छं० ॥ २ ॥ रू० ॥ २ ॥
फिर पृथ्वीराज का आखेटक माड़ना और शहाबु-
द्दीन का चूक करने को आना ॥
दूहा ॥ फिरि आखेटक मंडि नृप । पहू वन घन तास ॥
दूत साधि साहाबदीं । आइ संपत्ते पास ॥ छं० ॥ ३ ॥ रू० ॥ ३ ॥
१ पाठान्तर-बीतै । सकल । रपि । सुरतांन । अंदर । अग्री । सालै । चहुवांन ॥
२ पाठान्तर-बधि । बंधि । धाय । घाइ । घाव । हुसेन । लाग्यो । चौहांन । बैन ॥
- यहां "हुसेन" से कवि का अभिप्राय हुसेन कथा नामक समय के चित्ररेखा को लानेवाले हुसेन के
बेटे ग़ाज़ी हुसेन से है कि जिसको पृथ्वीराज ने शहाबुद्दीन को हाथ पकड़ाकर गज़नी भेज
दिया था (हुसेन कथा रूपक ९३) परंतु शाह ने गज़नी पहुंचकर उसे भी क़ैद कर दिया था
सो वह जेल में कत्ल करके पीछे फिर १ महिने और ५ दिन वहां रह कर पृथ्वीराज की
शरण में आ गया ॥
३ पाठान्तर-पहू । रुत । द्री । आय । संपत्ते ॥
४२६ पृथ्वीराजरासो। [ दसवां समय २
मोतिराव क्षत्रिय का शहाबुद्धी को पृथ्वीराज
के आखेट का समाचार देना ॥
कवित्त ॥ नीतिराव षत्रीय† । चरित ग्रेहं चहुआनं ॥
दिल्ली को वर भेद । लिखे कग्गद सुविच्चानं ॥
बरष उभै षट मास । करै सुबिचान पलान्यो ॥
षहू बन घन राज । बीर आखेटक जान्यौ ॥
सामंत सूर स्थंथंन कै । बर वीरं तन षेलद्धय ॥
दैवान जुद्ध चहुआन भर । भिरि दुरजन भर ठिल्लइय ॥ कं० ॥ ४ ॥ रु० ॥ ४ ॥
आखेट का अच्छा अवसर पा कर शहाबुद्दीन का भेद लेने
को दूत भेजना, दूत का समाचार देना, शाह का
सरदारों को आज्ञा देना कि छिप कर
पृथ्वीराज पर चढाई करो ॥
दूहा ॥ इक तप पंग नरिंद कौ । अरु * सुनि अवाज सुरतान ॥
आखेटक प्रथिराज गय । षटवन चहुवान ॥ कूं० ॥ ५ ॥ रु० ॥ ५ ॥
कवित्त ॥ आखेटक बन तक्कि । दूत गज्जनैं सपत्ते ॥
साह जे,र साहाब । दिए पुरमान निरत्ते ॥
चसम छय गय मुक्कि । राज षटू बन छिल्लै ॥
सासं ब कैः सध्य । भुक्त गुज्जर दिसि मिल्ल ॥
निक्कस्यौ द्रव्य साहाब दिय । बर नागौरं ग्रेह धन ॥
ढूढ घात साचि गोरी सुबर । करौ चूक वै सज्ज रन ॥ कं० ॥ ६ ॥ रु० ॥ ६ ॥
४ पाठान्तर-ग्रेहं । चहुवांनं । कग्गर । कोपि सु । बिहांत । पलांत्यो । षटू । जांत्यौ ।
सथहं । संयं। कौं । कौ । बेलर्दय । दैवांन । दैवानं । चहुत्रांन । दुजन । ठिल्लइय । ठिल्लर्दय ॥
† नीतिराव षत्रिय नामक मुख़बिर था कि जो पृथ्वीराज के यहां की खबरें शहाबुद्दीन
को दिया करता था । वाह यह कैसा देशहितैषी पुरुष था ! ! !
५ पाठान्तर-कों * अधिक पाठ है ॥ सुरतांन । पृथ्वीराज । षटू । चहुवांनं ॥ † यह रूपक
सं० १६४७ की प्रति में नहीं है ॥
६ पाठान्तर- गजनै । संपत्ते । दीए । फुरमांन । षटू । बिल्लै । सथ । भुझ । गुजर । मिल्लै ।
दूध । दी । नागौर । सजि ॥
दसवां समय ३ ] पृथ्वीराजरासो । ४२०
हाजी खां आदि का तयारी करना ॥
चौपाई ॥ काषेटक बहू चहुवानं । कहैं पूत से मुप सुविधानं ॥
हाज़ी षां गप्पर सुकनाजी । मंझौ चूक महमद गाजी ॥
छं० ॥ ७ ॥ रु० ॥ ७ ॥
शहाबुद्दीन का आज्ञा देना कि इस बात का भेद लो
कि कितनी सेना चौहान के साथ है क्योंकि
बिना भेद कुछ काम नहीं बनता ॥
कवित्त ॥ सें बुझै सुरत्तान । दूत पच्छिम सुविधानं ॥
काषेटक प्रथिराज । सथ कित्तक चहुआनं ॥
तुम राजन निमांन । राज विवेक परषौ ॥
तुम * स्वामी भ्रम दृग स्वामि । स्वामि द्रोही तन जष्यौ ॥
जंगली नृपत्ति जंपहु चरित । छल बल मंत सु किज्जियै ॥
ततार षांन षुरसान षां ॥ हिंदू भेद सुविज्जियै ॥ छं० ॥ ८ ॥ रु० ॥ ८ ॥
कवित्त ॥ भेदं दुग्ग भंजियै । भेद दुज्जन दल भंजै ॥
राजभेद बंधियै । भेद देवन ग्रह रंजे ॥
मंच सोइ जिन भेद । भेद बिन मतौ न होई ॥
भेद बंध वन सोइ । सेद देषै सब कोई ॥
संग्रहौ भेद चहुआन कौ । मुष उच्चार जो जंपियै ॥
तत्तारषांन षुरसान षां । बज्चन दुज्जन चंपियै ॥ छं०॥ ९ ॥ रु०॥ ९ ॥
सब सरदारों का मत होना कि बिना धोखा दिए
चौहानों को जीतना कठिन हैं ॥
कवित्त ॥ चहुआन जम वान । गेनं सुक्कंतें सुकुहै ॥
कुटिल दिष्ट जिहिं फिरै । तेज अरियन दल षुहै ॥
८ पाठान्तर-बुझैं । सुरतांन । सें बुझै साहाब । साह पच्छिम सुरतांनं ॥ प्रथौराज । सथ
क्रितक । केतक । चहुवांनं । विवेक । परखौ । * अधिक पाठ है ॥ स्वामि । द्रूग । स्वामि ।
सामि । जह । लषौ । ततार । षुरसांन ॥
९ पाठान्तर-दुगं । भांजीयै । दुजन । बंधीयै । गृह । सोई । सोय । देखे । चहुवांन ।
जंपीयै । ततार । पुरसांन । दुजन । चंपीयै ।
४२८ पृथ्वीराजरासो । [ दसवां समय ४
प्रबल तेज अस तेज । जुद्ध दैवान देव गति ॥
एक लष लेषिये । एक लषिये लषन भति
इच जानि चूक चिंत्यौ नृपति । इच्छे बत्त सुविद्दान कौं ॥
तत्तार पांन निसुरत्त षां । पूकि पांन षुरसान कौं ॥
छं० ॥ १० ॥ रू० ॥ १० ॥
कवित्त ॥ षां षुरसान ततार । षान अरदास समर्पिय ॥
चूक मंडि सुरतान । थान चहुआन सुथप्पिय ॥
हाजी षां गाजी सु । बंध निज बंधी गब्भर ॥
सुब्बिद्दान साहाब । साचि स्वारं दल पष्षर ॥
निज पान षान षुरसान पति । इष्ध साचि बत्त बधियै ॥
मिलि मीर मसूरति ततं किय । चूक साचि अरि संधियै ॥
छं० ॥ ११ ॥ रू० ॥ ११ ॥
पृथ्वीराज का बेखटके आनन्द से आखेट खेलना ॥
दूह ॥ रंग रमै रजान बन । नहीं संक मन मांहि ॥
तरु बेली घन गच बरिय । सुभि जल निरमल छांह ॥
छं० ॥ १२ ॥ रू० ॥ १२ ॥
पृथ्वीराज के आखेट का वर्णन ॥
कवित्त ॥ सतह पंच दीपीय । एण फंदैत पंच सौ ॥
सहस स्वान दस डोरि । ग्रहै पंचान पंच सौ ॥
पंच अग्ग पंचास । करु चाव दिसि सज्जे ॥
कुही बाज उत्तंग । पंष आघात सुबज्जे ॥
१० पाठान्तर-चाहुआन । जमवांन । सुकतैं । नह । लष । लेषीयै । एक लेषियै । जांनि । चिंत्यौ । इच्छैं । बिद्दानं । ततार । निसुरत । पुच्छि । पुरसांन । कों ॥
११ पाठान्तर-पुरसांन । सुरतांन । यांन । चहुवांन । संबंध । सबंध । मिबंधी । गबर । सुबिद्दानं । बिद्दानं । पषर । पांन । प्रांन । पुरसांन । बंधीये । अर । संधीये ॥
१२ पाठान्तर-राजांन । लर । बरीय । निर्मल ॥
दसवां समय ५ ] पृथ्वीराजरासो । ४२६
परगोस् सिंह पंजर गुहा । धनुष धनंजय शंर घन ॥
पृथिराज राज मंडै रवनि । आखेटक पहू सु वन ॥
छं० ॥ १३ ॥ रु० ॥ १३ ॥
आठ हजार सेना और सरदारों के साथ शहाबुद्दीन
का पहूबन में छिपकर पहुंचना ॥
कवित्त ॥ पां ततार पुरसांन । पांन हाजी पां गाजी ॥
गप्पर पप्पर साह । मीर महमद पां घाजी ॥
अष्ट सहस असवार । तुंग तिय अग्ग बनाइय ॥
पेसकासी पतिसाह । कूर पर पंचन आइय ॥
सेनाह सज्जि अंदर सिखह । नह पिछै जाझें रँचह ॥
करि चूक आइ पहू वनह । प्रथीराज चहुआन जहँ ॥
छं० ॥ १४ ॥ रु० ॥ १४ ॥
सबेरे के समय चढ़ाई करने का विचार करना ॥
कवित्त ॥ दस अराक ताजीय । पंच पुरसान कमानं ॥
तक्कौ साचि गज्जनै । चिंति पहू चहुवानं ॥
छल सज्जौ बल धारि । घात नर घात निधानं ॥
लग्ग्यौ चंपि सुरतान । वैर हुस्सेनह पानं ॥
सुविद्दान आन चहुआन सौं । लै फुरमान समान धरि ॥
सुविद्वांन हिंदु पुज्जै नहीं । जमन जोर बल बहुत करि ॥
छं० ॥ १५ ॥ रु० ॥ १५ ॥
१३ पाठान्तर-तहांस । रण । एन । श्रंच । कह । धावदिसि । सजे । उत्तंग । वने ।
सीह । प्रथीराज । मंडे । वरन । पहू । स ॥
१४ पाठान्तर-पुरसांन । पांन । गयर । पपर । गाजी । सन्यह । सजि । नहिं । पिछै । रचह ।
चहुन्र्आन । जह ॥
१५ पाठान्तर-अैराक । पुरसांन । कमांनं । पहू । चहुआनं । निन्नानं । सुरतांन । हुसेन
सु पांनं । विहांन । आंन । चंडुवांन । सों । फुरमांन । विहांन । पुज्जे । नही । जवन । जोर ॥
४३० पृथ्वीराजरासो । [ दसवां समय ६
पांच सरदारों को साथ लेकर आखेट को
पृथ्वीराज का निकलना ॥
कवित्त ॥ आखेटक संभरिय । राज मेलान न आइय ॥
हस्सम हय गय मुक्कि । तक्कि षटू बन धाइय ॥
के हंका के छक्कि । तथ्थ पछिवानह लग्गा ॥
सथ्थ पंच सामंत । जूझ चहुआन विलग्गा ॥
पंमार सलष अलषह बलिय । चाहुआन रघुवंस हिम ॥
रुंध्यौ नरिंद चालुक्क सम । सिंघ विंटि वागह जिम ॥
छं० ॥ १६ ॥ रू० ॥ १६ ॥
कवि चन्द का कहना कि हमें शहाबुद्दीन के आने का सन्देह
है और खोज करने पर चारों ओर यवनों को पाना ॥
कवित्त ॥ करि बिंटिय चहुआन । बिप्र सब सस्त्र समाधिय ॥
सुब्बिचान फुरमान । बंचि कविचंद सुनाइय ॥
सुबर जोर साहाब । साह से देस सुरंगा ॥
तोन कमान प्रमान । दए दस हत्थ तुरंगा ॥
किन एक खिमा किम रषकैं । चावद्दिसि नृप विंटयौ ॥
तन तोन झारि संमुह भए । राज अदब्ब सुमिरियौ ॥
छं० ॥ १७ ॥ रू० ॥ १७ ॥
शाह की ओर से आक्रमण आरम्भ होना ॥
कवित्त ॥ चंपि लहहिय हत्थ । जमन ठट्ठे चउद्दिसि ॥
चूक चिंत चहुवान । कन्द कड्डी सु बंक असि ॥
हाजी षान गष्षर नरिंद * । षंति षग षाजि विदत्थं ॥
तेग झार विम्भार । सलष घल्ली गज्ज बत्थं ॥
१६ पाठान्तर—आईय । हसम । तकि । षटू । धाईय । तथ । पछिवानह । लगा । सथ ।
चहुवांन । बिलगा । चाहुवांन । चाहुअनि । रुध्यौ । चालुक । वाँटि ॥
१७ पाठान्तर—वंटिय । चहुआंन । सु विहांन । फुरमांन । बिंचि । साह संदेस सुरंगा ।
तोन । कमांन । प्रमान । हथ । छिमाक्किम पकरिकें । चाषदिसि । वीटयौ । अदब । मिटयौ ॥
दमवां समय ७ ] पृथ्वीराजरासो । ४३१
धरि अह अह बीसच्छ भय । जरिंग भयानक वीर सम ॥
दुहुकोह कट्ठि परि यार तें । खुद चिंति कुक्कौ विभम ॥
छं० ॥ १८ ॥ रु० ॥ १८ ॥
युद्धारस युद्ध वर्णन ॥
छंद विराज ॥ धरं धार कट्टी । घनं बीज वट्ठी ॥ रसं रोस थट्टी । सुषं मुंक भ्रट्ठी ॥ छं०॥१८॥
परै चह पही । मनौ मद जहीं ॥ उनं तेग कट्टी । जनैं वज्र टट्टी ॥ छं० ॥ २०॥
जसं दढ्ढ दही । मनौ नैन भ्रष्टी ॥ उछहे ऊछट्टी । घनं घट घट्टी ॥ छं०॥ २१ ॥
कुनालं उलट्टी । उतारंत मट्टी ॥ रटें मार मारं । सुरं आसुरारं ॥ छं० ॥ २२ ॥
परं ते पधारं । कुठारं करारं ॥ वले घाव तारं । किनारं उघारं ॥ छं० ॥ २३ ॥
इसी जुद्ध भारं । मची कूह कारं ॥ पर्यो पंच भारं । .......................
छं० ॥ २४ ॥ रु० ॥ १८ ॥
पांच सरदारों का पृथ्वीराज की रक्षा में चारों ओर हो
जाना और इन सभों का यवनों के बीच
में घिर कर युद्ध करना ॥
कवित्त ॥ पंचानन भँपंच । स्वामि ओडन थट्ट रप्पे ॥
इक्क स्वामि रन अग्ग । इक्क उभ्भे दस पिप्पे ॥
सार धार प्राछार । बीय शिय उप्पर बाहै ॥
मनौ तत्त घरियार । मेघ जल वुट्ठ प्रबाहै ॥
दनु देन जप्य गंधव्व जय । गन घथ गय उच्चार धुअ ॥
सुरतान सेन झुकि मांचि परि । धनि नरिंदं सोमेस सुअ ॥
छं० ॥ २५ ॥ रु० ॥ २० ॥
१८ पाठान्तर-हथ । यवन । ठठे । चारुदिसि । चिति चहुवांन । यां । गपर । * अधिक
पाठ है ॥ विहयं । विभ्रार । घटा । बघं । वीभक्त । भयानक । दुहुल्लाह । कठि । ते ॥
१६ पाठान्तर-छंद रसावला । घर धारं कटी । बटी । घटी । मुक्क । भ्रटी ॥ १८ ॥ परें
चटपटी । मद जटी । कली । तटीं ॥ २० ॥ दढ दढी । लैन भ्रटी । उछटी । घट घटी ॥ २१ ॥
ऊतालं । उलटी । मटी । आतुरारं ॥ २२ ॥ धाव ॥ २३ ॥ पर्यो । युद्ध ॥ २४ ॥
२० पाठान्तर- भौं । उंडन । रपं । एक । रिन । एक उभे । पपं । तीय । उपर । तत ।
बुद्धि । जरक । गंध्रव । गांन । उच्चार । सुरतांन ॥
४३२ पृथ्वीराजरासो । [ दसवां समय ८
पृथ्वीराज का कमान सँभाल कर यवन सरदारों को गिराना ॥
कवित्त ॥ चहुआन कमान । पंच लीने सुपंच सर ॥
बष्पर पष्पर सै पन्नान । असु ढयौ मीर धर ॥
दूजै बान तकंत । तक्कि भंज्यौ षां गोरी ॥
तीजै बान तकंत । साधि भंजी विय जोरी ॥
कंमान बान चवछय्य भिरि । षिजि किरवान विरान कढि ॥
कटि बीर अंग फरकं पष्हर । रह्यौ नट्ट कुट वसं चढि ॥
छं० ॥ २६ ॥ रू० ॥ २१ ॥
पृथ्वीराज का तलवार लेकर यवनों का विनाश करना ॥
कवित्त ॥ षां गाजी चहुआन । दिष्ट मरदां दो उट्ठी ॥
दंग लग्गि जनु अग्ग । घृत्त घाग घर बुट्ठी ॥
दूनों छय्य उतंग । तेग कढी दुहु बंकी ॥
मनु घन घटा मकार । बीज कुंडली झलंकी ॥
चहुआन तुच्छ ढवुर बधिय । दुरिग मीर विय सिरढल्यौ ॥
जानेकि वज्र वञ्जी सुपति । गिरनि छेद छय्यह धय्यो ॥
छं० ॥ २७ ॥ रू० ॥ २२ ॥
सुलतानी की १५५ सेना का कट कर आगे गिरना ॥
अरिल्ल ॥ सुबर स्खेन संमुख सुरतानं । धेन वच्छ परि जनु करि जानं ॥
सत्त पंच परि उप्पर पंचं । तुम्यौ सार धार करि रंचं ॥
छं० ॥ २८ ॥ रू० २३ ॥
चालुका का घोर युद्ध करके वीरता के साथ मारा जाना ॥
कवित्त ॥ जूझ मंत संभ्रूच । कूच आखेटक बज्जिय ॥
बर चालुक्क नरिंगे । चंपि चवद्दिस गज्जिय ॥
२१ पाठान्तर कमान । पंचि । सपंच । बषर पषर । पलंान । धयौ । बांन । तकि । बांन । कंमांन । बांन । हथ । किरवांन । विरांन । झुटि । फरकुप्प रह । नट ॥
२२ पाठान्तर-चहुआन । दिष्टि । दां । उठिय । अगि । घृत । बुठिय । हथ । दुहुं बंकिय । मनां । झलकिय । चहुआन । तुझ । ढठ । ढरिग । गमीर बीय शिर । सिरट्ठु । ढल्यौ जाने । हथह ॥
२३ पाठान्तर-बच्छ । ज्यनं । सत । उपर । फारि ॥
दसवां समय ६] पृथ्वीराजरासो । ४३३
'छंडि थान पच्छिवान । हंकि सैंधव झुकि घाय्य ॥
रह्यो सेन सुरतान । नेज बाजी जस धाय्य ॥
विस्साय धाय तन झंफरिय । त्रुटि पंजर वर धुक्किधर ॥
कटि घाइ ल्षप पंथा प्रगट । उड़ि हंसव संमान सर ॥
छंदं ॥ २८ ॥ रू० ॥ २४ ॥
कवित्त ॥ सोलंकी सिर मौर । रेह अनछत्त पुर रष्या ॥
दोऊ दीन पष्पर प्रमान * । कित्ति दुग्ग पप्पच भंपी ॥
धूप दीप माषा * सुगंध । रंभ रानी मिलि गावै ॥
नाग पत्नी सुर वधू । केलि करि कनस वंदावै ॥
लग्यौ भरम द्रिगपाल धर । जम भरम जग्गे सुभर ॥
कविचंद मरन चालुक कै । मच्यौ न को रषि चक्रतर ॥
छंदं ॥ ३० ॥ रू० ॥ २५ ॥
क्रोध करके पृथ्वीराज का तलवार से युद्ध करना,
पृथ्वीराज की सब सेना का इकट्ठा हो जाना ॥
कवित्त ॥ सुधर जुद्ध अवसह । जुद्ध कटि सिद्ध समानं ॥
मार मार उच्चार । तेग कट्टी चहुआनं ॥
त्रुटि सिषर उर फुट्टि । वीर अद्धो अध झुल्लै ॥
मानुं तुल्ला की डंडि । वीर बानावली तुल्लै ॥
आखेट भग्गि एकट्ठ हुश्र । सवै सेन प्रथिराज जुरि ॥
बाजिद पान गब्बर गद्दर । वांम कोह उम्भै उसरि ॥
छंदं ॥ ३१ ॥ रू० ॥ २६ ॥
२४ पाठान्तर-जूहं मत । चालुक । दिसि । यांन । पच्छित्रांन । सैंधव । धाईय । सुरतांन ।
धाईय । घाइ । झंभरिय । लप । उड़ि । समानं ॥
२५ पाठान्तर-रख्यिय । दोंउ । पषर । * अधिक पाठ है ॥ किर्ति दुग्ग दीनह भपिय ।
- अधिक पाठ है ॥ बंदावै । भरंम । दिगपाल । चालुक । रथतर ॥
२६ पाठान्तर-युद्ध । युध । उच्चार । चहुवांनं । त्रुटि । सिप्पर । धर झुलै । मनौं । दंड ।
बांमावली । तुलै । एकत्र । प्रथीयराजं । बाजिद यांन गपर । बांम । उभै । उचरि ॥
६
४३४ पृथ्वीराजरासो । [ दसवां समय १०
सुलतान का बढ़कर लड़ना, दो घड़ी घोर युद्ध होना ॥
कवित्त ॥ रूप्यौ सेन सुरतान । राज चढि नंषि सुरगं ॥
कै तिमर अग्ग तपभांन । सिंघ चकौ कि कुरंगं ॥
तब * रुप्यौ राव सिंघारय । लाज सुविधान घटकिय ॥
सस्त्र तेज बल बंधि । सेन चहुआन छटकिय ॥
दै घरिय टोप उप्पर बह्यो । सार तिनंगा तारयौ ॥
जानें कि तिंदु दारुन जरै । जैत षंभ पर झारयो ॥
छं० ॥ ३२ ॥ रू० ॥ २७ ॥
दूहा ॥ अथ मुक्कौ सिरदार दुहु । देखि भयौ नृप चूक्क ॥
घरी एक झरि सार बहु । ज्यौं अगि संजुत्ता जक्क ॥
छं० ॥ ३३ ॥ रू० ॥ २८ ॥
यवन सरदारों का माराजाना, पृथ्वीराज की विजय ॥
कवित्त ॥ जुद्ध जुरे सिरदार । राव रंगच बाजी दह ॥
घालि बध्य गज हत्थ । हड्ड संजिय रग गूद्द ॥
ज्यौ मुष्टिक चानूर । कन्ह भंजिय अब्भारह ॥
उत्तभंग लै हूर । सूर अपछर उप्पारह ॥
वाजीद षान ओरी धरिय । धाड पंच रंगर नृपति ॥
रष्यै जु खाँडू मिट्टै कवन । निमष मांहि उतपति षपति ॥
छं० ॥ ३४ ॥ रू० ॥ २९ ॥
हारकर शहाबुद्दीन का ग़ज़नी की ओर लौट जाना ॥
दूहा ॥ चूक चूक भय असुर सुर । फिरि गज्जन दिसि धांन ॥
हारि जुआरी ज्यौं चलै । कर घटै कर जान ॥
छं० ॥ ३५ ॥ रू० ॥ ३० ॥
२७ पाठान्तर-सुरतांन । बाजि चढि । भांन । हक्कै । * अधिक पाठ है। रिधिरिय।
विहांन । चहुआनं । हटकिय । घरीय । जानें ॥
२८ पाठान्तर-दुहुं । अगनि । उक्क ॥
२९ पाठान्तर-युद्ध । झुरै । सिरहार । रांव । बाजीदह । बध । गर । हथ । रंग । अपारह ।
उपारह । वर्जीद । घांड । घाव । यु । सांरं ॥
३० पाठान्तर-गजन । धांन । युवारी । चले । घठे । जांन ॥
दसवां समय ११ ] पृथ्वीराजरासो । ४३५
चौह्मान की विजय पर चन्द कवि का जै जै कार करना ॥
दूहा ॥ जीति राज चहुवांन बन । आपेटक असुरान ॥
जै जै जै कविचंद कहि । चंद सूर वप्पान ॥
छं० ॥ ३६ ॥ रु० ॥ ३१ ॥
इति श्री कविचंद विरचिते प्रथिराजरासके राजा
चहूवन आपेटक रन सुरतांन चूक करनं नाम
दसम प्रस्ताव संपूर्णम् ॥ १० ॥
३१ पाठान्तर-चहुवांन । असुरांन । घपांन ॥
उपसंहारकी टिप्पणी ।
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यह समय भी हमारे स्वदेशी इतिहास के लिये बहुत उपयोगी है। क्योंकि एक लड़ाई तो
“हुसैन कथा” नामक समय में रासो के अनन्द संवत् अर्थात्, पृथ्वीराज के तृतीय साक ११३५ माघ
शुक्ला १३=११३५+९० । ९१=१२२५ । २६ वर्त्तमान विक्रमी में आगे हो चुकी थी और दूसरी उसके
एक बरस पीछे यह “आखेड़क चूक” नामक हुई है। इस लड़ाई के होने का समय कवि ने स्पष्ट न
बताकर प्रथम रूपक में—बरष एक बीते कलह—से पहिली के एक वर्ष पीछे इसका होना वर्णन किया
है अर्थात् पहिली के सं० ११३५+९०।९१=१२२५।२६ में एक जोड़ने से ११३५+१=११३६+९० । ९१=
१२२६ । २७ वर्त्तमान विक्रमी होता है। वैसे ही “आखेड़क” शब्द के नियत समय के अर्थ से
“फाल्गुण” मास का होना भी प्रकाश किया है। प्राचीन समय में हमारे देशी राज्यों में वर्ष भर
के अनेक त्यौहारों में फाल्गुण मास में जिस दिन ज्योतिषी आखेट का महूर्त्त देते थे उस दिन
एक बड़ा त्यौहार मनाया जाता था। इसीसे यहां कवि ने “आखेड़क” शब्द से फाल्गुन का संकेत
अर्थ में माना है। अब यह त्यौहार लुप्त सा होता चला जाता है, तथापि वह प्राचीन राज्य
उदयपुर में इस समय तक भी माना जाता है और उसको वहां “अहेरिया” वा “महूरत का
शिकार” करके कहते हैं। और उसका सविस्तर वृत्तान्त कर्नल टॉड साहब ने अपने परम प्रसिद्ध
ग्रंथ “राज स्थान” में यह लिखा है ॥
“The merry month of Phalgun is ushered in with the Ahaireä, or spring-hunt.
The preceeding day the Rana distributes to all his chiefs and servants either a dress of
green, or some portion thereof, in which all appear habited on the morrow, whenever the
astrologer has fixed the hour for sallying forth to slay the boar to Gouri, the Ceres of the
Rajpoots: the Ahairea is therefore called the Máhoorut ca sikar or the chase fixed astrolo-
gically. As their success on this occasion is ominous of future good, no means are neglected
to secure it, either by scouts previously discovering the lair, or the desperate efforts of the
hunters to slay the boar when roused. With the sovereign and his sons all the chiefs sally
forth, each on his best steed, and all animated by the desire to surpass each other in acts
of prowess and dexterity. It is very rare that in some one of the passes or recesses of the
valley the hog is not found; the spot is then surrounded by the hunters, whose vociferations
soon start the dhokra and frequently a drove of hogs. Then each cavalier impels his steed,
and with lance or sword, regardless of rock, ravine, or tree, presses on the bristly foe, whose
knowledge of the country is of no avail when thus circumvented, and the ground soon
reeks with gore, in which not unfrequently is mixed that of horse or rider. On the past
occasion, there occurred fewer casualties than usual, though the Chandawut Ham ira,
whom we nicknamed the “Red Riever,” had his leg broken, and the second son of
Sheodan Singh, a near relation of the Rana, had his neighbour’s lance driven through
his arm. The young chief of Saloombara was amongst the distinguished of this day’s sport.
It would appal even an English fox-hunter to see the Rajpoots driving their steeds at full
speed, bounding like the antelope over every barrier, the thick jungle covert, or rocky
steep bare of soil or vegetation.” with their lances balanced in the air, or leaning on the
saddle bow slashing at the boar”.
TOD’S RAJASTHAN, VOL. I, PAGE 435.
दसवां समय १३ ] पृथ्थीराजरासो । ४३०
और उन्होंने इस वृत्तान्त में के "अहेरिया" शब्द पर जो टिप्पण दी है उसमें पृथ्वीराज
जी के इस आखेटक के विषय में यह कहा है-
"In his delight for this diversion, the Rajpoot evinces his Scythic propensity: The
grand hunts of the last Chohan emperor often led him into warfare, for Prithiraj was a
poacher of the first magnitude, and one of his battles with the Tartars was while engaged
in field sports on the Ravi."
TOD'S RAJASTHAN, VOL. I, PAGE 485.
यद्यपि रूपक ४ के वाक्य-बरष रभै षटमास-का अर्थ दो वर्ष और छ महीनों का भी
हो सकता है, परन्तु प्रथम रूपक के वाक्य-वरप एक बीते कलह-की उस के साथ संगति मिलाने
से उस का अर्थ एक वर्ष का ही होता है अर्थात्, वर्ष अर्थात् दो छमाही। सो पाठक विचार देखें ॥
जैसे "हुसैन कथा" वाली रासो की संवत् ११३५ की लड़ाई का कारण हुसैन और चित्ररेखा
का पृथ्वीराज के शरण आना था; वैसेही इस आखेटक चूक की लड़ाई का कारण उनके बेटे
ग़ाज़ी हुसैन का रूपक २ के अनुसार एक महिने और पांच दिन पीछे फिर पृथ्वीराज जी के
पास चला आना है ॥
तथा रूपक ४ एक अपूर्व वृत्त प्रकाशित करता है कि हमारे एक हिन्दू-निसिराव पत्रीय-
दिल्ली में बिराजे हुए हिन्दुओं की बादशाहत नाश करवाने को पृथ्वीराज जी के यहां की
मुख़बरी शहाबुद्दीन को लिखा पढ़ा करते थे । ऐसे जीव भी धन्य हैं !!!
इस पृष्ठ/छवि पर कोई पाठ (टेक्स्ट) अंकित नहीं है (यह पूरी तरह रिक्त/सफ़ेद पृष्ठ है)।
अथ चित्ररेषा समयौ लिख्यते ॥
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( ग्यारहवां समय । )
चित्ररेखा की उत्पत्ति पूछना ॥
दूहा ॥ पुच्छि चंद वरदाइ नैं । चित्ररेष उतपत्ति ॥
षां हुसेन पावास कचि । जिम लीनी असपति ॥ कूं० ॥ १ ॥ छ० ॥ १ ॥ *
शहाबुद्दीन के विक्रम का वर्णन ॥
कवित्त ॥ गज्जनेस अवदेस । साचि पल्हांन कुसावं ॥
बदक खामि मेछरां । कुंडि गष्पर क्षिति आवं ॥
जल जोवन साचाव । दीन दुरँगे करि गिन्निय ॥
हिंदवान मेक्कान । थान थानह करि लिन्निय
बजि विषम बाइ सुरतान प्पन । साचि बदौं सब दीन पति ॥
अनसंक कंक मनु लंकपति । जनु जोवन तन रवित पति ॥
छं० ॥ २ ॥ छ० ॥ २ ॥
शहाबुद्दीन का अरब ख़ां पर चढ़ाई करने की
इच्छा कर सरदारों से पूछना ॥
कवित्त ॥ दिसि अरब सुरतांन । दिष्टि आलोकि वंक सुश्र ॥
आकंपै दिसि डुक्खि । ऊचल चालंत चित्त दुश्र ॥
सज्जि सेन चतुरंग । जंग अनभंग विचारिय ॥
बोलि षान घुरसान । पान जित्ते अधिकारिय ॥
१ पाठान्तर—पुछि । बरदाईनैं । उतपति । लीनिय । अमपति ॥ * इस समय में कवि ने
हुसेन षां के कहे अनुसार जैसे शहाबुद्दीन ने चित्ररेखा को प्राप्त किया था सो वर्णन किया है ॥
२ पाठान्तर—पल्लांणि । पलांन । कसंवि । बदकर । सांमि । दुरंगे । गिनीय । गिनिय ।
हिंदवांन । मेक्षांन । यांन । लिंनीय । सुरतांन । सहाबदी । मनौ । जुन । जर ॥
ग्यारहवां समय २ ] पृथ्वीराजरासो । ४४०
मारूफ षान तत्तार षां । षान षान खेरिन सुबर ॥
काजी बल्लाइ कलहंत रिन । बोलि बीर पच्छे सुनर ॥
छं० ॥ ३ ॥ रु० ॥ ३ ॥
अरब ख़ां नवता नहीं है इसलिये उस पर चढ़ाई
होनी चाहिए यह आज्ञा दी ॥
दूहा ॥ * आरब पति अर सिंध तट । विन सलाम सुरतान ॥
तिन उप्पर सज्जिय सयन । कद्दर खंडि फुरमांन । छं० ॥ ४ ॥ रु० ॥ ४ ॥
चढ़ाई की सेना की संख्या ॥
कवित्त ॥ सत्त पंच बाहन बिसाल * । लख दुइ तुरी लखिना ॥
आरब्बी सैं पंच । लख इक सोधि सुलखिना ॥
काविल्ली उर तेज । रोम रोमी पंजाबी ॥
लोचानी जल बान । सेष गोरी आरब्बी ॥
लष एक लख लक्षां मुहा । पारेवह जिन पंष लिय ॥
चालंत कटक गोरी प्रबल । सूधी चाली पंचनिय ॥ छं० ॥ ५ ॥ रु० ॥ ५ ॥
सेना की धूल का वर्णन ॥
छंद भुजंगी ॥ चली पंथिनी सथ्य चौसठ्ठ थानं । चली अग्ग पंती सुदंती प्रमानं ॥
तिनं दंत कंती तडित्ता समानं । ............................ छं० ॥ ६ ॥
ध्वजा पंति फैरंत भादब्ब भारं । झवकैं मनौ सूर संगी कि सारं ।
बजै चंत्न चंबाल गज्जै कद्दरं । बज्जै तह सहं पपीहं दहूरं ॥ छं० ॥ ७ ॥
धरं बंक य और उड्यौर घंटं । बरं डैर भंजै धरै बिच दहं ॥
अगें चल्लियं अग्गिवानं समीरं । तिनं पुट्ठ षुर्सान षां बंधि भीरं ॥ छं० ॥ ८ ॥
३ पाठान्तर-दिसि बर आरब साह । दिष्ट । सुय । डुलि । सजि । विचारिय । पांन ।
षुरसांन । पांन । जिते । अधिकारिय । मारुफ । पांन । ततार । पांन प्रांन । रन । बलाय । पछैँ ॥
४ पाठान्तर-सिंधु । नट । सलाम । सुरतांन । उपर । सजिय । फुरमांन ॥ * अरब ख़ाँ
नामक कोई छोटा राजा वा सरदार उस समय सिंधु तट पर के देश का पति था कि जिसके
पास चित्ररेखा थी ॥
५ पाठान्तर-सत । वाहन । * अधिक पाठ है ॥ लषु । दोइ । लषीना । आरबी । पांच
सैं । लष । लीनां । कविली । बांन । शेष । गौरी । आरबी । लष । लषां । मुहां । पारेवाह ।
षलिय । गौरी । पंषनीय ॥
ग्यारहवां समय ३ ] पृथ्वीराजरासो । ४४१
धरै छत्र सीसं विराजंत गोरी । पिलै पंक्ति देवं विचें किल्ल होरी ॥
बलीयोन यानं कुटं मानु पहं । जगी जोग जालं उन्नहै सुयहं ॥ कुं० ॥ ८ ॥
चनै कारवं उप्परे साचि सज्जी । कमठं पिठं उध्यलं सेस दज्जी ॥
बिंटे गट्ट गोचार केशान थानं । मनौ सागरं बीच बडवानलानं ॥ कुं० ॥ १० ॥
बजे थान थानं सुचंवान्न दूरं । गहे पग्ग सीरं बदै मुप्प कूरं ॥
शाह का निसुरति ख़ां को आरब ख़ां के पास भेजना कि चित्ररेषा
को देकर पैर पर गिरै तो हम क्षमा करदें ॥ ॥
वरं मोक्कले मेल्वनि स्तुत्ति पांनं । कचौ आरवं लग्गि पायं विच्चानं ॥ कुं०॥११॥
दियौ चित्ररेषा लियौ दंड दोनं । भिरै षेत मोसीं कहूं अज्ज कोनं ॥
पस्यौ तापना आरवं निट्ठ निठ्ठे । गयौ काहरं धीरजं दिट्ठ दिट्ठं ॥ कुं०॥१२ ॥
आरब ख़ां का सादर आज्ञा मानना और चित्ररेषा
को देना स्वीकार करना ॥
दियौ जाइ फ़र्मान निस्सत्त ईसं । लियौ आरवं आदरं नाइ सीसं ॥
दई चित्ररेषा सिनावी सुडोरं । तिनं उप्परं गुंज भौंरान बोरं ॥ कुं० ॥ १३ ॥
इह्यं सेत हस्थी दु चार्वै कराकी । पलंगी रजल्ली धरै अंत पाकी ॥
: सतं एक मप्पी दई चित्ररेषा । बनी सुद्ध बानै धरं मद्धि नेहा ॥
कुं० ॥ १४ ॥ रू० ॥ ६ ॥
६ पाठान्तर-सथ । चौसठि । थानं । अंग । सदंती । पमानं । तडिता ॥ ६ ॥ पत्ति । फहरंत ।
भादवा । झवकैं । मनौ । गजै । बजै ॥ ७ ॥ पद्धोर उधोर । घटं । बर । बटं । अग्रे । चलियं ।
अगिवायं । पुठि । पुरंसान ॥ ८ ॥ धरें । गौरी । यांनं २ । कुटे । पह्न । मानो । न उद्वै सुरानं ॥ ९ ॥
उपरं । सनी । कमठं । उघल । दभी । बिंटे । गठ । कै । यांन यांनं । बडवानलानं ॥ १० ॥ यांन
यांनं । गहैं । मुष । निसुरति । पांतं । कहौं ॥ ११ ॥ भिरें । मोसूं । कहाँ । कौनं । तापनां ।
निष्ठ निष्ठ । दिठि दिठं ॥ १२ ॥ फुरमांन । निसुरत्त । नांय । शीशं । सहोरं । उपरं ! भवरांन ।
भोरं ॥ १३ ॥ हथी । आरब । चैराकी । रजकी । सत्यें । नांने ॥ १४ ॥
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४४२ | पृथ्वीराजरासो । | [ ग्यारहवां समय ४
निशुरति षां का अरब खाँ को शाबसी दे कहना कि तुमने शाह
के बचन माने और हिन्दु धर्म्म को न मान कर म्लेच्छ
कुल कर्म्म को धारण किया सो ठीक किया ॥
कवित्त ॥ कह्यौ साचि जो बचन । सोइ तुम काज सुधार्यौ ॥
तेइ बचन सति होइ । हिंदु भ्रम्मं न बिचार्यौ ॥
मेछ धर्यौ कुल क्रंम । जोगि ग्यानह जिम धारहि ॥
सेवक मत्त सुभाइ । देन आलम नाकारहि ॥
षुरसान षान सुरतान पति । दल बहल पावस मिलिग ॥
चतुरंग सज्जि चौरंग मिलि । सिद्ध चरित सिद्धन चलिग
कृं० ॥ १५ ॥ छ० ॥ ७ ॥
शाहाबुद्दीन का सेना समेत सजकर चलना ॥
कवित्त ॥ गज्जनेस आएक । सूर चतुरंगन सज्जिथ ॥
बीर बाल ससि वहि । मोच पूरन जिम भज्जिय ॥
करक निसा दिन मकर । सेन बढ्ढी तिम चंगिय ॥
मिलि अनंग आनंद । रंज आनंद सुजंगिय ॥
द्वादस सहस्ल बारुन समह । दोइ लष सज्जे सुभर ॥
पारब सुअग्म्य आरंभ दल । चल्यौ साच मधि दुप्पहर ॥
दृं० ॥ १६ ॥ ६० ॥ ८ ॥
चलते समय शाह का चित्त चित्ररेखा में मत्त
गयंद की भांति लगा हुआ था ॥
गाथा ॥ चित्तं मत्त गयंढं । पुंतारं नत्थि उत्तरयं ॥
त्यौं चित्तरेषय चित्तं । सुविधानं मंडियं नेहं ॥ कृं० ॥ १७ ॥ ६० ॥ ६ ॥
७ पाठान्तर-सोय । साज सुधारी । होई । धंम । विचारौ । धरौ । कर्म्म । जोग ।
ग्यांनह । सुभाय । सुभाई । बुरसांन षांन । सजि ॥
८ पाठान्तर-आएक । चतुरंगति । सजिय । भजिय । निशा । बढी । चंगीद । जंगीव ।
समुंद । समद । दोय । लषु । सजे । दुपहर ॥
९ पाठान्तर-चितं । मत । पुतारं । नथि । उतरयं । चित्तं ॥
४४४ पृथ्वीराजरासो । [ ग्यारहवां समय ६
अरब खां का आज्ञा मानकर चित्ररेखा को भेंट में देना ॥
अरिल्ल ॥ आरब षान तन छन मानिय । ज्यौं सुकिया पिय आग्या जानिय ॥
लै फुरमान बंदि सिर धारिय । चित्ररेष दीनी सा नारिय ॥
छं० ॥ २८ ॥ रू० ॥ १२ ॥
चित्ररेखा वेश्या के रूप का वर्णन ॥
साटक ॥ बेस्या बंकित भूप रूप मनस!, स्रंगार धारावली ॥
सोयं सूरति लच्छि अच्छित गुनं, बेली सु कामावली ॥
का बर्ने कबि उक्ति जुक्ति मनयं, त्रैलोक्य मं साधनं ॥
सोयं बाल तिरत्त उष्ट विद्रुमं, का मोह जोगेश्वरं ॥
छं० ॥ २९ ॥ रू० ॥ १३ ॥
साटक ॥ रूपं नदि कटाच्छ कूल तटयौ, भायं तरंगं बरं ॥
द्यावं भावति सील ऽसित गुनं, सिद्धं मनं भंजनी ॥
सोयं जोग तरंग रुवति बरं, चीलोक्य ना ता समा ।
सोयं साचि सहाव दीन अहियं, आनंग क्रीड़ा रसं ॥
छं० ॥ २९ ॥ ६० ॥ १४ ॥
बिना युद्ध चित्ररेखा को लेकर गोरी का लौट आना ॥
दूहा ॥ अंग सुलच्छिन हेम तन । नगधरि सुंदरि सीस ॥
गोरी ग्रहि गोरी गयौ । विना जुद्ध बुझि रीस ॥
छं० ॥ ३० ॥ रू० ॥ १५ ॥
चित्ररेखा के साथ शाह के आदर और प्रेम का वर्णन ॥
दूहा ॥ जिम जिम साह सु आदरिय । तिम तिम बढ़िय पेम ॥
क्रम क्रम फल गुन बढ़ इय । बेली नमैं सु तेम ॥ छं० ३१ ॥ रू० १६ ॥
१२ पाठान्तर-षांन । छन । मंतिय । सुकीया । जांनिय । फुरमांन । धारीय ॥
१३ पाठान्तर-सोयं । लछि । अच्छित । बेली । बरनै । युक्ति । मन । तिरत । जोगेस्रं ॥
१४ पाठान्तर-नत । कंठाह्य । तटयो । मान । असित । भजनी । रुऋति । जीकोन ता संमयं । त्रिलोक्स । नह । समां । साहाब । ग्रहीयं ॥
१५ पाठान्तर-लक्षिन । शीश । गृहि । युद्ध ॥
१६ पाठान्तर-आदरीय । बढ़िय । जिम २ फलगुन वाधइय ॥
[ ग्यारहवां समय ९ ] पृथ्वीराजरासो । ४४५
चित्ररेषा को सुलतान को वश करने का वर्णन ॥
कवित्त ॥ वसि कीनौ सुरतान । चंग जिस भ्रमै डोरि कर ॥
ज्यौं भावी बसि जाइ । बचन उद्योत बाल सुर ॥
ज्यौं वसि जीवन संन । प्रात वसि जेम क्रांस गुर ॥
ज्यौं वसि नाद कुरंग । वास वसि जेम मधुक्कर ॥
मछिजा सु मुक्ति सब वस्ति भय । मच्छिजा मच्छिज सुमति वसि ॥
एकांग एक अंदर सछल । रचै साछि सुरतान रसि ॥
छं० ॥ ३२ ॥ रु० ॥ १७ ॥
चित्ररेषा की कथा सुन कर कवि का आनंदित होना ॥
दो० ॥ पंथी पेम परेव जिस । सुमन मनोहर मिष्ट ॥
सुनत कथा संलुद्ध दृष्ट । अनंदिय मन इष्ट ॥
छं० ॥ ३३ ॥ रु० ॥ १८ ॥ *
इति श्री कविचंद विरचिते पृथिराजरासके चित्ररेषा
वर्णनं नाम एकादसो प्रस्ताव संपूर्णम् ॥ ११ ॥
१७ पाठान्तर—कीनौं । सुरतांन । भ्रमै । होई । मंत । क्रम । नद । वशि । मधुकर । सुमति ।
जांसि । मति । रहैं । सुरतांन । रस ॥
१८ पाठान्तर—यह । आनंदीय ॥
- यह दोहा Caulfield, Ms. में नहीं है, परन्तु वह हमारी सं० १६४७ और सं० १८५९ की
पुस्तकों में है ॥