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सर्वकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

पृष्ठ 438, कुल 470 में से

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पृष्ठ 438

४२८ पृथ्वीराजरासो । [ दसवां समय ४
प्रबल तेज अस तेज । जुद्ध दैवान देव गति ॥
एक लष लेषिये । एक लषिये लषन भति
इच जानि चूक चिंत्यौ नृपति । इच्छे बत्त सुविद्दान कौं ॥
तत्तार पांन निसुरत्त षां । पूकि पांन षुरसान कौं ॥
छं० ॥ १० ॥ रू० ॥ १० ॥
कवित्त ॥ षां षुरसान ततार । षान अरदास समर्पिय ॥
चूक मंडि सुरतान । थान चहुआन सुथप्पिय ॥
हाजी षां गाजी सु । बंध निज बंधी गब्भर ॥
सुब्बिद्दान साहाब । साचि स्वारं दल पष्षर ॥
निज पान षान षुरसान पति । इष्ध साचि बत्त बधियै ॥
मिलि मीर मसूरति ततं किय । चूक साचि अरि संधियै ॥
छं० ॥ ११ ॥ रू० ॥ ११ ॥
पृथ्वीराज का बेखटके आनन्द से आखेट खेलना ॥
दूह ॥ रंग रमै रजान बन । नहीं संक मन मांहि ॥
तरु बेली घन गच बरिय । सुभि जल निरमल छांह ॥
छं० ॥ १२ ॥ रू० ॥ १२ ॥
पृथ्वीराज के आखेट का वर्णन ॥
कवित्त ॥ सतह पंच दीपीय । एण फंदैत पंच सौ ॥
सहस स्वान दस डोरि । ग्रहै पंचान पंच सौ ॥
पंच अग्ग पंचास । करु चाव दिसि सज्जे ॥
कुही बाज उत्तंग । पंष आघात सुबज्जे ॥
१० पाठान्तर-चाहुआन । जमवांन । सुकतैं । नह । लष । लेषीयै । एक लेषियै । जांनि । चिंत्यौ । इच्छैं । बिद्दानं । ततार । निसुरत । पुच्छि । पुरसांन । कों ॥
११ पाठान्तर-पुरसांन । सुरतांन । यांन । चहुवांन । संबंध । सबंध । मिबंधी । गबर । सुबिद्दानं । बिद्दानं । पषर । पांन । प्रांन । पुरसांन । बंधीये । अर । संधीये ॥
१२ पाठान्तर-राजांन । लर । बरीय । निर्मल ॥