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पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

पृष्ठ 441, कुल 470 में से

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पृष्ठ 441

दमवां समय ७ ] पृथ्वीराजरासो । ४३१
धरि अह अह बीसच्छ भय । जरिंग भयानक वीर सम ॥
दुहुकोह कट्ठि परि यार तें । खुद चिंति कुक्कौ विभम ॥
छं० ॥ १८ ॥ रु० ॥ १८ ॥
युद्धारस युद्ध वर्णन ॥
छंद विराज ॥ धरं धार कट्टी । घनं बीज वट्ठी ॥ रसं रोस थट्टी । सुषं मुंक भ्रट्ठी ॥ छं०॥१८॥
परै चह पही । मनौ मद जहीं ॥ उनं तेग कट्टी । जनैं वज्र टट्टी ॥ छं० ॥ २०॥
जसं दढ्ढ दही । मनौ नैन भ्रष्टी ॥ उछहे ऊछट्टी । घनं घट घट्टी ॥ छं०॥ २१ ॥
कुनालं उलट्टी । उतारंत मट्टी ॥ रटें मार मारं । सुरं आसुरारं ॥ छं० ॥ २२ ॥
परं ते पधारं । कुठारं करारं ॥ वले घाव तारं । किनारं उघारं ॥ छं० ॥ २३ ॥
इसी जुद्ध भारं । मची कूह कारं ॥ पर्यो पंच भारं । .......................
छं० ॥ २४ ॥ रु० ॥ १८ ॥
पांच सरदारों का पृथ्वीराज की रक्षा में चारों ओर हो
जाना और इन सभों का यवनों के बीच
में घिर कर युद्ध करना ॥
कवित्त ॥ पंचानन भँपंच । स्वामि ओडन थट्ट रप्पे ॥
इक्क स्वामि रन अग्ग । इक्क उभ्भे दस पिप्पे ॥
सार धार प्राछार । बीय शिय उप्पर बाहै ॥
मनौ तत्त घरियार । मेघ जल वुट्ठ प्रबाहै ॥
दनु देन जप्य गंधव्व जय । गन घथ गय उच्चार धुअ ॥
सुरतान सेन झुकि मांचि परि । धनि नरिंदं सोमेस सुअ ॥
छं० ॥ २५ ॥ रु० ॥ २० ॥
१८ पाठान्तर-हथ । यवन । ठठे । चारुदिसि । चिति चहुवांन । यां । गपर । * अधिक
पाठ है ॥ विहयं । विभ्रार । घटा । बघं । वीभक्त । भयानक । दुहुल्लाह । कठि । ते ॥
१६ पाठान्तर-छंद रसावला । घर धारं कटी । बटी । घटी । मुक्क । भ्रटी ॥ १८ ॥ परें
चटपटी । मद जटी । कली । तटीं ॥ २० ॥ दढ दढी । लैन भ्रटी । उछटी । घट घटी ॥ २१ ॥
ऊतालं । उलटी । मटी । आतुरारं ॥ २२ ॥ धाव ॥ २३ ॥ पर्यो । युद्ध ॥ २४ ॥
२० पाठान्तर- भौं । उंडन । रपं । एक । रिन । एक उभे । पपं । तीय । उपर । तत ।
बुद्धि । जरक । गंध्रव । गांन । उच्चार । सुरतांन ॥