पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
पृष्ठ 435, कुल 470 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथ आखेटक चूक वर्णनं लिख्यते ॥
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( दसवां समय )
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एक वर्ष बीत गया, परन्तु शहाबुद्दीन के हृदय में
पृथ्वीराज का बैर सालता रहा ॥
दोहा ॥ वरष एक बीते कत्तच । रीस रखि सुरतान ॥
उर अंतर अग्गी जलै । चित सल्लै चहुवान ॥ छं० ॥ १ ॥ रू० ॥ १ ॥
एक महीना पांच दिन गज़नी में रह कर फिर हुसैन
का पृथ्वीराज के पास आप जाना ॥
दूहा ॥ मास एक दिन पंच रचि । बद्धि धाइ हुसैन * ॥
पग लग्यौ चौहान कै । राज प्रसन्निय वैन ॥ छं० ॥ २ ॥ रू० ॥ २ ॥
फिर पृथ्वीराज का आखेटक माड़ना और शहाबु-
द्दीन का चूक करने को आना ॥
दूहा ॥ फिरि आखेटक मंडि नृप । पहू वन घन तास ॥
दूत साधि साहाबदीं । आइ संपत्ते पास ॥ छं० ॥ ३ ॥ रू० ॥ ३ ॥
१ पाठान्तर-बीतै । सकल । रपि । सुरतांन । अंदर । अग्री । सालै । चहुवांन ॥
२ पाठान्तर-बधि । बंधि । धाय । घाइ । घाव । हुसेन । लाग्यो । चौहांन । बैन ॥
- यहां "हुसेन" से कवि का अभिप्राय हुसेन कथा नामक समय के चित्ररेखा को लानेवाले हुसेन के
बेटे ग़ाज़ी हुसेन से है कि जिसको पृथ्वीराज ने शहाबुद्दीन को हाथ पकड़ाकर गज़नी भेज
दिया था (हुसेन कथा रूपक ९३) परंतु शाह ने गज़नी पहुंचकर उसे भी क़ैद कर दिया था
सो वह जेल में कत्ल करके पीछे फिर १ महिने और ५ दिन वहां रह कर पृथ्वीराज की
शरण में आ गया ॥
३ पाठान्तर-पहू । रुत । द्री । आय । संपत्ते ॥