पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदसवां समय ६] पृथ्वीराजरासो । ४३३
'छंडि थान पच्छिवान । हंकि सैंधव झुकि घाय्य ॥
रह्यो सेन सुरतान । नेज बाजी जस धाय्य ॥
विस्साय धाय तन झंफरिय । त्रुटि पंजर वर धुक्किधर ॥
कटि घाइ ल्षप पंथा प्रगट । उड़ि हंसव संमान सर ॥
छंदं ॥ २८ ॥ रू० ॥ २४ ॥
कवित्त ॥ सोलंकी सिर मौर । रेह अनछत्त पुर रष्या ॥
दोऊ दीन पष्पर प्रमान * । कित्ति दुग्ग पप्पच भंपी ॥
धूप दीप माषा * सुगंध । रंभ रानी मिलि गावै ॥
नाग पत्नी सुर वधू । केलि करि कनस वंदावै ॥
लग्यौ भरम द्रिगपाल धर । जम भरम जग्गे सुभर ॥
कविचंद मरन चालुक कै । मच्यौ न को रषि चक्रतर ॥
छंदं ॥ ३० ॥ रू० ॥ २५ ॥
क्रोध करके पृथ्वीराज का तलवार से युद्ध करना,
पृथ्वीराज की सब सेना का इकट्ठा हो जाना ॥
कवित्त ॥ सुधर जुद्ध अवसह । जुद्ध कटि सिद्ध समानं ॥
मार मार उच्चार । तेग कट्टी चहुआनं ॥
त्रुटि सिषर उर फुट्टि । वीर अद्धो अध झुल्लै ॥
मानुं तुल्ला की डंडि । वीर बानावली तुल्लै ॥
आखेट भग्गि एकट्ठ हुश्र । सवै सेन प्रथिराज जुरि ॥
बाजिद पान गब्बर गद्दर । वांम कोह उम्भै उसरि ॥
छंदं ॥ ३१ ॥ रू० ॥ २६ ॥
२४ पाठान्तर-जूहं मत । चालुक । दिसि । यांन । पच्छित्रांन । सैंधव । धाईय । सुरतांन ।
धाईय । घाइ । झंभरिय । लप । उड़ि । समानं ॥
२५ पाठान्तर-रख्यिय । दोंउ । पषर । * अधिक पाठ है ॥ किर्ति दुग्ग दीनह भपिय ।
- अधिक पाठ है ॥ बंदावै । भरंम । दिगपाल । चालुक । रथतर ॥
२६ पाठान्तर-युद्ध । युध । उच्चार । चहुवांनं । त्रुटि । सिप्पर । धर झुलै । मनौं । दंड ।
बांमावली । तुलै । एकत्र । प्रथीयराजं । बाजिद यांन गपर । बांम । उभै । उचरि ॥
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