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पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

पृष्ठ 452, कुल 470 में से

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पृष्ठ 452

४४२ | पृथ्वीराजरासो । | [ ग्यारहवां समय ४
निशुरति षां का अरब खाँ को शाबसी दे कहना कि तुमने शाह
के बचन माने और हिन्दु धर्म्म को न मान कर म्लेच्छ
कुल कर्म्म को धारण किया सो ठीक किया ॥
कवित्त ॥ कह्यौ साचि जो बचन । सोइ तुम काज सुधार्यौ ॥
तेइ बचन सति होइ । हिंदु भ्रम्मं न बिचार्यौ ॥
मेछ धर्यौ कुल क्रंम । जोगि ग्यानह जिम धारहि ॥
सेवक मत्त सुभाइ । देन आलम नाकारहि ॥
षुरसान षान सुरतान पति । दल बहल पावस मिलिग ॥
चतुरंग सज्जि चौरंग मिलि । सिद्ध चरित सिद्धन चलिग
कृं० ॥ १५ ॥ छ० ॥ ७ ॥
शाहाबुद्दीन का सेना समेत सजकर चलना ॥
कवित्त ॥ गज्जनेस आएक । सूर चतुरंगन सज्जिथ ॥
बीर बाल ससि वहि । मोच पूरन जिम भज्जिय ॥
करक निसा दिन मकर । सेन बढ्ढी तिम चंगिय ॥
मिलि अनंग आनंद । रंज आनंद सुजंगिय ॥
द्वादस सहस्ल बारुन समह । दोइ लष सज्जे सुभर ॥
पारब सुअग्म्य आरंभ दल । चल्यौ साच मधि दुप्पहर ॥
दृं० ॥ १६ ॥ ६० ॥ ८ ॥
चलते समय शाह का चित्त चित्ररेखा में मत्त
गयंद की भांति लगा हुआ था ॥
गाथा ॥ चित्तं मत्त गयंढं । पुंतारं नत्थि उत्तरयं ॥
त्यौं चित्तरेषय चित्तं । सुविधानं मंडियं नेहं ॥ कृं० ॥ १७ ॥ ६० ॥ ६ ॥
७ पाठान्तर-सोय । साज सुधारी । होई । धंम । विचारौ । धरौ । कर्म्म । जोग ।
ग्यांनह । सुभाय । सुभाई । बुरसांन षांन । सजि ॥
८ पाठान्तर-आएक । चतुरंगति । सजिय । भजिय । निशा । बढी । चंगीद । जंगीव ।
समुंद । समद । दोय । लषु । सजे । दुपहर ॥
९ पाठान्तर-चितं । मत । पुतारं । नथि । उतरयं । चित्तं ॥