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पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

पृष्ठ 453, कुल 470 में से

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पृष्ठ 453

४४४ पृथ्वीराजरासो । [ ग्यारहवां समय ६
अरब खां का आज्ञा मानकर चित्ररेखा को भेंट में देना ॥
अरिल्ल ॥ आरब षान तन छन मानिय । ज्यौं सुकिया पिय आग्या जानिय ॥
लै फुरमान बंदि सिर धारिय । चित्ररेष दीनी सा नारिय ॥
छं० ॥ २८ ॥ रू० ॥ १२ ॥
चित्ररेखा वेश्या के रूप का वर्णन ॥
साटक ॥ बेस्या बंकित भूप रूप मनस!, स्रंगार धारावली ॥
सोयं सूरति लच्छि अच्छित गुनं, बेली सु कामावली ॥
का बर्ने कबि उक्ति जुक्ति मनयं, त्रैलोक्य मं साधनं ॥
सोयं बाल तिरत्त उष्ट विद्रुमं, का मोह जोगेश्वरं ॥
छं० ॥ २९ ॥ रू० ॥ १३ ॥
साटक ॥ रूपं नदि कटाच्छ कूल तटयौ, भायं तरंगं बरं ॥
द्यावं भावति सील ऽसित गुनं, सिद्धं मनं भंजनी ॥
सोयं जोग तरंग रुवति बरं, चीलोक्य ना ता समा ।
सोयं साचि सहाव दीन अहियं, आनंग क्रीड़ा रसं ॥
छं० ॥ २९ ॥ ६० ॥ १४ ॥
बिना युद्ध चित्ररेखा को लेकर गोरी का लौट आना ॥
दूहा ॥ अंग सुलच्छिन हेम तन । नगधरि सुंदरि सीस ॥
गोरी ग्रहि गोरी गयौ । विना जुद्ध बुझि रीस ॥
छं० ॥ ३० ॥ रू० ॥ १५ ॥
चित्ररेखा के साथ शाह के आदर और प्रेम का वर्णन ॥
दूहा ॥ जिम जिम साह सु आदरिय । तिम तिम बढ़िय पेम ॥
क्रम क्रम फल गुन बढ़ इय । बेली नमैं सु तेम ॥ छं० ३१ ॥ रू० १६ ॥
१२ पाठान्तर-षांन । छन । मंतिय । सुकीया । जांनिय । फुरमांन । धारीय ॥
१३ पाठान्तर-सोयं । लछि । अच्छित । बेली । बरनै । युक्ति । मन । तिरत । जोगेस्रं ॥
१४ पाठान्तर-नत । कंठाह्य । तटयो । मान । असित । भजनी । रुऋति । जीकोन ता संमयं । त्रिलोक्स । नह । समां । साहाब । ग्रहीयं ॥
१५ पाठान्तर-लक्षिन । शीश । गृहि । युद्ध ॥
१६ पाठान्तर-आदरीय । बढ़िय । जिम २ फलगुन वाधइय ॥