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फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

सोलहवाँ अध्याय
द्वादश भावफल
लग्न आदि द्वादश भावों का समुदाय फल
लग्ननवांशपतुल्यतनुः स्याद्वीर्ययुतग्रहतुल्यतनुर्वा
चन्द्रसमेतनवांशपवर्णः कादिविलग्नविभक्तभगात्रः ॥१॥
लग्नेशे केन्द्रकोणे स्फुटकरनिकरे स्वोच्चभे वा स्वभे वा
केन्द्रादन्यत्रसंस्थे निधनभवनपे सौम्ययुक्ते विलग्ने ।
दीर्घायुष्मान्धनाढ्यो महितगुणयुतो भूमिपालप्रशस्तो
लक्ष्मीवान् सुन्दराङ्गो दृढतनुरभयो धार्मिकः सत्कुटुम्बी ॥२॥
सत्सम्बन्धयुते कलेवरपतौ सद्ग्रामवासोऽथवा
सत्सङ्गः प्रबलग्रहेण सहिते विख्यातभूपाश्रयः ।
स्वोच्चस्थे नृपतिः स्वयं स्वगृहगे तज्जन्मभूमौ स्थितिः
सञ्चारश्चरभे स्थितिः स्थिरगृहे द्वन्द्वं द्विरूपं फलम् ॥३॥
विख्यातः किरणोज्ज्वले तनुपतौ सुस्थे सुखी वर्धनो
दुःस्थे दुःखसहक्षनीचभवने वासो निकृष्टस्थले ।
स्वस्थो जीवति शक्तिमत्युदयभे वर्द्धिष्णुरुर्जस्वलो
निःशक्तौ निहतो विपद्भिरसकृत्खिन्नो भवेदातुरः ॥४॥
अर्थस्वामिनि मुख्यभावजुषि सत्स्वर्थे कुटुम्बश्रिया
सर्वोत्कृष्टगुणो धनी च सुमुखी स्याद्दूरदर्शी नरः ।

सोलहवाँ अध्याय : द्वादश भावफल ३०७
सम्बन्धे सवितुर्द्वितीयपतिना लोकोपकारक्षमां
विद्यामर्थमवाप्नुयादथ शनेः क्षुद्रालपविद्यारतः ॥५॥
जैवे वैदिकधर्मशास्त्रनिपुणो बौधेऽर्थशास्त्रे पटुः
शृङ्गारोक्तिपटुर्भृगौहिमरुचेः किञ्चित्कलाविद्भवेत् ।
कौजे क्रूरकलापटुश्च पिशुनो राहौ स्थिते लोहलः
केतौ भ्रश्यदलोकवाग्धनगतैः पापैश्च मूढोऽधनः ॥६॥
बन्धो यदि स्यात्तनुशौर्यनाथयो-
रन्योन्यराशिस्थितयोर्बलाढ्ययोः ।
धैर्यं च शौर्यं सहजानुकूलतां
प्राप्नोत्ययं साहसकार्यकर्तृ ताम् ॥७॥
शौर्यपे बलिनि सद्ग्रहयुक्ते कारकेऽपि शुभभावमुपेते ।
भ्रातृवृद्धिरथ वीर्यविहीने दुःस्थिते भवति सोदरनाशः ॥८॥
अयुग्मराशौ यदि कारकेशौ
गुर्वर्कभूसूनुनिरोक्षितौ चेत् ।
ओजो गृहः स्याद्यदि विक्रमाख्यः
पुंभ्रातरस्त्वंशवशाद्भवेयुः ॥९॥
दुःस्थाने सुखपे शशिन्यपि सतां योगेक्षणैर्वर्जिते
पापान्तःस्थितिमत्यसद्ग्रहयुते दृष्टे जनन्या मृतिः ।
एतौ द्वावपि वीर्यगौ शुभयुतौ दृष्टौ शुभैर्बन्धुगे-
र्मातुः सौख्यकरौ विधोश्च सुखगेः सौम्यैर्वदेत्तत्सुखम् ॥१०॥

३०८ फलदीपिका
लग्नेशे सुखगेऽथवा सुखपतौ लग्ने तयोरीक्षणे
योगे वा शशिनस्तथा यदि करोत्यन्त्यां स्वमातुः क्रियाम् ।
अन्योन्यं यदि शत्रुनीचभवने षष्ठाष्टमे वा तयो-
र्मातुर्नोपकरोति नाशसमये बन्धस्तयोर्वा न चेत् ॥११॥
मातृभावोक्तवद्वाच्यं पितृभ्रातृसुतादिषु ।
भावकारकभावेशलग्नलग्नेश्वरैर्वदेत् ॥१२॥
सुस्थौ सुखेशभृगुजौ तनुबन्धुयुक्ता-
वान्दोलिकां जनपतेश्वरतां विधत्तः ।
स्वर्णाद्यनर्घ्यमणिभूषणपट्टशय्या-
कामोपभोगकरणानि च गोगजाश्वान् ॥१३॥
दुःस्थे सुखेशे कुजसूर्ययुक्ते
सुखेऽपि वा जन्मगृहं प्रदग्धम् ।
जीर्णं तमोमन्दयुतेऽरियुक्ते
परैर्हृतं गोक्षितिवाहनाद्यम् ॥१४॥
सौम्यर्क्षांशे सौम्ययुक्ते पञ्चमे वा तदीश्वरे ।
वैशेषिकांशे सद्भावे धीमान्निष्कपटी भवेत् ॥१५॥
स्थितिः पापानां वा, द्विषति बलयुक्तारिपतिना
युतो वा दृष्टो वा, यदि रिपुगृहे वा तनुपतिः ।
अरीशः केन्द्रे वाऽप्यशुभखगसंवीक्षितयुतो
रिपूणां पीडां द्राग्भृशमपरिहार्यां वितनुते ॥१६॥
षष्ठेश्वरादतिबलिन्युदयाधिनाथे
सौम्यग्रहांशसहिते शुभदृष्टियुक्ते ।

सोलहवां अध्याय : द्वादश भावफल ३०९
सौख्येश्वरेऽपि सबले यदि केन्द्रकोणे-
ष्द्वारोग्यभाग्यसहितो दृढगात्रयुक्तः ॥१७॥
शत्रु नाथे तु दुःस्थाने नीचमूढारिसंयुते
तस्माद्बलाढ्ये लग्नेशे शत्रु नाशं रवौ शुभे ॥१८॥
यद्भावेशयुतो वैरिनाथो यद्भावसंश्रितः ।
षष्ठस्थितो यद्भावेशस्ते भावाः शत्रुतां ययुः ॥१९॥
सत्संबन्धयुते सप्तर्क्षे तदीशे बलान्विते ।
पतिपुत्रवती साध्वी भार्या सर्वगुणैर्वृता ॥२०॥
केन्द्रादन्यत्र रन्ध्रेशे लग्नेशाद्दुर्बले सति ।
नाधिर्न विघ्नो न क्लेशो नृणामायुश्चिरं भवेत् ॥२१॥
धर्मे कुजे वा सूर्ये वा दुःस्थे तन्नायके सति ।
पापमध्यगते वाऽपि पितुर्मरणमादिशेत् ॥२२॥
दिवा सूर्ये निशा मन्दे सुस्थे शुभनिरीक्षि

३१० फलदीपिका
धर्मे तदीशे वा मन्दयुक्ते दृष्टेऽपि वा चरे ।
जातो दत्तो भवेन्नूनं व्ययेशे बलशालिनि ॥२६॥
नभसि शुभखगे वा तत्पतौ केन्द्रकोणे
बलिनि निजगृहोच्चे कर्मगे लग्नपे वा ।
महितपृथुयशाः स्याद्धर्मकर्मप्रवृत्तिः
नृपतिसदृशभाग्यं दीर्घमायुश्च तस्य ॥२७॥
ऊर्जस्वी जनवल्लभो दशमगे सूर्ये कुजे वा महत्
कार्यं साधयति प्रतापबहुलं खेशश्च सुस्थो यदि ।
सव्यापारवतीं क्रियां वितनुते सौम्येषु सच्छ्लाघितां
कर्मस्थेष्वहिमन्दकेतुषु भवेद्दुष्कर्मकारी नरः ॥२८॥
लाभेशे यद्भावनाथयुक्ते यद्भावगेऽपि वा ।
भावं तदनुरूपस्य वस्तुनो लाभगैरपि ॥२९॥
व्ययस्थितो यद्भावेशो व्ययेशो यत्र तिष्ठति ।
तस्य भावस्यानुरूपवस्तुनो नाशमादिशेत् ॥३०॥
(i) (क) जातक का शरीर या तो नवांश लग्न के स्वामी के
अनुसार होता है या जन्म-कुण्डली में जो ग्रह सबसे बलवान् हो उसके
समान हो । चन्द्रमा जिस नवांश में हो उस नवांश के स्वामी का
जो वर्ण (रंग-रूप) हो उसी के अनुकूल जातक का वर्ण होगा । मेष
से लेकर बारह राशियों तक काल पुरुष के बारह अंग माने गये हैं;
इसी प्रकार लग्न से लेकर बारहवें भाव तक काल पुरुष के बारह अंग
माने गये हैं, यहाँ पर मन्त्रेश्वर महाराज यह बताते हैं कि यदि लग्न बड़ी
राशि है तो लग्न में शुभ ग्रह होने से जातक का सिर बड़ा और और
सुन्दर होगा । इसी प्रकार भिन्न-भिन्न भावों में कैसी राशि पड़ी है

सोलहवाँ अध्याय : द्वादश भावफल ३११
और कैसे ग्रह हैं उसी प्रकार का शरीर और शरीर के अवयव जातक
के होंगे । ॥२॥
(ख) लग्नेश केन्द्र या कोण में हो, अस्त न हो और अपनी उच्च
राशि या स्वराशि में हो तथा लग्न में सौम्य ग्रह हो; इस प्रकार लग्न
और लग्नेश दोनों सुधरे हुए हों और अष्टमेश केन्द्र के अलावा और किसी
स्थान में हो तो जातक दीर्घायु, धनवान्, प्रशंसित, गुण वाला, राजा
से प्रशंसित, लक्ष्मीवान्, सुन्दर अंग वाला, दृढ़ शरीर का, निर्भय,
धार्मिक और अच्छे कुटुम्ब वाला होता है । ॥२॥
(ग) यदि लग्नेश का अच्छे ग्रह से सम्बन्ध हो तो जातक उत्तम
ग्राम में वास करता है या उसे सज्जन मनुष्यों का सहवास प्राप्त होता
है । यदि लग्नेश किसी प्रबल ग्रह के साथ हो तो जातक को किसी
विख्यात राजा का आश्रय प्राप्त होता है । इससे यह भी नतीजा
निकलता है कि यदि लग्नेश दुःस्थान में पड़ा है तो जातक भी
दुःस्थान में रहेगा और यदि नीच, निर्बल ग्रहों के साथ हो तो मनुष्य
का संग भी ऐसे ही मनुष्यों के साथ होता है। यदि लग्नेश उच्च हो
तो जातक राजा हो। यदि लग्नेश स्व-गृही हो तो जातक अपनी जन्म-
भूमि में रहता चला आये । यदि चर-राशि में हो तो जातक एक जगह
स्थिर होकर न रहे । यदि लग्नेश स्थिर राशि में हो तो एक जगह जम
कर रहे । और यदि द्वि-स्वभाव राशि में हो तो दोनों प्रकार का
फल हो । अर्थात् कभी संचारशील हो कभी जम कर रहे । ॥३॥
(घ) यदि जन्म के समय लग्नेश किरणों से प्रकाशमान हो-
अर्थात् अस्त न हो तो मनुष्य विख्यात होता है। यदि लग्नेश सुस्थान
में हो तो जातक सुखी और वृद्धि को प्राप्त होता है। किंतु यदि
लग्नेश, नीच राशि, पाप ग्रह की राशि या दुःस्थान में हो तो जातक
निकृष्ट स्थान में वास करता है। यदि लग्नेश बलवान् होकर सुस्थान में
हो तो जातक सुखी, पराक्रमी, वृद्धि को प्राप्त, उत्तम जीवन व्यतीत

३१२ फलदीपिका
करता है किंतु यदि लग्नेश निर्बल हो तो मनुष्य विपत्तियों से आक्रान्त
(घिरा हुआ), रोगों से खिन्न (अर्थात् रोगी) अर्थात् बार-बार रोगों
और विपत्तियों का शिकार बना हुआ दुःखी जीवन व्यतीत करता है।
इन श्लोकों में लग्नेश के बलवान् अथवा दुर्बल-उत्तम स्थान किंवा
दुस्थान में रहने की महिमा बताई गई है। ॥४॥
(ii) (क) यदि द्वितीयेश लग्न में हो और शुभग्रह दूसरे में
हो, तो जातक सर्व उत्कृष्ट गुणों वाला, धनी, सुन्दर मुख वाला, दूरदर्शी
और सत्कुटुम्ब वाला होता है। यदि धनेश का सूर्य से सम्बन्ध हो तो
जातक लोक का उपकार करने वाला, विद्वान् और धनवान् होगा।
यदि धनेश का शनि से सम्बन्ध हो तो जातक की विद्या क्षुद्र (छोटे प्रकार
की) और अल्प होगी। ॥५॥
• (ख) यदि धनेश का बृहस्पति से सम्बन्ध हो तो जातक वेद
और धर्मशास्त्र में विद्वान् होता है। यदि बुध से सम्बन्ध हो तो
अर्थशास्त्र में पटु हो। यदि शुक्र से सम्बन्ध हो तो श्रृंगार सम्बन्धी शास्त्र
में (साहित्य, कामशास्त्र इत्यादि); और चन्द्रमा का द्वितीयेश से सम्बन्ध
हो तो किसी-किसी कला में कुशल हो; यदि मंगल से सम्बन्ध हो तो
क्रूर कलाओं में विद्वान् हो और जातक चुगलखोर भी हो। यदि
राहु द्वितीय स्थान में स्थित हो (या द्वितीयेश के साथ हो) तो स्पष्ट
उच्चारण न करने वाला और यदि केतु द्वितीय में हो तो हकलावे
या असत्य वचन बोलने वाला हो। यदि धनस्थान में पाप-ग्रह हो तो
मनुष्य मूर्ख और निर्धन होता है। ॥६॥
ऊपर श्लोक ५ और ६ में द्वितीयेश के विविध ग्रहों में सम्बन्ध
का जो फल बताया गया है वह फल उस दशा में भी होता है जब
द्वितीय भाव भी विविध ग्रहों से सम्बन्धित हो, ऐसा हमारा
मत है।

सोलहवाँ अध्याय : द्वादश भावफल ३१३
(iii) (क) यदि लग्नेश और तृतीयेश का बन्ध हो और एक
दूसरे की राशि में हों अर्थात् बलवान् लग्नेश तृतीय में हो और
बलवान् तृतीयेश, लग्न में हो तो जातक साहस के कार्य करने वाला,
धैर्यवान्, वीर और भ्रातृ प्रेमी होता है ।॥७॥
(ख) यदि तीसरे घर का मालिक बलवान् हो, सदग्रह के साथ
हो और भ्रातृभाव का कारक भी बलवान् हो और शुभभाव में
बैठा हो तो भाइयों की वृद्धि होती है । किन्तु यदि कारक और
तीसरे घर का स्वामी निर्बल हों और दुःस्थान में बैठे हों तो भाइयों
का नाश होता है ।॥८॥
(ग) यदि तीसरे घर का स्वामी और तीसरे भाव का कारक
अर्थात् मंगल दोनों ऊनी राशियों में बैठे हों और बृहस्पति, सूर्य
और मंगल से दृष्ट हों तथा लग्न से तीसरे घर में ऊनी राशि हो
तो जितने नवांश तीसरे भाव में उदित हो चुके हों उतने ही भाई
होंगे । ॥९॥
(iv) (क) यदि जन्मकुंडली में चतुर्थेश तथा चन्द्रमा दोनों
दुःस्थान में हों और न वे शुभ ग्रह के साथ हों और न उन पर
शुभ ग्रह की दृष्टि हो बल्कि वे पाप ग्रहों के बीच में हों और पाप
युत या पाप दृष्ट हों तो माता की शीघ्र ही मृत्यु हो जाती है ।
किन्तु यदि सब बातें उपर्युक्त से भिन्न हों अर्थात् चतुर्थेश और
और चन्द्रमा बलवान् हो, शुभ ग्रहों से युत हों, शुभ ग्रहों से
दृष्ट हों और शुभ ग्रह चतुर्थ में हो तो मातृ सुख होता है।
चन्द्रमा से चतुर्थ स्थानों में सौम्य ग्रह हों तो मातृ सौख्य होता
है । ॥१०॥
तृतीयेश ही मंगल से देखा जा सकता है स्वयं मंगल, मंगल
से नहीं देखा जा सकता है ।

३१४ फलदीपिका
(ख) यदि लग्नेश चतुर्थ में हो या चतुर्थेश लग्न में हो और
चन्द्रमा इनसे योग या दृष्टि करे तो जातक अपनी माता का अन्तिम
संस्कार (दाह, श्राद्ध आदि) करता है। यदि ये दोनों—लग्नेश और
चतुर्थेश एक दूसरे से छठे, आठवें एक दूसरे की शत्रु या नीच राशि
में हों और इन दोनों का 'बन्ध' न हो तो जातक अपनी माता का
अंतिम संस्कार नहीं कर सकेगा ॥११॥
(ग) जिस तरह चतुर्थ भाव तथा मातृ कारक चन्द्रमा से मातृ
भाव का विचार किया गया है उसी प्रकार पिता, भाई, पुत्र आदि
का (भाव, कारक ग्रह, भावेश, ग्रहों का लग्न और लग्नेश से कैसा
सम्बन्ध है यह विचार कर) फल कहना चाहिये। उदाहरण के
लिये लग्न, लग्नेश बलवान् हों —पंचम भाव, पंचम भाव का स्वामी
औरें पुत्र कारक बृहस्पति—इन सब में मित्रता हो तो पुत्र से प्रेम
और पुत्र सुख होगा। लग्नेश और पंचमेश एक दूसरे के शत्रु हों
परस्पर छठे आठवे हों—एक दूसरे की शत्रु या नीच राशि में हों तो
पिता पुत्र में प्रेम नहीं रहेगा। ॥१२॥
(घ) यदि चौथे स्थान का स्वामी और शुक्र लग्न में और चौथे
स्थान में या दोनों सुस्थान में हों और नीच अस्त आदि दोषों से
रहित हों तो जातक को चढ़ने के लिये राजा की पालकी मिलती है
अर्थात् वाहन सुख होता है और स्वर्ण, बहुमूल्य भूषण, दाय्या, रेशमी
वस्त्र, गौ, भोग के अन्य साधन, हाथी घोड़े आदि का सुख प्राप्त
होता है। ॥१३॥
यदि चौथे घर का स्वामी दुःस्थान में हो और सूर्य और
मंगल के साथ हो या सूर्य और मंगल चौथे घर में हो तो जातक
का जन्म-गृह जल जायेगा। यदि राहु और शनि चतुर्थ घर में हों तो
“बन्ध” का अर्थ श्लोक ३० अध्याय १५ में समझाया गया है।

सोलहवाँ अध्याय : द्वादश भावफल ३१५
मकान जीर्ण होगा ? यदि चौथे घर में शत्रु ग्रह हो तो उस मनुष्य
की जमीन, सवारी तथा भूमि का और लोग अपहरण कर लेंगे ?
॥१४॥
(v) (क) यदि पंचम भाव शुभ राशि और शुभ ग्रह के नवांश में
हो या पंचम भाव शभग्रह-युक्त हो तो जातक बुद्धिमान् और निष्कपट
होता है । यदि पंचमेश उत्तम भाव में बैठ कर वैशेषिकांश में हो
तब भी यही फल । संस्कृत में "सौम्य" शब्द आया है । सौम्य के
दो अर्थ हैं शुभ और बुध । एक टीकाकारने सौम्य का अर्थ 'बुध'
किया है । किन्तु हमारे विचार से यहाँ सौम्य का प्रयोग शुभ के
अर्थ में किया गया है ॥१५॥
(vi) (क) नीचे कुछ योग दिये हैं जिनमें से किसी के होने
से जातक को घोर शत्रु पीड़ा होती है और वह शत्रु पीड़ा का निराकरण
नहीं कर सकता :
(१) पाप ग्रह छठे में हों, (२) लग्नेश बलवान् षष्ठेश से
दृष्ट या युत हो (३) छठे घर का स्वामी पाप ग्रह से दृष्ट या
युत केन्द्र में हो । [संस्कृत के मल श्लोक से एक और भी अर्थ
निकलता है कि लग्नेश के छठे घर में होने से भी शत्रु पीड़ा होती है;
यदि बलवान् षष्ठेश से दृष्ट या युत हो तो और अधिक पीड़ा
होगी] ॥१६॥
(ख) यदि लग्नेश षष्ठेश से बहुत अधिक बली हो और लग्नेश
सौम्य-ग्रह की राशि और अंश में हो और शुभ-ग्रहों से दृष्ट हो और
चतुर्थेश बलवान होकर केन्द्र या त्रिकोण में बैठा हो तो जातक दृढ़
शरीर वाला, नीरोग और भाग्यवान् होता है । ॥१७॥
(ग) यदि षष्ठेश दुःस्थानमें (६, ८, या १२ में) नीच राशि या
शत्रु राशि में या अस्त हो और षष्ठेश की अपेक्षा लग्नेश बलवान्

३१६ फलदीपिका
हो तथा सूर्य नवम में हो तो जातक शत्रु पर विजयी होता है और
शत्रु का नाश होता है। इस श्लोक में पाठान्तर भी है जिसके
अनुसार पाठ हो जायेगा “शत्रुनाशो रिपौ शुभे”। ऐसा पाठ मानने से
सूर्य नवम में हो इसकी बजाय अर्थ होगा; छठे घर में शुभग्रह हो तो
शत्रु पर जातक विजयी होता है।॥१८॥
(घ) (१) छठे घर का स्वामी जिस भावेश के साथ हो। (२)
छठे घर का स्वामी जिस भाव में बैठा हो। (३) जो भावेश छठे घर में
बैठा हो। यह तीनों शत्रुता करेंगे। उदाहरण के लिये षष्ठेश पंचम में
बैठा हों या पंचमेश षष्ठ में बैठा हो या पंचमेश, षष्ठेश एक साथ
बैठे हों तो पुत्र शत्रुता करेगा।॥१९॥
(vii) यदि सातवें भाव का शुभग्रहों से सम्बन्ध हो और सप्त-
मेश बलवान् हो तो जातक की स्त्री सर्वगुणों से युक्त, पति पुत्रवती
और साध्वी होती है।॥२०॥
(viii) (क) अष्टमेश यदि केन्द्र के अतिरिक्त अन्य किसी स्थान
में हो और लग्नेश की अपेक्षा अष्टमेश दुर्बल हो तो न आधि होती है
न विघ्न होते हैं, न क्लेश होते हैं और जातक चिरायु होता है।॥२१॥
(ix) (क) यदि सूर्य या मंगल नवम में हो और नवम का
स्वामी दुःस्थान में पड़ा हो अथवा पापग्रही के मध्य में हो तो जातक
के पिता का मरण हो जाता है अर्थात् जातक का पिता अल्पायु
होता है।॥२२॥
(ख) यदि दिन में जन्म हो और सूर्य सुस्थान में हो तथा शुभ ग्रह
से वीक्षित हो और नवमेश बलवान् हो तो जातक का पिता दीर्घायु
*दक्षिण भारत में नवम से पिता का विचार करते हैं किन्तु उत्तर
भारत में पिता का विचार दशम से किया जाता है।

सोलहवाँ अध्याय : द्वादश भावफल ३१७
होता है। यदि रात्रि में जन्म हो और शनि सुस्थान में शुभ ग्रह
वीक्षित हो और नवमेश बलवान् हो तो जातक का पिता चिरायु
होता है। ॥२३॥
(ग) यदि सूर्य और चन्द्रमा, शनि और मंगल से त्रिकोण में हो
तो बालक के माता पिता उसे छोड़ देंगे किन्तु यदि इन पर (सूर्य
चन्द्र पर) बृहस्पति की दृष्टि हो तो जातक सुखी और चिरायु
होगा। ॥२४॥
(घ) यदि शनि नवमेश होकर चर राशि में बैठे और शुभ-ग्रह
से दृष्ट न हो और सूर्य दुःस्थान में हो तो जातक को उसके पिता
के अतिरिक्त अन्य कोई व्यक्ति पालता है। ॥२५॥
(ङ) यदि नवम स्थान में चर राशि हो और शनि से युत या
दृष्ट हो अथवा नवमेश चर राशि में बैठा हो और श ने से युत वा
दृष्ट हो – इन दोनों में से कोई योग हो और व्ययेश बलशाली हो तो
जातक किसी के यहाँ गोद जाता है। ॥२६॥
( x ) (क) यदि दशम में शुभ-ग्रह हो और दशम का स्वामी बलवान्
होकर अपनी राशि में या अपनी राशि में स्थित होकर केन्द्र या
त्रिकोण में बैठे या लग्न का स्वामी बलवान् होकर दशम में बैठे तो
जातक का राजा के समान भाग्य होता है और वह दीर्घायु भी होता
है। उसके यश का बहुत विस्तार होता है और उसकी प्रवृत्ति भी धर्म-
कर्म में होती है। ॥२७॥
(ख) यदि दशम में सूर्य या मंगल हो तो जातक प्रतापी और
लोक-प्रिय होता है और यदि दशमेश सुस्थान में बैठा हो तो अत्याधिक
प्रताप से कार्य साधन करता है। यदि दशम में सौम्य ग्रह हो तो
जातक प्रशंसा के योग्य उत्तम व्यापार वाली क्रियायें करता है। किन्तु
यदि दशम में शनि राहु या केतु हो तो मनुष्य दुष्कर्म करने वाला
होता है। ॥२८॥

३१८ फलदीपिका
(xi) (क) (१) लाभेश जिस भाव के स्वामी के साथ हो (२)
लाभेश जिस भाव में हो (३) जो ग्रह या जो भावेश लाभ
में बैठे हों इन तीनों के अनुरूप वस्तु का लाभ कहना चाहिये। उदाहरण
के लिये लाभेश पंचम में बैठे या पंचमेश लाभ में बैठे या लाभेश,
पंचमेश एक साथ हों तो विद्या, पुत्र, बुद्धि, सट्टे से लाभ कहना
क्योंकि पंचम से इनका विचार किया जाता है। इसी प्रकार यदि लाभेश,
सप्तमेश का सम्बन्ध हो या सप्तमेश लाभ में बैठे या लाभेश सप्तम
में बैठे तो स्त्री से, साझेदारी से या व्यापार से लाभ कहना। ॥३०॥
(xii) जो भावेश बारहवें घर में बैठे या बारहवें घर का स्वामी जिस
भाव में बैठे उस भाव के अनुरूप वस्तु का नाश कहे। उदाहरण के
लिये चतुर्थेश व्यय में हो तो सवारी का व्यय, या भूमि का व्यय, व्ययेश
यदि पंचम में हो तो पुत्र द्वारा या सट्टे से धन का व्यय कहना
चाहिये। ॥३०॥
भावसिद्धिकाल
अब यह बताते हैं कि किसी भाव सम्बन्धी फल कब होगा।
भावेशस्थितभांशकोणमपि वा भावं तु वा लग्नपो
लग्नेशस्थितभांशकोणमुदयं वाऽयाति भावाधिपः ।
संयोगेऽपि विलोकनेऽपि च तयोस्तद्भावसिद्धिं तदा
ब्रूयात्कारकयोगतस्तनुपतेर्लग्नाच्च चन्द्रादपि ॥३१॥
किसी भाव की प्राप्ति या फल निम्न लिखित कालों में से किसी
समय होते हैं : (१) भावेश जिस राशि और अंश में हो उस से त्रिकोण
में गोचरवश जब लग्नेश आवे (२) लग्नेश जिस राशि में या उससे
और अंश में है उसमें या उससे त्रिकोण में जब गोचरवश भावेश आवे।

सोलहवाँ अध्याय : द्वादश भावफल ३१९
(३) जब लग्नेश और भावेश गोचरवश एक दूसरे को देखें या
एक दूसरे से युक्त हो जायें (४) जब भाव कारक गोचरवश
उस स्थान पर आवे जहाँ जन्म कुण्डली में लग्नेश वा चन्द्र
राशि का स्वामी हो (५) जब लग्नेश गोचरवश उस भाव में आवे-
जिस भाव सम्बन्धी विचार करना हो । चन्द्रलग्न से भी इसी प्रकार
विचार करना चाहिये । ॥३१॥
यद्भावेशास्थितर्क्षाशत्रिकोणस्थे गुरुर्यदा ।
गोचरे तस्य भावस्य फलप्राप्तिं विनिर्दिशेत् ॥३२॥
यह देखिये कि जिस भाव का विचार करना है उसका स्वामी
किस राशि और किस अंश में है । जब गोचरवश बृहस्पति उस
राशि और अंश से त्रिकोण में आता है तब उस भाव सम्बन्धी शुभ
फल होता है। ॥३२॥
लग्नारिनाथयोगे तु लग्नेशाद्दुर्बले रिपौ ।
तदा तद्वशगः शत्रु र्विपरीतमतोऽन्यथा ॥३३॥
जब गोचरवश लग्नेश और षष्ठेश का योग हो अर्थात् दोनों मिल
तो क्या फल होगा ? यदि लग्नेश की बजाय षष्ठेश दुर्बल हो तो
जातक के वश में शत्रु आ जाता है और यदि लग्नेश की बजाय
षष्ठेश बली हो तो जातक स्वयं शत्रु के वश हो जाता है । ॥३३॥
यद्भावपस्य तनुपस्य भवत्यरित्वा-
तत्कालशत्रु वशतोऽरिमृतिस्थितो वा ।
स्पर्धां तदा वदतु तेन च गोचरस्थ-
स्तद्वत्सुहृत्वमपि संयुतिमैत्रतश्च ॥३४॥

३२० फलदीपिका
जिस भावेश की और लग्नेश की तात्कालिक या नैसर्गिक या
एक-दूसरे से षष्ठ-अष्टम रहने के कारण शत्रुता हो—उन दोनों का
लग्नेश और उस भावेश का-जब गोचरवश योग हो तो उस भाव
सम्बन्धी शत्रुता या स्पर्धा या कलह का कारण होना चाहिये। किन्तु यदि
लग्नेश और किसी भावेश की नैसर्गिक और तात्कालिक मित्रता हो
और लग्नेश तथा उस भावेश का गोचरवश योग हो तो उस भाव
सम्बन्धी सुख, नवीन मित्रता आदि कहना। आगे तेईसवें अध्याय
में एक कुण्डली दी गयी है उसमें लग्नेश सूर्य है और षष्ठेश
शनि है, दोनों नैसर्गिक शत्रु भी हैं और तात्कालिक भी और एक
दूसरे से छठे, आठवें हैं इसलिये जब जब सूर्य-शनि योग होगा
तब-तब शत्रु सम्बन्धी त्रास होगा और उसी कुण्डली में सूर्य लग्नेश
है तथा बृहस्पति पंचमेश है। दोनों नैसर्गिक मित्र भी है और
तात्कालिक भी, इस कारण जब जब सूर्य और बृहस्पति का योग
होगा तब-तब पंचम भाव सम्बन्धी शुभ प्राप्ति होगी ? ॥३४॥
लग्नेशयद्भावपयोस्तु योगो
यदा तदा तत्फलसिद्धिकालः।
भावेशवीर्ये शुभमन्यथान्य-
ल्लग्नाच्च चन्द्रादपि चिन्तनीयम् ॥३५॥
लग्नेश गोचरवश जब किसी भावेश से योग करे तो उस भाव
सम्बन्धी सिद्धि या फल प्राप्ति होती है। मान लीजिये कोई मनुष्य
मकान या भूमि खरीदने वाला है और प्रश्न करता है कि कब गृह
लाभ या भूमि लाभ होगा तो देखिये कि जन्म कुंडली में लग्नेश-
चतुर्थेश योग होने वाला है क्या ? जब लग्नेश चतुर्थेश योग हो तब
गृह लाभ या भूमि लाभ होगा। किन्तु यह सम्भव तभी होगा जब

सोलहवाँ अध्याय : द्वादश भावफल ३२१
चतुर्थेश बलवान् हो । भावेश के बलवान् होने से ही कार्य सिद्धि
होती है। यदि भावेश दुर्बल है तो लग्नेश भावेश का योग होने
पर भी कार्य सिद्धि नहीं होगी । दशा, अन्तर्दशा का भी विचार
कर लेना चाहिये ।
जैसे ऊपर लग्न कुण्डली और लग्नेश से विचार बताया गया है
उसी प्रकार चन्द्र कुण्डली (चन्द्रमा जिस राशि में हो उसे लग्न मानकर)
विचार करना चाहिये । ॥३५॥

सत्रहवां अध्याय
निर्याणप्रकरण
तत्तद्भावादष्टमेशस्थितांशे तत्तत्त्रिकोणगे ।
व्ययेशस्थितभांशे वा मन्दे तद्भावनाशनम् ॥१॥
किसी भाव सम्बन्धी नाश कब होगा यह विचार करना हो तो
यह देखिये कि विचारणीय भाव से अष्टम और द्वादश के स्वामी
कहाँ पर हैं । जब शनि गोचरवश वहाँ (विचारणीय भाव से गिनने
पर आठवें और बारहवें के स्वामी जहाँ पर हों उस राशि और नवांश
पर) आवेगा तब विचारणीय भाव का नाश होता है । ऊपर जो
स्थान बताये गये हैं, जहां शनि हानि करता है वहाँ से नवम और
पंचम राशियों पर आने पर भी शनि अनिष्ट करेगा । ॥१॥
उदाहरण के लिये आगे अष्टकवर्ग प्रकरण में जो कुंडली दी गई
है वह देखिये । मान लीजिये दशम भाव का नाश (नौकरी या पिता
के लिये अनिष्ट) कब होगा ? दशम भाव में वृष है । इससे अष्टम
धनु है—इसका स्वामी तुला के कुंभ नवांश में है जब शनि तुला के
कुंभ नवांश या इसके त्रिकोण कुंभ के कुंभनवांश गा मिथुन के कुंभ
नवांश पर आवेगा तब होगा ।
॥ निर्याणशनिः ॥
इस श्लोक में यह बताते हैं कि मनुष्य की मृत्यु के समय शनि
गोचरवश कहाँ पर होगा ।

सत्रहवाँ अध्याय : निर्याणप्रकरण ३२३
रन्ध्रेशो गुलिको मन्दः खरद्रेक्काणपोऽपि वा । यत्र तिष्ठति तद्भांशत्रिकोणे रविजे मृतिः ॥२॥ यह देखिये कि निम्नलिखित ग्रह किन राशियों और किन नवांशों में हैं। (१) अष्टमेश (२) गुलिक (३) शनि (४) लग्न से २२वें द्रेष्काण का स्वामी । जब शनि गोचरवश उपर्युक्त स्थानों पर (राशि और नवांश) या उपर्युक्त स्थानों से नवम या पंचम होता है तब जातक की मृत्यु होती है। ॥२॥ उद्यद्द्द्रेगाणनाथस्य तथा रन्ध्राधिपस्य च । रन्ध्रद्रेक्काणपस्यापि भांशकोणे गुरौ मृतिः ॥३॥
यह देखिये कि निम्नलिखित कहाँ हैं (१) जन्म लग्न जिस द्रेष्काण
में है उस द्रेष्काण का स्वामी (२) अष्टमेश (३) जन्म लग्न से २२वें
द्रेष्काण का स्वामी । उपर्युक्त तीनों जिस राशि या अंश में हों उस
[

३२४ फलदीपिका
सूर्य के गोचरवश मृत्युकाल बताया है उसका आशय यह नहीं है कि
उस समय मृत्यु हो ही जायगी क्योंकि शनि तीस वर्ष में, बृहस्पति
१२ वर्ष में और सूर्य एक वर्ष में पूरा परिभ्रमण कर ही लेता
है। इन गोचरों को बताने का उद्देश्य यही है कि मारक ग्रह
की दशा-अन्तर्दशा हो और उसमें यह निर्णय करना हो कि किस
वर्ष, किस मास में मृत्यु होगी तब ऊपर लिखे प्रकार से देखना
चाहिये। ॥४॥
रन्ध्रप्रभोर्वा भानोर्वा भांशकोणं गते विधौ ।
मृतिं वदेत्सर्वमेतल्लग्नाच्चन्द्राच्च चिन्तयेत् ॥५॥
चन्द्रमा जब गोचरवश उस राशि या नवांश पर आवे जहाँ
अष्टमेश है अथवा जहाँ सूर्य है अथवा गोचरवश जब चन्द्रमा उपर्युक्त
स्थानों से त्रिकोण (नवम-पंचम) पर आवे तब जातक की मृत्यु हो
सकती है। जिस प्रकार उपर्युक्त श्लोकों में लग्न से विचार बताया
गया है उसी प्रकार चन्द्रलग्न से भी यह सब विचार करना चाहिये ।
लग्नेशहीनयमकण्टकभांशकोणं
प्राप्तेऽथवा शनिविहीनहिमांशुभांशम् ।
याते गुरौ स्वमरणन्त्वथ राहुहीन-
भूसूनुभांशकगुरौ सहजप्रणाशः ॥६॥
(१) लग्नेश की राशि, अंश, कला में से यमकंटक की राशि,
अंश, कला घटाइये। जो शेष बचे उसको कहिये “क”। (२) शनि की
राशि, अंश, कला में से चन्द्रमा की राशि, अंश, कला घटाइये, जो
शेष बचे उसको कहिये “ख”। उपर्युक्त “क” और “ख” जिन राशि

सत्रहवाँ अध्याय : निर्याणप्रकरण ३२५
और नवांश में हों उन राशि नवांश पर या उनसे नवम, पंचम जब
गोचरवश बृहस्पति आता है तब जातक की मृत्यु होती है ।
राहु की राशि, अंश, कला में से मंगल की राशि, अंश, कला
घटाइये, जो शेष बचे उसको कहिये "ग" । "ग" जिस राशि और नवांश
में है उस स्थान पर या उससे नवम-पंचम जब गोचरवश बृहस्पति
आता है तब जातक के भाई की मृत्यु हो सकती है । ।६।।
भानोः कण्टकवर्जितस्य भवनांशे वा त्रिकोणे गुरौ
तातो नश्यति कण्टकोनगुलिकक्षांशत्रिकोणे शनौ ।
अर्कोनेन्दुगृहांशकोणगगुरौ चन्द्रोनमन्दात्मज-
क्षेत्रेऽशेऽप्यथवा त्रिकोणगृहगे मन्दे जनन्या मृति ॥७॥,
सूर्य की राशि, अंश, कला से यमकंटक की राशि, अंश कला घटाइये ।
जो शेष बचे उसे कहिये "क" । "क" जिस राशि और नवांश में है
उस पर या उससे नवमपंचम गोचरवश बृहस्पति आता है तब जातक
के पिता की मृत्यु हो सकती है ।
यमकंटक की राशि, अंश, कला में से मान्दि (गुलिक) की राशि,
अंश, कला घटाइये, जो शेष बचे उसे कहिये "ख" । "ख" जिस राशि
और नवांश में है उस पर या उससे नवमपंचम पर जब गोचरवश
शनि आवे तब जातक के पिता की मृत्यु हो सकती है ।
सूर्य-स्पष्ट में से चन्द्र स्पष्ट घटाइये, जो शेष बचे उसे कहिये
'ग' । "ग" जिस राशि और नवांश में हो उस पर या उससे नवम
पंचम जब गोचरवश बृहस्पति आवे तब जातक की माता की मृत्यु
हो सकती है ।
चन्द्र-स्पष्ट में से मान्दि-स्पष्ट घटाइये, जो शेष बचे उसको कहिये
"घ" । "घ" जिस राशि और नवांश में है उस पर या उससे नवम