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सर्वकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

पृष्ठ 315, कुल 684 में से

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पृष्ठ 315

३१४ फलदीपिका
(ख) यदि लग्नेश चतुर्थ में हो या चतुर्थेश लग्न में हो और
चन्द्रमा इनसे योग या दृष्टि करे तो जातक अपनी माता का अन्तिम
संस्कार (दाह, श्राद्ध आदि) करता है। यदि ये दोनों—लग्नेश और
चतुर्थेश एक दूसरे से छठे, आठवें एक दूसरे की शत्रु या नीच राशि
में हों और इन दोनों का 'बन्ध' न हो तो जातक अपनी माता का
अंतिम संस्कार नहीं कर सकेगा ॥११॥
(ग) जिस तरह चतुर्थ भाव तथा मातृ कारक चन्द्रमा से मातृ
भाव का विचार किया गया है उसी प्रकार पिता, भाई, पुत्र आदि
का (भाव, कारक ग्रह, भावेश, ग्रहों का लग्न और लग्नेश से कैसा
सम्बन्ध है यह विचार कर) फल कहना चाहिये। उदाहरण के
लिये लग्न, लग्नेश बलवान् हों —पंचम भाव, पंचम भाव का स्वामी
औरें पुत्र कारक बृहस्पति—इन सब में मित्रता हो तो पुत्र से प्रेम
और पुत्र सुख होगा। लग्नेश और पंचमेश एक दूसरे के शत्रु हों
परस्पर छठे आठवे हों—एक दूसरे की शत्रु या नीच राशि में हों तो
पिता पुत्र में प्रेम नहीं रहेगा। ॥१२॥
(घ) यदि चौथे स्थान का स्वामी और शुक्र लग्न में और चौथे
स्थान में या दोनों सुस्थान में हों और नीच अस्त आदि दोषों से
रहित हों तो जातक को चढ़ने के लिये राजा की पालकी मिलती है
अर्थात् वाहन सुख होता है और स्वर्ण, बहुमूल्य भूषण, दाय्या, रेशमी
वस्त्र, गौ, भोग के अन्य साधन, हाथी घोड़े आदि का सुख प्राप्त
होता है। ॥१३॥
यदि चौथे घर का स्वामी दुःस्थान में हो और सूर्य और
मंगल के साथ हो या सूर्य और मंगल चौथे घर में हो तो जातक
का जन्म-गृह जल जायेगा। यदि राहु और शनि चतुर्थ घर में हों तो
“बन्ध” का अर्थ श्लोक ३० अध्याय १५ में समझाया गया है।