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सर्वकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

पृष्ठ 316, कुल 684 में से

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पृष्ठ 316

सोलहवाँ अध्याय : द्वादश भावफल ३१५
मकान जीर्ण होगा ? यदि चौथे घर में शत्रु ग्रह हो तो उस मनुष्य
की जमीन, सवारी तथा भूमि का और लोग अपहरण कर लेंगे ?
॥१४॥
(v) (क) यदि पंचम भाव शुभ राशि और शुभ ग्रह के नवांश में
हो या पंचम भाव शभग्रह-युक्त हो तो जातक बुद्धिमान् और निष्कपट
होता है । यदि पंचमेश उत्तम भाव में बैठ कर वैशेषिकांश में हो
तब भी यही फल । संस्कृत में "सौम्य" शब्द आया है । सौम्य के
दो अर्थ हैं शुभ और बुध । एक टीकाकारने सौम्य का अर्थ 'बुध'
किया है । किन्तु हमारे विचार से यहाँ सौम्य का प्रयोग शुभ के
अर्थ में किया गया है ॥१५॥
(vi) (क) नीचे कुछ योग दिये हैं जिनमें से किसी के होने
से जातक को घोर शत्रु पीड़ा होती है और वह शत्रु पीड़ा का निराकरण
नहीं कर सकता :
(१) पाप ग्रह छठे में हों, (२) लग्नेश बलवान् षष्ठेश से
दृष्ट या युत हो (३) छठे घर का स्वामी पाप ग्रह से दृष्ट या
युत केन्द्र में हो । [संस्कृत के मल श्लोक से एक और भी अर्थ
निकलता है कि लग्नेश के छठे घर में होने से भी शत्रु पीड़ा होती है;
यदि बलवान् षष्ठेश से दृष्ट या युत हो तो और अधिक पीड़ा
होगी] ॥१६॥
(ख) यदि लग्नेश षष्ठेश से बहुत अधिक बली हो और लग्नेश
सौम्य-ग्रह की राशि और अंश में हो और शुभ-ग्रहों से दृष्ट हो और
चतुर्थेश बलवान होकर केन्द्र या त्रिकोण में बैठा हो तो जातक दृढ़
शरीर वाला, नीरोग और भाग्यवान् होता है । ॥१७॥
(ग) यदि षष्ठेश दुःस्थानमें (६, ८, या १२ में) नीच राशि या
शत्रु राशि में या अस्त हो और षष्ठेश की अपेक्षा लग्नेश बलवान्