फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसोलहवाँ अध्याय : द्वादश भावफल ३११
और कैसे ग्रह हैं उसी प्रकार का शरीर और शरीर के अवयव जातक
के होंगे । ॥२॥
(ख) लग्नेश केन्द्र या कोण में हो, अस्त न हो और अपनी उच्च
राशि या स्वराशि में हो तथा लग्न में सौम्य ग्रह हो; इस प्रकार लग्न
और लग्नेश दोनों सुधरे हुए हों और अष्टमेश केन्द्र के अलावा और किसी
स्थान में हो तो जातक दीर्घायु, धनवान्, प्रशंसित, गुण वाला, राजा
से प्रशंसित, लक्ष्मीवान्, सुन्दर अंग वाला, दृढ़ शरीर का, निर्भय,
धार्मिक और अच्छे कुटुम्ब वाला होता है । ॥२॥
(ग) यदि लग्नेश का अच्छे ग्रह से सम्बन्ध हो तो जातक उत्तम
ग्राम में वास करता है या उसे सज्जन मनुष्यों का सहवास प्राप्त होता
है । यदि लग्नेश किसी प्रबल ग्रह के साथ हो तो जातक को किसी
विख्यात राजा का आश्रय प्राप्त होता है । इससे यह भी नतीजा
निकलता है कि यदि लग्नेश दुःस्थान में पड़ा है तो जातक भी
दुःस्थान में रहेगा और यदि नीच, निर्बल ग्रहों के साथ हो तो मनुष्य
का संग भी ऐसे ही मनुष्यों के साथ होता है। यदि लग्नेश उच्च हो
तो जातक राजा हो। यदि लग्नेश स्व-गृही हो तो जातक अपनी जन्म-
भूमि में रहता चला आये । यदि चर-राशि में हो तो जातक एक जगह
स्थिर होकर न रहे । यदि लग्नेश स्थिर राशि में हो तो एक जगह जम
कर रहे । और यदि द्वि-स्वभाव राशि में हो तो दोनों प्रकार का
फल हो । अर्थात् कभी संचारशील हो कभी जम कर रहे । ॥३॥
(घ) यदि जन्म के समय लग्नेश किरणों से प्रकाशमान हो-
अर्थात् अस्त न हो तो मनुष्य विख्यात होता है। यदि लग्नेश सुस्थान
में हो तो जातक सुखी और वृद्धि को प्राप्त होता है। किंतु यदि
लग्नेश, नीच राशि, पाप ग्रह की राशि या दुःस्थान में हो तो जातक
निकृष्ट स्थान में वास करता है। यदि लग्नेश बलवान् होकर सुस्थान में
हो तो जातक सुखी, पराक्रमी, वृद्धि को प्राप्त, उत्तम जीवन व्यतीत