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सर्वकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

पृष्ठ 321, कुल 684 में से

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पृष्ठ 321

३२० फलदीपिका
जिस भावेश की और लग्नेश की तात्कालिक या नैसर्गिक या
एक-दूसरे से षष्ठ-अष्टम रहने के कारण शत्रुता हो—उन दोनों का
लग्नेश और उस भावेश का-जब गोचरवश योग हो तो उस भाव
सम्बन्धी शत्रुता या स्पर्धा या कलह का कारण होना चाहिये। किन्तु यदि
लग्नेश और किसी भावेश की नैसर्गिक और तात्कालिक मित्रता हो
और लग्नेश तथा उस भावेश का गोचरवश योग हो तो उस भाव
सम्बन्धी सुख, नवीन मित्रता आदि कहना। आगे तेईसवें अध्याय
में एक कुण्डली दी गयी है उसमें लग्नेश सूर्य है और षष्ठेश
शनि है, दोनों नैसर्गिक शत्रु भी हैं और तात्कालिक भी और एक
दूसरे से छठे, आठवें हैं इसलिये जब जब सूर्य-शनि योग होगा
तब-तब शत्रु सम्बन्धी त्रास होगा और उसी कुण्डली में सूर्य लग्नेश
है तथा बृहस्पति पंचमेश है। दोनों नैसर्गिक मित्र भी है और
तात्कालिक भी, इस कारण जब जब सूर्य और बृहस्पति का योग
होगा तब-तब पंचम भाव सम्बन्धी शुभ प्राप्ति होगी ? ॥३४॥
लग्नेशयद्भावपयोस्तु योगो
यदा तदा तत्फलसिद्धिकालः।
भावेशवीर्ये शुभमन्यथान्य-
ल्लग्नाच्च चन्द्रादपि चिन्तनीयम् ॥३५॥
लग्नेश गोचरवश जब किसी भावेश से योग करे तो उस भाव
सम्बन्धी सिद्धि या फल प्राप्ति होती है। मान लीजिये कोई मनुष्य
मकान या भूमि खरीदने वाला है और प्रश्न करता है कि कब गृह
लाभ या भूमि लाभ होगा तो देखिये कि जन्म कुंडली में लग्नेश-
चतुर्थेश योग होने वाला है क्या ? जब लग्नेश चतुर्थेश योग हो तब
गृह लाभ या भूमि लाभ होगा। किन्तु यह सम्भव तभी होगा जब