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सर्वकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

पृष्ठ 318, कुल 684 में से

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पृष्ठ 318

सोलहवाँ अध्याय : द्वादश भावफल ३१७
होता है। यदि रात्रि में जन्म हो और शनि सुस्थान में शुभ ग्रह
वीक्षित हो और नवमेश बलवान् हो तो जातक का पिता चिरायु
होता है। ॥२३॥
(ग) यदि सूर्य और चन्द्रमा, शनि और मंगल से त्रिकोण में हो
तो बालक के माता पिता उसे छोड़ देंगे किन्तु यदि इन पर (सूर्य
चन्द्र पर) बृहस्पति की दृष्टि हो तो जातक सुखी और चिरायु
होगा। ॥२४॥
(घ) यदि शनि नवमेश होकर चर राशि में बैठे और शुभ-ग्रह
से दृष्ट न हो और सूर्य दुःस्थान में हो तो जातक को उसके पिता
के अतिरिक्त अन्य कोई व्यक्ति पालता है। ॥२५॥
(ङ) यदि नवम स्थान में चर राशि हो और शनि से युत या
दृष्ट हो अथवा नवमेश चर राशि में बैठा हो और श ने से युत वा
दृष्ट हो – इन दोनों में से कोई योग हो और व्ययेश बलशाली हो तो
जातक किसी के यहाँ गोद जाता है। ॥२६॥
( x ) (क) यदि दशम में शुभ-ग्रह हो और दशम का स्वामी बलवान्
होकर अपनी राशि में या अपनी राशि में स्थित होकर केन्द्र या
त्रिकोण में बैठे या लग्न का स्वामी बलवान् होकर दशम में बैठे तो
जातक का राजा के समान भाग्य होता है और वह दीर्घायु भी होता
है। उसके यश का बहुत विस्तार होता है और उसकी प्रवृत्ति भी धर्म-
कर्म में होती है। ॥२७॥
(ख) यदि दशम में सूर्य या मंगल हो तो जातक प्रतापी और
लोक-प्रिय होता है और यदि दशमेश सुस्थान में बैठा हो तो अत्याधिक
प्रताप से कार्य साधन करता है। यदि दशम में सौम्य ग्रह हो तो
जातक प्रशंसा के योग्य उत्तम व्यापार वाली क्रियायें करता है। किन्तु
यदि दशम में शनि राहु या केतु हो तो मनुष्य दुष्कर्म करने वाला
होता है। ॥२८॥