सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

पृष्ठ 313, कुल 684 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 313

३१२ फलदीपिका
करता है किंतु यदि लग्नेश निर्बल हो तो मनुष्य विपत्तियों से आक्रान्त
(घिरा हुआ), रोगों से खिन्न (अर्थात् रोगी) अर्थात् बार-बार रोगों
और विपत्तियों का शिकार बना हुआ दुःखी जीवन व्यतीत करता है।
इन श्लोकों में लग्नेश के बलवान् अथवा दुर्बल-उत्तम स्थान किंवा
दुस्थान में रहने की महिमा बताई गई है। ॥४॥
(ii) (क) यदि द्वितीयेश लग्न में हो और शुभग्रह दूसरे में
हो, तो जातक सर्व उत्कृष्ट गुणों वाला, धनी, सुन्दर मुख वाला, दूरदर्शी
और सत्कुटुम्ब वाला होता है। यदि धनेश का सूर्य से सम्बन्ध हो तो
जातक लोक का उपकार करने वाला, विद्वान् और धनवान् होगा।
यदि धनेश का शनि से सम्बन्ध हो तो जातक की विद्या क्षुद्र (छोटे प्रकार
की) और अल्प होगी। ॥५॥
• (ख) यदि धनेश का बृहस्पति से सम्बन्ध हो तो जातक वेद
और धर्मशास्त्र में विद्वान् होता है। यदि बुध से सम्बन्ध हो तो
अर्थशास्त्र में पटु हो। यदि शुक्र से सम्बन्ध हो तो श्रृंगार सम्बन्धी शास्त्र
में (साहित्य, कामशास्त्र इत्यादि); और चन्द्रमा का द्वितीयेश से सम्बन्ध
हो तो किसी-किसी कला में कुशल हो; यदि मंगल से सम्बन्ध हो तो
क्रूर कलाओं में विद्वान् हो और जातक चुगलखोर भी हो। यदि
राहु द्वितीय स्थान में स्थित हो (या द्वितीयेश के साथ हो) तो स्पष्ट
उच्चारण न करने वाला और यदि केतु द्वितीय में हो तो हकलावे
या असत्य वचन बोलने वाला हो। यदि धनस्थान में पाप-ग्रह हो तो
मनुष्य मूर्ख और निर्धन होता है। ॥६॥
ऊपर श्लोक ५ और ६ में द्वितीयेश के विविध ग्रहों में सम्बन्ध
का जो फल बताया गया है वह फल उस दशा में भी होता है जब
द्वितीय भाव भी विविध ग्रहों से सम्बन्धित हो, ऐसा हमारा
मत है।