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सर्वकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

पृष्ठ 319, कुल 684 में से

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पृष्ठ 319

३१८ फलदीपिका
(xi) (क) (१) लाभेश जिस भाव के स्वामी के साथ हो (२)
लाभेश जिस भाव में हो (३) जो ग्रह या जो भावेश लाभ
में बैठे हों इन तीनों के अनुरूप वस्तु का लाभ कहना चाहिये। उदाहरण
के लिये लाभेश पंचम में बैठे या पंचमेश लाभ में बैठे या लाभेश,
पंचमेश एक साथ हों तो विद्या, पुत्र, बुद्धि, सट्टे से लाभ कहना
क्योंकि पंचम से इनका विचार किया जाता है। इसी प्रकार यदि लाभेश,
सप्तमेश का सम्बन्ध हो या सप्तमेश लाभ में बैठे या लाभेश सप्तम
में बैठे तो स्त्री से, साझेदारी से या व्यापार से लाभ कहना। ॥३०॥
(xii) जो भावेश बारहवें घर में बैठे या बारहवें घर का स्वामी जिस
भाव में बैठे उस भाव के अनुरूप वस्तु का नाश कहे। उदाहरण के
लिये चतुर्थेश व्यय में हो तो सवारी का व्यय, या भूमि का व्यय, व्ययेश
यदि पंचम में हो तो पुत्र द्वारा या सट्टे से धन का व्यय कहना
चाहिये। ॥३०॥
भावसिद्धिकाल
अब यह बताते हैं कि किसी भाव सम्बन्धी फल कब होगा।
भावेशस्थितभांशकोणमपि वा भावं तु वा लग्नपो
लग्नेशस्थितभांशकोणमुदयं वाऽयाति भावाधिपः ।
संयोगेऽपि विलोकनेऽपि च तयोस्तद्भावसिद्धिं तदा
ब्रूयात्कारकयोगतस्तनुपतेर्लग्नाच्च चन्द्रादपि ॥३१॥
किसी भाव की प्राप्ति या फल निम्न लिखित कालों में से किसी
समय होते हैं : (१) भावेश जिस राशि और अंश में हो उस से त्रिकोण
में गोचरवश जब लग्नेश आवे (२) लग्नेश जिस राशि में या उससे
और अंश में है उसमें या उससे त्रिकोण में जब गोचरवश भावेश आवे।