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सर्वकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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पृष्ठ 311

३१० फलदीपिका
धर्मे तदीशे वा मन्दयुक्ते दृष्टेऽपि वा चरे ।
जातो दत्तो भवेन्नूनं व्ययेशे बलशालिनि ॥२६॥
नभसि शुभखगे वा तत्पतौ केन्द्रकोणे
बलिनि निजगृहोच्चे कर्मगे लग्नपे वा ।
महितपृथुयशाः स्याद्धर्मकर्मप्रवृत्तिः
नृपतिसदृशभाग्यं दीर्घमायुश्च तस्य ॥२७॥
ऊर्जस्वी जनवल्लभो दशमगे सूर्ये कुजे वा महत्
कार्यं साधयति प्रतापबहुलं खेशश्च सुस्थो यदि ।
सव्यापारवतीं क्रियां वितनुते सौम्येषु सच्छ्लाघितां
कर्मस्थेष्वहिमन्दकेतुषु भवेद्दुष्कर्मकारी नरः ॥२८॥
लाभेशे यद्भावनाथयुक्ते यद्भावगेऽपि वा ।
भावं तदनुरूपस्य वस्तुनो लाभगैरपि ॥२९॥
व्ययस्थितो यद्भावेशो व्ययेशो यत्र तिष्ठति ।
तस्य भावस्यानुरूपवस्तुनो नाशमादिशेत् ॥३०॥
(i) (क) जातक का शरीर या तो नवांश लग्न के स्वामी के
अनुसार होता है या जन्म-कुण्डली में जो ग्रह सबसे बलवान् हो उसके
समान हो । चन्द्रमा जिस नवांश में हो उस नवांश के स्वामी का
जो वर्ण (रंग-रूप) हो उसी के अनुकूल जातक का वर्ण होगा । मेष
से लेकर बारह राशियों तक काल पुरुष के बारह अंग माने गये हैं;
इसी प्रकार लग्न से लेकर बारहवें भाव तक काल पुरुष के बारह अंग
माने गये हैं, यहाँ पर मन्त्रेश्वर महाराज यह बताते हैं कि यदि लग्न बड़ी
राशि है तो लग्न में शुभ ग्रह होने से जातक का सिर बड़ा और और
सुन्दर होगा । इसी प्रकार भिन्न-भिन्न भावों में कैसी राशि पड़ी है