फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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हो तथा सूर्य नवम में हो तो जातक शत्रु पर विजयी होता है और
शत्रु का नाश होता है। इस श्लोक में पाठान्तर भी है जिसके
अनुसार पाठ हो जायेगा “शत्रुनाशो रिपौ शुभे”। ऐसा पाठ मानने से
सूर्य नवम में हो इसकी बजाय अर्थ होगा; छठे घर में शुभग्रह हो तो
शत्रु पर जातक विजयी होता है।॥१८॥
(घ) (१) छठे घर का स्वामी जिस भावेश के साथ हो। (२)
छठे घर का स्वामी जिस भाव में बैठा हो। (३) जो भावेश छठे घर में
बैठा हो। यह तीनों शत्रुता करेंगे। उदाहरण के लिये षष्ठेश पंचम में
बैठा हों या पंचमेश षष्ठ में बैठा हो या पंचमेश, षष्ठेश एक साथ
बैठे हों तो पुत्र शत्रुता करेगा।॥१९॥
(vii) यदि सातवें भाव का शुभग्रहों से सम्बन्ध हो और सप्त-
मेश बलवान् हो तो जातक की स्त्री सर्वगुणों से युक्त, पति पुत्रवती
और साध्वी होती है।॥२०॥
(viii) (क) अष्टमेश यदि केन्द्र के अतिरिक्त अन्य किसी स्थान
में हो और लग्नेश की अपेक्षा अष्टमेश दुर्बल हो तो न आधि होती है
न विघ्न होते हैं, न क्लेश होते हैं और जातक चिरायु होता है।॥२१॥
(ix) (क) यदि सूर्य या मंगल नवम में हो और नवम का
स्वामी दुःस्थान में पड़ा हो अथवा पापग्रही के मध्य में हो तो जातक
के पिता का मरण हो जाता है अर्थात् जातक का पिता अल्पायु
होता है।॥२२॥
(ख) यदि दिन में जन्म हो और सूर्य सुस्थान में हो तथा शुभ ग्रह
से वीक्षित हो और नवमेश बलवान् हो तो जातक का पिता दीर्घायु
*दक्षिण भारत में नवम से पिता का विचार करते हैं किन्तु उत्तर
भारत में पिता का विचार दशम से किया जाता है।