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परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

श्यामाक्रमः १६३
बायीं एड़ी के घात के साथ करास्फोट करते उत्तर ओर मुँह करके नाराच मुद्रा
से बलि अर्पित कर देना चाहिये।
इसके बाद में हाथ-मुँह धोकर माँ को प्रणाम करने के बाद अन्य कार्यों
में प्रवृत्त होना चाहिये॥३५॥
एवं बलिप्रदानक्रममुक्त्वा सुवासिनीपूजादिकमुपदिशति
श्यामलां शक्तिमाहूय बालया तामभ्यर्च्य तस्या हस्त
आदिमोपादिमौ दत्त्वा तत्त्वं शोधयित्वा तच्छेषमुररीकृत्य योग्यैः सह
हविःशेषं स्वीकुर्यात्।।३६।।
अभ्यर्च्येति विशेषानुक्तेः, यथाविभवम्। तत्त्वं शोधयित्वा इत्यनेन
तत्त्वशोधनमन्त्रा अपि प्राप्ताः। ते च मन्त्राश्चत्वारः प्रसिद्धाः। तैः पात्रचतुष्टयं
ग्राहयित्वा चतुर्थपात्रं सशेषं ग्राहयित्वा तच्छेषं स्वयम् उररीकुर्यात्।
हविश्शेषप्रतिपत्तिमाह—योग्यैरिति। योग्यपदार्थः श्रीक्रमोक्तशिष्टपदेन
व्याख्यातः। इत्थं च तस्य प्रयोजनं तदितिकर्तव्यता, तत् सर्वमपि श्रीक्रमोक्त-
प्रकारेणावगन्तव्यं भवति ।।३६।।
बलिक्रिया के अनन्तर श्यामला शक्ति का आवाहन कर बाला मन्त्र से
उसकी पूजा होनी चाहिये। पूजा के लिये सूत्रकार का स्पष्ट निर्देश है कि,
बाला से पूजा की जानी चाहिये। तत्त्वशोधन मन्त्र प्रसिद्ध है। दीक्षा प्रकरण
के सूत्र ३९ में इसकी चर्चा की गयी है। उन शक्तियों को सभी पात्र समर्पित
कर चतुर्थ पात्र का शेष अंश स्वयं ग्रहण करना चाहिये। खण्ड ५।२२ सूत्र
की व्याख्या में शिष्टशब्द की व्याख्या है। श्रीक्रम के अनुसार सारा समायोजन
उचित है ।।३६।।
एवं सङ्गीतमातृकापूजा कियत्कालं कर्त्तव्या, इत्याकाङ्क्षायां तदवधिमाह
एवं नित्यसपर्यां कुर्वन् लक्षजपं जप्त्वा तद्दशांशक्रमेण होम-
तर्पण-ब्राह्मणभोजनानि विदध्यात् ।।३७।।
एवमुक्तप्रकारेण नित्यसपर्यां नित्यपूजाम्, अत्र कुर्वन्नित्यनेन पूजनस्य
जपाङ्गत्वं गमयति। अतः जपः प्रधानं, तदवधित्वस्य पूजायां कथनात्। अत

१६४ परशुरामकल्पसूत्रम्
एव जपसमाप्तौ पूजानिवृत्तिः। लक्षजपं जप्त्वेति लक्षसंख्याविशिष्टजपोऽनेन
विधीयते। तद्दशांशक्रमेण होमो जपदशांशं, तद्दशांशं तर्पणम्, तद्दशांशं
ब्राह्मणभोजनम् ।।३७।।
सूत्रकार का यह निर्देश है कि, सपर्या नित्य करनी चाहिये। तदनन्तर
जप का विधान है। जप की संख्या भी एक लाख होनी चाहिये। ऐसा निर्देश
है। इस सन्दर्भ में यह ध्यान देना आवश्यक है कि, पूजा प्रधान नहीं होती।
प्रधान जप होता है और पूजा उसकी अङ्ग होती है। एक लाख जप, दश हजार
होम, १ हजार तर्पण और सौ ब्राह्मण भोजन का क्रम अपनाना चाहिये। श्यामा
मन्त्र जप करने वाले के लिये विशेष आचार पालन की भी पद्धति अपनानी
चाहिये ।।३७।।
अथैतन्मनुजापिधर्मानाह
एतन्मनुजापी न कदम्बं छिन्द्यात्, गिरा कालीति न वदेत्।
वीणावेणुनर्त्तन-गायन-गाथा-गोष्ठीषु च न पराङ्मुखो गच्छेत्।
गायकं न निन्द्यात् ।।३८।।
एते धर्मा न जपसमकालिकाः किन्तु जपमारभ्य यावज्जीवम् ।।३८।।
श्यामा मन्त्र जपकर्त्ता आरम्भ काल से जीवनपर्यन्त करे। वह कदम्ब वृक्ष
न काटे। 'काली' शब्द का उच्चारण मुख से न करे। वीणा, वंशा, मूर्च्छना,
नृत्य, संगीत, गाथा, गोष्ठी में रुचि ले। गायक और गायन की कभी निन्दा
न करे।।३८।।
एवं श्यामोपासकानां धर्मानुक्त्वा प्रसङ्गात् ललितोपासकधर्मानप्याह
ललितोपासको नेक्षुखण्डं भक्षयेत्, न दिवा स्मरेद् वार्त्तालीं,
न जुगुप्सेत सिद्धद्रव्याणि, न कुर्यात् स्त्रीषु निष्ठुरतां, वीरस्त्रियं न
गच्छेत्। न तां हन्यात्, न तद्द्रव्यमपहरेत्। नात्मेच्छया मपञ्चक-
मुररीकुर्यात्, कुलभ्रष्टैः सह नासीत, न बहु प्रलपेत्, योषितं
सम्भाषमाणामप्रतिसम्भाषमाणो न गच्छेत्, कुलपुस्तकानि गोपायेत्।
इति शिवम् ।।३९।।

श्यामाक्रमः १६५
इक्षुखण्डमित्यनेन तद्विकाराणाम् गुडशर्करादीनाम् अदोषः सूचितः।
वार्त्तालीं वाराहीम्। सिद्धद्रव्याणि मपञ्चकरूपाणि न जुगुप्सेत। स्वमनसाऽपि न
निन्द्याद् निष्ठुरतां नासिकाच्छेदनादि। वीरस्त्रियमिति षष्ठीतत्पुरुषः, न
कर्मधारयः। न तं हन्याद् इत्यत्र पुंस्त्वस्यानन्वयानुपपत्तेः। तं वीरं। तद्द्रव्यं
वीरद्रव्यम्। आत्मेच्छया स्वेन्द्रियतृप्तये। उररीकुर्यात् स्वीकुर्यात्। अप्रति-
सम्भाषमाणः प्रत्युत्तरमदत्त्वा कुलपुस्तकानि कुलशास्त्रपुस्तकानि।।३९।।
।। इति श्रीपरशुरामकल्पसूत्रे श्रीरामेश्वरनिर्मितायां सौभाग्योदयनाम्न्यां
श्रीपरशुरामकल्पसूत्रवृत्तौ (मुख्यांशमात्रायां) श्यामाक्रमो
नाम षष्ठः खण्डः सम्पूर्णः ।।६।।
ललितोपासक के आचार—
१. ऊख (गन्ना) न चूसे। २. दिन में वाराही का स्मरण न करे। ३.
मपञ्चक द्रव्यों की निन्दा न करे। ४. स्त्रियों के प्रति निष्ठुर न बने। नाक, कान
आदि का छेदन न करे। ५. वीरों की स्त्रियों को सहतल्पभागी न बनाये। वीर-
वध न करे। वीर द्रव्यों का अपहरण न करे। ६. अपनी इन्द्रियतृप्ति के लिये
मपञ्चक का उपयोग न करे। ७. कुलाचारहीन व्यक्ति के साथ कभी न रहे। ८.
बक बक न करे। ९. एक स्त्री बात करना चाहे या कर रही हो, तो उससे
स्वयं भी बातें करें। १०. कुल-पुस्तकों की रक्षा करे। ये आचार अत्यन्त
आवश्यक और अनिवार्य हैं। ललितोपासक को इन नियमों को मनोयोगपूर्वक
निभाना चाहिये।।३९।। इति शिवम् ।।
।। श्रीरामेश्वरकृत मुख्यांश-सौभाग्योदयवृत्तिसहित
डॉ. परमहंसमिश्रकृत नीर-क्षीर-विवेक भाषा-भाष्य-समन्वित
श्रीपरशुरामकल्पसूत्र का श्यामाक्रम नामक षष्ठ खण्ड परिपूर्ण ।।६।।
।। शुभं भूयात् ।।

वाराहीक्रमः
[ सप्तमः खण्डः ]
अथ वाराह्युपासनां वक्तुं प्रक्रमते
इत्थं साङ्गां सङ्गीतमातृकामिष्ट्वा संवित्साम्राज्ञी सिंहासना-
धिरूढाया ललिताया महाराज्ञा दण्डनायिकास्थानीयां दुष्टनिग्रह-
शिष्टानुग्रहनिर्गलाज्ञाचक्रां समयसङ्केतां कोलमुखीं विधि-
वद्वरिवस्येत् ।। १ ।।
इत्थं पूर्वोक्तप्रकारेण साङ्गां सावरणां सङ्गीतमातृकां मातङ्गीमिष्ट्वा
सम्पूज्य समुपास्य। अनेन सङ्गीतमातृकायागोत्तरकालस्य श्रीवाराह्युपासनाङ्गत्त्व-
मात्रं विधीयते। संविदः परशिवस्य वा साम्राज्ञी पट्टमहिषी तद्रूपायाः सिंहासनं
राज्ञः सदसि सर्वोत्तमत्वेनावस्थितमासनं तदधिरूढाया ललिताया महाराज्ञा
दण्डनायिकाया यत् स्थानं, तदीया स्वामिनी दुष्टनिग्रहाधिकारवती या ताम्।
दुष्टनिग्रहादौ निरर्गलम् अन्यानपेक्षं यदाज्ञाचक्रं तद्वतीम्। समयो गुप्तः सङ्केतः
शास्त्रपद्धतिर्यस्यास्तां 'समयो रहसि प्रोक्तः काले कार्यक्षमेऽपि वा' इति
त्र्यक्षरकोशः (विश्वकोषः)। कोलो वराहस्तस्य मुखमिव मुखं यस्यास्तां विधिवद्
वरिवस्येत् पूजयेत् ।।१।।
छठें खण्ड में सङ्गीतमातृका माता मातङ्गी की पूजा की चर्चा है। उस
विधान को पूरा करने के बाद ही वाराही उपासना की विधि अपनायी जानी
चाहिये। यहाँ इष्ट्वा में पूर्वकालिकक्रिया का प्रयोग है। अतः पूर्वकाल में
सङ्गीतमातृका मातङ्गी की उपासना प्रधान उपासना के रूप में पूरी कर लेने के
बाद ही अङ्गपूजा के रूप में वाराही माँ की पूजा करनी चाहिये। संवित् साम्राज्ञी

वाराहीक्रमः १६७
परशिवशक्तिमयी संविन्मयी पट्टमहिषी सिंहासनासीन राजराजेश्वरी ललिताम्बा की
दण्डनायिका माँ वाराही सर्वथा प्रणम्य और पूज्य हैं। दुष्टों को नियन्त्रित करने
और शिष्टों पर अनुग्रह करने के निरर्गल अधिकार से यह सम्पन्न हैं। अन्यानपेक्षा
आज्ञा के अधिकार से यह सम्पन्न हैं। अन्यानपेक्षा आज्ञा की अधिकारिणी कोल
के समान मुखवाली माँ वाराही की उपासना करनी चाहिये। यह अत्यन्त
रहस्यमयी समयसङ्केता विद्या है।।१।।
तत्र कथंभावाकाङ्क्षायामाह
तत्रायं क्रमो महारात्रे बुद्ध्वा स्वहृदयपरमाकाशे ध्वनन्त-
मनाहतध्वनिमूर्जितानन्ददायकमवमृश्य ।।२।।
तत्र वाराह्युपास्तावायं क्रमः प्रकारः। महारात्रे इति। धूर्त्तस्वामिभाष्ये
महारात्रिस्त्रिभागावशिष्टा रात्रिः। यद्वा महारात्रिः निशीथः। 'महारात्रिसमुत्पन्नः
कृष्णो गोपालनन्दनः' इति ब्रह्मवैवर्त्तात्। कृष्णजन्मार्धरात्रे इति प्रसिद्धत्वात्।
तस्मिन् समये बोधोत्तरकालीनक्रियामाह—स्वहृदयेति। स्वहृदयरूपो यः परम
उत्कृष्ट आकाशस्तस्मिन् ध्वनन्तं शब्दं कुर्वन्तम् अनाहतस्य द्वादशदल-
कमलस्य ध्वनिं कराभ्यां कर्णपिधाने श्रूयमाणे यः शब्दः सोऽनाहतशब्द
इत्युच्यते। स मध्यरात्रे कर्णपिधानाभावेऽपि अनुभूयते। कथंभूतम्? ऊर्जितः
सिद्धो य आनन्दस्तस्य दायकम्। अभिव्यञ्जकम् अवमृश्य अनुसन्धाय कञ्चित्
कालं श्रुत्वेत्यर्थः ।।२।।
वाराही की उपासना का यह निर्धारित क्रम है। 'महारात्र' एक योगरूढ
शब्द है। 'धूर्त्तस्वामी' नामक भाष्यकार ने इसके भाष्य के सन्दर्भ में 'महारात्र'
का एक विग्रह प्रस्तुत किया था। उसके अनुसार त्रिभागावशिष्ट रात्रिकाल ही
महारात्र मानना चाहिये। रात्रि की बारह घड़ी के समय को तीन भागों में बाँटने
पर और आठ घड़ी बीत जाने पर शेष चार घड़ी रात को महारात्र की संज्ञा
दी जाती है।
एक दूसरा अर्थ भी अभिप्रेत है। अर्धरात्रि को निशीथ कहते हैं। यह
निशीथ काल ही महारात्र काल है। ब्रह्मवैवर्त्तपुराण में यह उल्लेख है कि, भगवान्
श्रीकृष्ण महारात्रिकाल में उत्पन्न हुए थे। यह लोकप्रसिद्ध सत्य है। जन्माष्टमी

१६८ परशुरामकल्पसूत्रम्
की अर्धरात्रि में ही कृष्णजन्म मनाया जाता है। अर्धरात्रि का निशीथ समय चतुर्थ
सन्ध्या का पुण्यप्रद समय भी है। उपासक उस अवस्था का एकान्त सदुपयोग
करता है। उस समय श्रीविद्यासाधक को अनिवार्यतः जगे रहना चाहिये। जगकर
उस समय क्या करना चाहिये, इसका निर्देश कर रहे हैं—
शरीर की संरचना की ओर साधक का ध्यान आकृष्ट करते हुए सूत्रकार
कह रहे हैं कि, मनुष्य का हृदय एक आकाश है। यह परम उत्कृष्ट आकाश
है, उस द्वादशदल कमल रूप आकाश-देश से एक स्वाभाविक शब्द ध्वनित
होता रहता है। हाथों से कान दबा लेने पर वह विचित्र शब्द सुनाई पड़ता
है। वह मध्यरात्र में बाह्य शब्दों के शान्त रहने पर कान विना बन्द किये
भी सुनाई देता है। यह श्रवण एक प्रकार का श्रवणानुभव सदृश माना जाता
है। उस अनाहत शब्द की श्रुत्यनुभूति में एक प्रकार की आनन्दमयी ऊर्जा
का उल्लास होता है। ऐसे ऊर्जस्वल आनन्द को प्रदान करने वाली यह
अनाहत ध्वनि है। इसका अनुसन्धान साधक को उस समय अवश्य करना
चाहिये॥२॥
शिवादिगुरुनमस्कारः
‘शिवादिश्रीगुरुभ्यो नमः’ इति मूर्ध्नि बध्नीयादञ्जलिम् ॥३॥
शिवादि इति स्पष्टम् ॥३॥
आदिगुरु शिव माने जाते हैं। गुरुजनों के प्रणाम करने के अवसर पर
सर्वप्रथम शिव को ही नमस्कार करना चाहिये। इसके बाद अन्य गुरुजनों का
नमस्कार विहित है। प्रणाम करते हुए शिर पर अञ्जलि बाँधकर मस्तक झुकाने
का भी क्रम अपनाना चाहिये। इस प्रक्रिया में श्रद्धा का प्राधान्य रहना
चाहिये॥३॥
वाराहीपद्धतौ सर्वमन्त्रेषु बीजविशेषस्य योगमाह
वाचमुच्चार्य ‘ग्लौं’ इति च पद्धतावस्यां सर्वे मनवो
जप्याः ॥४॥
अस्यां पद्धतौ सर्वमन्त्रादौ, ‘ऐं ग्लौं’ इति योज्यमित्यर्थः ॥४॥

वाराहीक्रमः १६९
वाराही उपासना के क्रम में सर्वप्रथम जिस नियम पर ध्यान देना चाहिये,
वह है कि, वाक् अर्थात् 'ऐं' बीज मन्त्र के साथ 'ग्लौं' बीज का सभी मन्त्रों
के आदि में प्रयोग करना चाहिये॥४॥
अथ भूतशुद्धिं विधत्ते
मूलादिषण्मन्त्रैर्यथामन्त्रं लिङ्गदेहं शोधयेत् ॥५॥
मूलादिषण्मन्त्रैरधस्तन एव सूत्रे वक्ष्यमाणैः, यथामन्त्रैः, मन्त्रे तथा
लिङ्गदेहं सूक्ष्मदेहं शोधयेत् ॥५॥
आगे के मन्त्र में छः मूलादि मन्त्र कहे गये हैं। उनके अनुसार सूक्ष्मदेह
का शोधन करना चाहिये। यह शास्त्र का आदेश है॥५॥
तान् षण्मन्त्रान् आह
मूलशृङ्गाटकात् सुषुम्नापथेन 'जीवशिवं परशिवे योजयामि
स्वाहा' 'यं सङ्कोचशरीरं शोषय शोषय स्वाहा' 'रं सङ्कोचशरीरं दह
दह पच पच स्वाहा'। 'लं शाम्भवशरीरमुत्पादय स्वाहा'
'हंसः सोहमवतरावतर शिवपदात् जीवसुषुम्नापथेन प्रविश,
मूलशृङ्गाटकमुल्लसोल्लस ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल हंसः सोहं
स्वाहा' इति भूतशुद्धिं विधाय ॥६॥
स्वाहेत्यत्रैकमन्त्रसमाप्तिः। सुषुम्णामार्गेण परशिवे शिवयोजनशोषण-
दाहनाप्लावनशाम्भवशरीरोत्पत्ति-जीवस्वस्थाननयनानि क्रमेण षण्मन्त्रैः
कुर्यात्॥६॥
इस सूत्र में छः मन्त्रों के प्रयोग के साथ ही साथ भूतशुद्धि के सन्दर्भ
में जिस साधना-प्रक्रिया का उल्लेख किया गया है, वह उपासना को नव्य आयाम
देने वाला है। साधना का सारा सन्दर्भ इसमें है। इसे सम्पन्न कर लेने के बाद
दिव्यता की नयी भूमिका में उपासक प्रवेश कर जाता है।
१. सर्वप्रथम आसन पर विराजमान उपासक मूलाधार चक्र से सुषुम्णा
नाड़ी के मार्ग से अपने जीवशिव को परशिव में संयोजन करने की प्रक्रिया

१७० परशुरामकल्पसूत्रम्
अपनाता है। यह क्रिया मात्र ध्यान की कल्पना मात्र नहीं होती। यह सूत्रप्रोक्त
मन्त्र के माध्यम से चक्र-साधना में निष्णात व्यक्ति ही कर सकता है। जीवशिव
का परशिव में समायोजन औन्मनस दशा की परा भूमि पर ही सम्पन्न हो सकता
है, इस सम्बन्ध में अधिक कहना उचित नहीं। इस प्रथम प्रक्रिया का मन्त्र है—
‘जीवशिवं परशिवे योजयामि स्वाहा’। दूसरी प्रक्रिया इस ज्ञान पर आधारित है
कि, सङ्कोच से मिला यह शरीर पराविद्या प्राप्ति के लिये पर्याप्त नहीं है। इसलिये
इसमें आयी संकोच की आर्द्रता सूख जाय, इसे जला दिया जाय, जले भस्म
को शिवामृत प्रवाह में बहा दिया जाय, तब शाम्भव शरीर को उत्पादित कर
जीवशिव को शिवपद से उसी शाम्भव शरीर में प्रवेश करा दिया जाय। उसी
नवनिष्पन्न प्रकाशमान शाम्भव शरीर की दिव्यता में स्वात्म को प्रतिष्ठित कर
माँ की उपासना की जाय। यह सब प्रकल्पन की क्रिया होती है और बड़ी
महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया है। इसमें पाँच मन्त्रों द्वारा पाँच प्रकार के प्रकल्पन हैं, जो
क्रम इस प्रकार है—
२. शोषण—‘यं सङ्कोचशरीरं शोषय शोषय स्वाहा’।
३. दाहन—‘रं सङ्कोचशरीरं दह दह पच पच स्वाहा’।
४. आप्लावन—‘वं परमशिवामृतं वर्षय वर्षय स्वाहा’।
५. शाम्भवशरीरोत्पादन—‘लं शाम्भवशरीरमुत्पादयोत्पादय स्वाहा’।
६. जीवस्वस्थानानयन—‘हंसः सोऽहमवतरावतर शिवपदाज्जीवसुषुम्णापथेन-
प्रविश मूलशृङ्गाटकमुल्लसोल्लस ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल हंसः सोहं
स्वाहा’।
इन मन्त्रों के द्वारा गुरुनिर्दिष्ट क्रमानुसार स्वात्म को दिव्य बना लेना
आवश्यक है। इसके बाद ही आगे की उपासना-प्रक्रिया अपनायी जाती है ।।६।।
अथ मातृकासम्पुटिताभ्यां बीजाभ्यां न्यासमाह
[L25

वाराहीक्रमः १७१
मातृकाभिः आदिक्षान्तैः सम्पुटितां द्वितारीप्रकृतत्वाद् ऐं ग्लौं। तद्यथा
आदिक्षान्तं प्रथमं सबिन्दु उच्चार्य मध्ये ऐं ग्लौं इति वर्णबीजद्वयं पुनरपि
आदिक्षान्तं ततो नमःपदं न्यासरूपत्वात्। एवं वक्ष्यमाणैकचत्वारिंशत्स्थानेषु
न्यसेदित्यर्थः। कं शिरः 'कं शिरोऽम्बुनोः' इत्यमरः। आननवृत्तं मुखवृत्तम्,
अक्षिद्वयं, श्रोत्रद्वयं, नासाद्वयम्, गण्डद्वयम्, ओष्ठद्वयं, दन्तपक्तिद्वयम्, मूर्धा
(शिरोरन्ध्र) आस्यं गुहारूपं, दोर्द्वयं, पादसन्धिद्वयं, पादाग्रद्वयं, पृष्ठः, नाभिः,
जठरं, कुक्षिः, हृद्वक्षः, दोर्मूलं, गलस्यापरभागः, पाश्चात्यदेशः, कक्षः,
पुनर्वामपार्श्वे हृदादिकक्षपर्यन्तं पाणिद्वयं, पादद्वयं, पुनर्जठरं, पुनराननम्, एवम्
एकचत्वारिंशत्स्थाने मातृकासम्पुटितां द्वितारीं न्यसेत् ॥७॥
अ से क्ष पर्यन्त ५० वर्णों की मातृका के प्रत्येक वर्ण में बिन्दु लगाकर
बोलने के बाद वार्त्ताली बीज 'ऐं ग्लौं'—बोलकर पुनः मातृका के अ क्ष वर्ण
सबिन्दु बोले जाने पर एक सम्पुट मन्त्र बनता है। ऐसे मन्त्र को इकतालीस
बार इकतालीस अङ्गों पर बोलकर नमः के साथ न्यास करना चाहिये। इकतालीस
शरीर के अङ्ग सूत्र में निर्दिष्ट हैं—
१ शिर, १ मुखवृत्त, २ नेत्र, २ कर्ण, २ नासापुट, २ कपोल, २ ओष्ठ,
२ दन्तपङ्क्ति, १ ब्रह्मरन्ध्र, १ मुखान्त, २ दोर्मूल, २ मध्यसन्धि, २ मणिबन्ध,
२ अङ्गुल्यग्र, २ उरुमूल, २ जानु, २ पादसन्धि, २ पार्श्व, १ नाभि, १ पृष्ठ,
१ जठर, १ वक्ष, २ हाथ, २ पाद, १ हृदादि-मूर्द्धान्त कुल मिलकर ४१
होते हैं॥७॥
अङ्गुलिन्यासः
अन्धेप्रभृति सप्तार्णपञ्चकमङ्गुष्ठादि-कनिष्ठान्तम् ।।८।।
अत्रापि पूर्वसूत्राद्विन्यस्येत्यस्यानुवृत्तिः। 'अन्धे अन्धिनि नमः' इत्यादि।
'स्तम्भे स्तम्भिनि नमः' इत्यन्तैः पञ्चभिः सप्तार्णमन्त्रैरङ्गुष्ठादिकनिष्ठान्त-
क्रमेण विन्यस्य। मन्त्रस्वरूपं तु—अन्धे अन्धिनि नमः अङ्गुष्ठाभ्यां नमः।
एवमग्रेऽप्यूह्यम्। इत्यङ्गुलिन्यासः ॥८॥
अङ्गुलियों पर न्यास करने के पहले मूलमन्त्र के पहले का भाग वाराहमुखि
तक बोलकर—

१७२ परशुरामकल्पसूत्रम्
१. अन्धे अन्धिनि नमः अङ्गुष्ठाभ्यां नमः,
२. रुन्धे रुन्धिनि नमः तर्जनीभ्यां नमः,
३. जम्भे जम्भिनि नमः मध्यमाभ्यां नमः,
४. मोहे मोहिनि नमः अनामिकाभ्यां नमः और
५. स्तम्भे स्तम्भिनि नमः कनिष्ठिकाभ्यां नमः बोलकर 'अस्त्राय फट्' तक मन्त्र
पूरा कर देना चाहिये। १ से ५ तक के सभी मन्त्र सात-सात अक्षरों के हैं।
इसीलिये इन्हें सप्तार्ण मन्त्र कहते हैं॥८॥
अथ हृदयादिन्यासः
वाङ्नमो भगवतीत्यारभ्य त्रयोदशभिर्हृदयं षड्भिः शिरः,
दशभिः शिखां, सप्तभिः सप्तभिः कवचनेत्रास्त्राणि विन्यस्य।।९।।
वागित्यारभ्य मूलमन्त्रत्रयोदशादिमवर्णैर्हृन्मन्त्रसहितैः शिखायाम्, तदग्रि-
सप्तवर्णैः कवचमन्त्रसहितैः नेत्रेषु, तदग्रिमसप्तवर्णैः अस्त्रमन्त्रसहितैः अस्त्रं च
विन्यसेत्। मन्त्रस्वरूपं यथा—ऐं ग्लौं ऐं नमो भगवति वार्त्तालि वार्त्तालि
हृदयाय नमः। एवमग्रेऽपि योज्यम्। इति हृदयादिषडङ्गन्यासः ॥९।।
हृदयादि न्यास का विधान इस सूत्र में दिया गया है। सर्वप्रथम द्वितारी
का प्रयोग कर सूत्र के अनुसार वाग्बीज 'ऐं' का उच्चारण करना चाहिये। पुनः
मूलमन्त्र के १३ वर्णों से हृदय में, छः वर्णों से शिर पर, दश वर्णों से शिखा
में, तथा सात-सात से कवच, नेत्र और अस्त्र में विन्यास होना चाहिये। मन्त्रों
का स्वरूप इस प्रकार होना चाहिये—
१. ऐं ग्लौं ऐं नमो भगवति वार्त्तालि वार्त्तालि हृदयाय नमः।
२. ऐं ग्लौं वाराहि वाराहि शिरसे स्वाहा।
३. ऐं ग्लौं वराहमुखि वराहमुखि शिखायै वषट्।
४. ऐं ग्लौं अन्धे अन्धिनि नमः कवचाय हुम्।
५. ऐं ग्लौं रुन्धे रुन्धिनि नमः नेत्रत्रयाय वौषट्।
६. ऐं ग्लौं जम्भे जम्भिनि नमः अस्त्राय फट्।
इस तरह मूल मन्त्र से हृदयादि न्यास का विधान सूत्रानुसार पूरा
होता है ॥९॥

वाराहीक्रमः १७३
आत्मालङ्करणम्
गन्धादिभिरलङ्कृत्य अर्घ्यं शोधयेत् ॥१०॥
आदिपदेन शस्त्रभूषणादिपरिग्रहः। आत्मानमिति शेषः। अर्घ्यं शोधये-
दित्यस्य अग्रिमसूत्रेण सहान्वयः॥१०॥
वस्तुतः यह सूत्र ग्यारहवें सूत्र का पूरक सूत्र है। इसमें किसी प्रक्रिया
अथवा विधि की चर्चा नहीं है। अर्घ्यशोधन के पूर्व साधक को स्वयं आकर्षक
रूप से सजा लेना चाहिये। कपड़े सुन्दर हों, गहने के रूप में गले में स्वर्णमाला,
अङ्गुलिभाग में अँगूठियाँ आदि पहन लेनी चाहिये। इसके बाद अर्घ्य का शोधन
होता है॥१०॥
अथ अर्घ्यशोधनमाह
आत्मनोऽग्रभागे गोमयेन विलिप्ते, हेतुमिश्रितजलेन चतुरस्रं
वर्त्तुलं षट्कोणं त्रिकोणमन्तरान्तरं विलिख्य, अर्घ्यशोधनमनुभिः
श्यामाक्रमोक्तैः आधारार्घ्यपात्राणि संशोध्य सामान्येनाभ्यर्च्य तदर्घ्यं
वषडित्युद्धृत्य, स्वाहेति संस्थाप्य हुं इत्यवकुण्ठ्य वौषट्
इत्यमृतीकृत्य फडिति संरक्ष्य, नमः पुष्पं निक्षिप्य, मूलेन निरीक्ष्य,
तत्पृषतैः पावयित्वा सपर्यावस्तुनि ॥११॥
हेतुमिश्रितेन प्रथममिश्रितेन। चतुरस्रादिमण्डलं प्रवेशरीत्या, चतुरस्रस्य
सर्वबाह्यत्वेन भूरिदर्शनात्। अनन्तरान्तरं परस्परमसंलग्नं यथा तथा मण्डलं
कुर्यात्। अत्र विशेषांशमुक्त्वा शेषधर्मानतिदिशति-अर्घ्यशोधनेनेति। सामान्येन
समस्तमूलमन्त्रेण। शेषं स्पष्टम्। तदर्घ्यं सपर्यावस्तूनीत्यन्तं स्पष्टोऽर्थः।
एतावत्पर्यन्तं विहितमर्घ्यशोधनं सामान्यविशेषार्घ्ययोः समानम्
अविशेषेणोक्तेः ॥११॥
गोमय से लिपी-पुती भूमि अत्यन्त पवित्र मानी जाती है। उसी भूमि पर
हेतु द्रव्यमिश्रित जल से चतुरस्र वर्त्तुल षट्कोण त्रिकोण मण्डल का इस प्रकार
निर्माण होना चाहिये कि, वे एक-दूसरे से बिना स्पर्श किये अन्तर-अन्तर पर
रहें। अर्घ्यशोधन के मन्त्रों से श्यामाक्रम के अनुसार शोधन करते हैं। यह ठीक

१७४ परशुरामकल्पसूत्रम्
नहीं। सामान्य मूलमन्त्र से शोधन का विधान है। इसी से अर्चना भी होनी
चाहिये। षड् जाति मन्त्र द्वारा इसका उद्धार कर स्वाहा मन्त्र से संस्थापित करे।
हुं बीज से उसका अवगुण्ठन करना आवश्यक है। वौषट् से अमृतीकरण, फट्
जाति मन्त्र से संरक्षण देकर 'नमः' इस मन्त्र से फूलों को मण्डप में छींट देना
चाहिये। मूल मन्त्र से अच्छी तरह देखकर अर्घ्य के पवित्र जल-बिन्दुओं से सपर्या
प्रक्रिया में समुपस्थित सारी सामग्री को पवित्र कर लेना चाहिये।।११।।
पुनरप्यर्घ्यशोधनानन्तरं कर्त्तव्यन्यासानाह
शिरोवदनहृद्गुह्यपादेषु पूर्वोक्तसप्तकपञ्चकं विन्यस्य विद्या-
मष्टधा खण्डयित्वा पादादिजानु-जान्वादिकटि-कट्यादिनाभि-
नाभ्यादिहृदय-हृदयादिकण्ठकण्ठादिभ्रूमध्य-भ्रूमध्यादिललाट-
ललाटादिमौलिषु एकत्रिशंत् सप्त सप्त सप्त सप्त सप्त
पञ्चत्रिंशदेका-दशार्णखण्डान् मातृकास्थानेषु मूलमनुपदानि च
न्यस्य ।।१२।।
शिरोवदनेति। पूर्वोक्तसप्तार्णमन्त्रपञ्चकं शिर आदि पञ्चसु स्थानेषु
न्यसेत्। पादद्वयं मिलित्वैकं स्थानम्, विद्यामिति, मूलविद्याम् अष्टधा खण्ड-
यित्वा विभज्य क्रमेण अष्टखण्डानष्टसु स्थानेषु विन्यसेदित्यर्थः। स्थानानि
तानि कानि इत्याकाङ्क्षायामाह—पादादि-जान्विति, ललाटादिमौलीत्यन्तेन।
पादादि-जान्वित्यत्र जानुपर्यन्तमित्यर्थः। तेन प्रथमखण्डन्यासे जान्वन्व-
वलेशो न। एवमग्रेऽपि। अष्टधा खण्डयेदित्युक्तम्। तत्रैकखण्डे कियन्तो वर्णा
इत्याकाङ्क्षायाम् आह—एकत्रिंशदित्यादिना। मूलस्य खण्डाष्टकं क्रमादेक-
त्रिंशदादिसङ्ख्याकं भवतीत्यर्थः। इत्यष्टखण्डन्यासः। मूलपदन्यासमाह—
मातृकास्थानेषु इति। मातृकास्थानानि शिरः १ मुखवृत्तं २ नेत्रद्वितयं ४ कर्णद्वयं
६ नासाद्वयं ८ कपोलद्वयम् १० ओष्ठद्वयं १२ दन्तपङ्क्तिद्वयं १४ जिह्वा
१५ ब्रह्मरन्ध्रं १६ दक्षदोर्मूलं १७ बाहुमध्यं १८ मणिबन्धः १९ अङ्गुलिमूलम्
२० अङ्गुल्यग्रम् २१ एवंवामदोर्मूलादारभ्य अङ्गुल्यग्रान्तं पञ्च २६ दक्षोरूमूलं
२७ दक्षजानु २८ तत्पादसन्धिः २९ तत्पादाङ्गुलिमूलं ३० तदङ्गुल्यग्रम् =
३१ एवं वामभागे पञ्च = ३६ पार्श्वद्वयं = ३७ पृष्ठं ३८ नाभ्यूरुजठराणि

वाराहीक्रमः १७५
(त्रीणि) ४१ हृदि ४२ स्कन्धद्वयं ४४ गलापरभागः ४५ हृदयादिदक्षपाण्यन्तं
४६ हृदयादिवामपाण्यन्तं ४७ हृदयादिदक्षपादान्तं ४८ हृदयादिवामपादान्तं
४९ नाभिमूर्धनी ५१ एवमेकपञ्चाशत् स्थानानि।
एवमेकपञ्चाशत्स्थानेषु मूलमन्त्रस्य एकपञ्चाशत्पदानि न्यसेत् ।।१२।।
इस सूत्र में पहले कहे गये सप्तार्ण मन्त्रपञ्चक न्यास, मूलविद्या का
अष्टखण्ड न्यास और मातृका-स्थानों में मूलविद्या के पदन्यासों का अर्थात् तीन
प्रकार के न्यासों का निर्देश दिया गया है। इनका क्रमिक रूप से इस प्रकार
का विधान करना चाहिये—
१. सप्तार्णमन्त्रपञ्चक न्यास
अ—ऐं ग्लौं अन्धे अन्धिनि नमः शिरसि।
आ—ऐं ग्लौं रुन्धे रुन्धिनि नमः वदने।
इ—ऐं ग्लौं जम्भे जम्भिनि नमः हृदि।
ई—ऐं ग्लौं मोहे मोहिनि नमः गुह्ये।
उ—ऐं ग्लौं स्तम्भे स्तम्भिनि नमः पादयोः।
२. अष्ट खण्डों में मूलमन्त्रन्यास-
अ. 'ऐं ग्लौं ऐं नमो भगवति वार्त्तालि वार्त्तालि वाराहि वाराहि वराहमुखि
वराहमुखि' इससे आपादजानुपर्यन्त।
आ. 'ऐं ग्लौं अन्धे अन्धिनि नमः' से जानु से कटि पर्यन्त।
इ. 'ऐं ग्लौं रुन्धे रुन्धिनि नमः' से कटि से नाभि पर्यन्त।
ई. 'ऐं ग्लौं जम्भे जम्भिनि नमः' से नाभि से हृदय पर्यन्त।
उ. 'ऐं ग्लौं मोहे मोहिनि नमः' से हृदय से कण्ठ तक।
ऊ. 'ऐं ग्लौं स्तम्भे स्तम्भिनि नमः' से कण्ठ से भ्रूमध्य तक।
ऋ. 'ऐं ग्लौं सर्वदुष्टप्रदुष्टानां सर्वेषां सर्ववाक्चित्तचक्षुर्मुखगतिजिह्वास्तम्भनं
कुरु कुरु शीघ्रं वश्यं नमः' इतने मन्त्रांश से भ्रूमध्य से ललाटपर्यन्त
न्यास करना चाहिये और आठवें मुख्यांशरूप—

१७६ परशुरामकल्पसूत्रम्
‘ऋ. ‘ऐं ग्लौं ठः ठः ठः ठः हुं अस्त्राय फट्’ से ललाट से ब्रह्मरन्ध्र पर्यन्त
न्यास करना चाहिये। इस प्रकार पूरे मन्त्र को ८ खण्डों में बाँट-
कर पैर से ब्रह्मरन्ध्र तक का मन्त्रन्यास पूरा होता है।
३. मातृका स्थानों में मूल विद्या के पदों का न्यास इस प्रकार करना
चाहिये—
क्रम, मूलविद्या के अंश, मातृका स्थान।
१. ऐं ग्लौं ऐं १. शिरसि (मातृका स्थानों का स्पर्श करना चाहिये)
२. नमः २. मुखवृत्ते
३. भगवति ३. दक्षनेत्रे
४. वार्त्तालि ४. वामनेत्रे
५. वार्त्तालि ५. दक्षकर्णे
६. वाराहि ६. वामकर्णे
७. वाराहि ७. दक्षनासापुटे
८. वराह ८. वामनासापुटे
९. मुखि ९. दक्षकपोले
१०. वराह १०. वामकपोले
११. मुखि ११. ऊर्ध्वोष्ठे
१२. अन्धे १२. अधरोष्ठे
१३. अन्धिनि १३. ऊर्ध्वदन्तपङ्क्तौ
१४. नमः १४. अधोदन्तपङ्क्तौ
१५. रुन्धे १५. जिह्वायाम्
१६. रुन्धिनि १६. ब्रह्मरन्ध्रे
१७. नमः १७. दक्षदोर्मूले
१८. जम्भे १८. बाहुमध्ये
१९. जम्भिनि १९. मणिबन्धे
२०. नमः २०. अङ्गुलिमूले
२१. मोहे २१. अङ्गुल्यग्रे
२२. मोहिनि २२. वामदोर्मूले
२३. नमः २३. वामबाहुमध्ये

वाराहीक्रमः १७७
२४. स्तम्भे २४. वामबाहुमध्ये
२५. स्तम्भिनि २५. वाममणिबन्धे
२६. नमः २६. वामाङ्गुल्यग्रे
२७. सर्व २७. दक्षोरुमूले
२८. दुष्ट २८. दक्षजानौ
२९. प्रदुष्टानां २९. दक्षपादसन्धौ
३०. सर्वेषां ३०. दक्षपादाङ्गुलिमूले
३१. सर्व ३१. दक्षाङ्गुल्यग्रे
३२. वाक् ३२. वामोरुमूले
३३. चित्त ३३. वामजानौ
३४. चक्षुः ३४. वामपादसन्धौ
३५. मुख ३५. वामपादाङ्गुलिमूले
३६. गति ३६. वामाङ्गुल्यग्रे
३७. जिह्वा ३७. पार्श्वद्वये
३८. स्तम्भनं ३८. पृष्ठे
३९. कुरु ३९. नाभौ
४०. कुरु ४०. ऊर्वोः
४१. शीघ्रं ४१. जठरे
४२. वश्यं ४२. हृदि
४३. ऐं ४३. दक्षस्कन्धे
४४. ग्लौं ४४. वामस्कन्धे
४५. ठः ४५. गलापरभागे
४६. ठः ४६. हृदयादिदक्षपाण्यन्तम्
४७. ठः ४७. वामपाण्यन्तम्
४८. ठः ४८. हृदयादिदक्षपादान्तम्
४९. हुं ४९. हृदयादिवामपादान्तम्
५०. अस्त्राय ५०. नाभौ
५१. फट् ५१. मूर्ध्नि
परशुरामकल्पसूत्रानुसार और रामेश्वरवृत्ति के अनुसार इसी क्रम से न्यास
करना चाहिये। इस प्रकार तीनों सूत्रोक्त न्यास पूरे करने चाहिये।।१२।।

१७८ परशुरामकल्पसूत्रम्
तत्त्वन्यासमाह
पूर्वोक्तानष्टखण्डानेकैकश उच्चार्य पूर्वोक्तेषु स्थानेषु 'ह्रां'
शर्वाय क्षितितत्त्वाधिपतये' 'ह्रीं' भवाय अम्बुतत्त्वाधिपतये, ह्रुं रुद्राय
वह्नितत्त्वाधिपतये' 'हैं' उग्राय वायुतत्त्वाधिपतये' 'ह्रौं' ईशानाय
भानुतत्त्वाधिपतये, 'सौ' महादेवाय सोमतत्त्वाधिपतये, 'हं' महादेवाय
यजमानतत्त्वाधिपतये' 'औं' भीमाय आकाशतत्त्वाधिपतये नम इति
तत्त्वन्यासः ॥१३॥
पूर्वोक्तानेकत्रिंशत्सप्तेत्यादिना खण्डितान् अष्टखण्डान् पादादि-
जान्वित्यादिस्थानेषु सर्वत्र। तत्त्वाधिपतये एतदनन्तरं 'नमः' इति पदस्यानुषङ्गेण
योगः। इति तत्त्वन्यासः ॥१३॥
१. पादादिजानुपर्यन्त ५. हृदयादिकण्ठपर्यन्त
२. जान्वादिकटिपर्यन्त ६. कण्ठादिभ्रूमध्यपर्यन्त
३. कट्यादिनाभिपर्यन्त ७. भ्रूमध्यादिललाटपर्यन्त
४. नाभ्यादिहृदयपर्यन्त ८. ललाटादिमौलिपर्यन्त
इन आठ स्थानों में मूल मन्त्र के आठ भागों के साथ सूत्रोक्त ह्रां ह्रीं
ह्रुं हैं ह्रौं सों हं औं बीजों के साथ वाले मन्त्रों को भी बोलकर ऊपर निर्दिष्ट
आठ स्थानों में न्यास करना चाहिये। जैसे प्रथम पूरा मन्त्र 'ऐं ग्लौं ऐं नमो
भगवति वार्त्तालि वार्त्तालि वाराहि वाराहि वराहमुखि वराहमुखि ह्रां शर्वाय
क्षितितत्त्वाधिपतये पादादिजानुभागे नमः' बोलकर उस अङ्गभाग का स्पर्श करना
चाहिये। इसी तरह मूलविद्या के शेष सात खण्डों को बोलकर सूत्रोक्त मन्त्रों के
साथ क्रमिक अङ्गभागों का न्यासरूप स्पर्श करना चाहिये। जैसे दूसरा मन्त्र भी
इस प्रकार बनाना चाहिये—'ऐं ग्लौं अन्धे अन्धिनि ह्रीं भवायाम्बुतत्त्वाधिपतये
नमः' मन्त्र बोलकर जान्वादिकटिपर्यन्त का स्पर्श कर अम्बुतत्त्व का न्यास करना
चाहिये। इसी तरह उक्त स्थानों में वह्नि, वायु, सूर्य, सोम, यजमान और आकाश
तत्त्वों का न्यास शेष मन्त्र बनाकर करना चाहिये ॥१३॥

वाराहीक्रमः १७९
देवीध्यानम्
मूलेन सर्वेण व्यापकं कृत्वा देवीं ध्यात्वा ।।१४।।
ध्यानं सूत्रे वक्ष्यमाणं, तन्त्रान्तरप्रसिद्धध्यानश्लोकरीत्याऽपि ज्ञेयम्।
ध्यानश्लोको यथा—
पाथोरुहपीठगतां पाथोरुहमेचकां कुटिलदंष्ट्रां।
कपिलाक्षित्रितयां घनकुचकुम्भां प्रणत वाञ्छितवदान्याम्।
दक्षोर्ध्वतोऽरिखड्गां मुसलमभीतिं तदन्यतस्तद्वत्
शङ्खं खेटं हलवरान् करैर्दधानां स्मरामि वार्त्तालीम्।।
अत्र अरिः चक्रम्। दक्षोर्ध्वत ऊर्ध्वमारभ्य। तद्वद् वामेऽप्यूर्ध्व-
मारभ्यैव ।।१४।।
इसी सातवें खण्ड के आगामी २४वें सूत्र में माँ वार्त्ताली का ध्यान वर्णित
है। सर्वप्रथम पूरा मन्त्र पढ़कर व्यापक विधि पूरी करनी चाहिये। उसके बाद
ही ध्यान करना चाहिये। यों तो २४वें सूत्र में ध्यान का उल्लेख है, फिर भी
तन्त्रान्तरोक्त मन्त्रों द्वारा ध्यान करने में कोई हर्ज नहीं। उक्त श्लोक-सूत्रानुसार
ही विरचित है। माँ नीलकमल के समान आकर्षक श्यामवर्ण से विभूषित है
और कमलासन पर ही अधिष्ठित है। उसकी दंष्ट्रा टेढी है, आँखें पिंगलवर्णी
हैं, माता के वक्ष पर वात्सल्य के प्रतीक कुचकुम्भ शोभित हैं। प्रणत की प्रार्थना
तुरत पूरी करने के लिये प्रसिद्ध हैं। माँ दाहिने हाथ में खड्ग और चक्र धारण
करती हैं। मुसल और अभयमुद्रा में हैं। इसी तरह बाँयें में भी ऊपर से नीचे
तक शङ्ख, खेटक, हल और वर मुद्रा धारण करती हैं। ऐसी महिमामयी माँ
वार्त्ताली का मैं श्रद्धापूर्वक स्मरण कर रहा हूँ।।१४।।
चक्रनिर्माणम्—
पुरतः पटपट्टसुवर्णरजतताम्रचन्दनपीठादिनिर्मितं दृष्टिमनोहरं
चतुरस्रत्रयं सहस्रपत्रशतपत्राष्टपत्र-षडस्रपञ्चास्रत्र्यस्रबिन्दुलक्षणं
कोलमुखीचक्रं विरच्य ।।१५।।
पटतूलमयः। पट्टः कौशेयः। पीठं फलकम्, आदिपदेन नवरत्न-
परिग्रहः। तेषु निर्मितं दृष्टिमनोहरमित्यनेन दलानां कोणानां च मानवैषम्य-

१८० परशुरामकल्पसूत्रम्
विरहः। दलमाने शास्त्रीयनियमाभावश्च सूचितः। तथापि तत् शारदातिलका-
दुद्ग्राह्य एव यन्त्रनिर्माणक्रमः प्रवेशरीत्या, बिन्दुचक्रस्य चरमपाठात्। शेषं
स्पष्टम् ।। १५ ।।
सामने ही फलक होना चाहिये, जिसमें चक्र की रचना की जा सके।
चक्र का फलक कपास के वस्त्र कौशेय, स्वर्ण, रजत, ताम्र या चन्दन का होना
चाहिये। देखने में वह आकर्षक होना चाहिये। सूत्र में जो विधि निर्दिष्ट है, वह
प्रवेश क्रम से है क्योंकि बिन्दु का उल्लेख सूत्र के अन्त में आया हुआ है।
इसकी रचना के क्रम में सर्वप्रथम चतुरस्र का निर्माण करना चाहिये। ये तीन
एक पर एक बनते हैं। उसके भीतर वृत्त में एक हजार दल वाला कमल, उसके
भीतर शतपत्र, उसके भीतर अष्टपत्र, उसमें षट्कोण, उसमें त्रिकोण और उसमें
बिन्दु की रचना कर लेने पर यन्त्र तैयार हो जाता है। इसे ही वाराही चक्र
कहते हैं।। १५ ।।
चक्रनिर्माणानन्तरं चक्रकर्त्तव्यमाह
तत्र कुसुमाञ्जलिं विकीर्य स्वर्णप्राकाराय सुधाब्धये वराहद्वीपाय
वराहपीठाय नमः। आं आधारशक्तये कुं कूर्माय, कं कन्दाय नमः,
अं अनन्तनालाय नम इति च धर्मादिभिः सह षोडशमन्त्रैः पीठे
अभ्यर्च्य ।। १६ ।।
तत्र चक्रे। स्वर्णप्राकारादयः चतुर्थ्यन्ताः। अष्टौ नमोऽन्ता मन्त्राः। तैः
पीठमध्यपूजनं, धर्मादिचतुर्भिः, अधर्मादिचतुर्भिश्च गणपतिक्रमे कॢप्तस्थाने
पूजनं, मिलित्वा षोडशभिः पीठपूजनं भवति। पीठपदेन देवतायतनं
चक्रमेव ।। १६ ।।
पूजा के उद्देश्य से यागगृह में प्रवेश करते समय चक्र पर पुष्पों भरी
अञ्जलि के द्वारा फूल अर्पित करना उचित है। इसके बाद सोलह मन्त्रों से उसकी
पूजा होनी चाहिये। सोलह मन्त्र इस प्रकार उच्चरित करना चाहिये।
१. ऐं ग्लौं स्वर्णप्राकाराय नमः। २. ऐं ग्लौं सुराब्धये नमः। ३. ऐं ग्लौं
वराहदीपाय नमः। ४. ऐं ग्लौं वराहपीठाय नमः। ५. ऐं ग्लौं आधारशक्तये नमः।
६. ऐं ग्लौं कूं कूर्माय नमः। ७. ऐं ग्लौं कं कन्दाय नमः। ८. ऐं ग्लौं अं

अनन्तनालाय नमः। इन मन्त्रों से चक्रमध्य की पूजा करनी चाहिये। तदुपरान्त
पुनः निम्नलिखित आठ मन्त्रों से पूजा करनी चाहिये। वे मन्त्र इस प्रकार बनते
हैं—९. ऐं ग्लौं धर्माय नमः। १०. ऐं ग्लौं ज्ञानाय नमः। ११. ऐं ग्लौं वैराग्याय
नमः। १२. ऐं ग्लौं ऐश्वर्याय नमः। इन मन्त्रों से अग्नि, नैऋत्य, वायव्य और
ईशान कोणों में पूजा करनी चाहिये। तदुपरान्त १३. ऐं ग्लौं अधर्माय नमः।
१४. ऐं ग्लौं अनैश्वर्याय नमः। १५. ऐं ग्लौं अवैराग्याय नमः। १६. ऐं ग्लौं
अनैश्वर्याय नमः इन मन्त्रों से पूर्व, दक्षिण, पश्चिम और उत्तर दिशाओं में पूजा
करनी चाहिये। यह पीठपूजा कहलाती है।।१६।।
चक्रमनुमाह
'त्रिपञ्चषडदलाष्टकशतसहस्रारपद्मासनाय नमः' इति चक्र-
मनुना चक्रमिष्ट्वा ।।१७।।
इस सूत्र में साम्राज्ञी कोलमुखी, जो विन्दु में विराजमान हैं, उनके सान्निध्य
में उल्लसित चक्र रूप देवशक्ति-प्रतीक रूप जो निर्मिति है, उसका क्रमिक
उल्लेख भीतर से बाहर की ओर किया गया है। यही चक्रमन्त्र कहलाता है।
इससे चक्र पर पुष्प अर्पित करना चाहिये। वृत्ति में केवल निबन्धकार का खण्डन
है। सूत्र से उसका कोई सम्बन्ध नहीं।।१७।।
ततो मण्डलादीनां यजनम्
वह्निमण्डलाय, सूर्यमण्डलाय, सोममण्डलाय नमः, इति त्रयो
गुणमन्त्राः। आत्ममन्त्राश्चत्वारः। इति सप्तविंशतिकमिदं पीठे
वरिवसनीयम् ।।१८।।
अत्र सोममण्डलाय नम इत्यन्तं मन्त्रत्रयम्। सं सत्त्वाय नमः, रं रजसे
नमः, तं तमसे नमः, इति गुणमन्त्राः। आं आत्मने नमः, अं अन्त-रात्मने
नमः, पं परमात्मने नमः, हीं ज्ञानात्मने नम इति आत्ममन्त्राश्चत्वारः। इत्थं
च स्वर्णप्राकारायेत्यारभ्य सप्तविंशतिः, तैः पीठपूजा कार्येत्यर्थः।।१८।।
इस सूत्र में तीन प्रकार के मन्त्र हैं—
१. तत्त्वमन्त्र—१. ऐं ग्लौं वह्निमण्डलाय नमः। २. ऐं ग्लौं सूर्यमण्डलाय नमः
और ३. ऐं ग्लौं सोममण्डलाय नमः। ये मण्डल तीन हैं।

१८२ परशुरामकल्पसूत्रम्
२. गुणमन्त्र—१. सं सत्त्वाय नमः। २. रं रजसे नमः। ३. तं तमसे नमः।
ये गुणमन्त्र भी तीन ही हैं।
३. आत्ममन्त्र—यें चार हैं, १. आं आत्मने नमः, २. अं अन्तरात्मने नमः।
३. पं परमात्मने नमः। ४. ह्रीं ज्ञानात्मने नमः। इस प्रकार ‘स्वर्णप्राकाराय
नमः’ इस १६वें सूत्र से इस अठारहवें सूत्र तक सप्तविंशति मन्त्रों से इस
सप्तविंशतिक पीठ की पूजा करने का निर्देश सूत्रकार ने दिया है। इसी
क्रम से पूजा होनी चाहिये।।१८।।
हौं प्रेतपद्मासनाय सदाशिवाय नम इति चक्रोपरि देव्यासन-
विमृष्टिः ।।१९।।
प्रेतरूपं यत्पद्मं तदभिन्नं यदासनं तत् स्वरूपो यः सदाशिवस्तस्मै नम
इति योजना, ब्रह्मा ननु सदाशिवे प्रेतरूपत्वं कथम्। एतदुक्तं ज्ञानार्णवे
पार्वतीप्रश्नोत्तरे—
ब्रह्माविष्णुश्च रुद्रश्च ईश्वरश्च सदाशिवः।
पञ्चप्रेता वरारोहे निश्चला एव ते सदा।।
अयमभिप्रायः — ब्रह्मादयः सदाशिवान्ता वामाज्येष्ठादिस्वस्वशक्ति-
रहिताः स्पन्दनेऽप्यशक्ताः सन्तः प्रेततुल्या एवेति। विमृष्टिः कल्पनम्।।१९।।
सदाशिव प्रेतपद्मासनस्वरूप माने जाते हैं। ज्ञानार्णव नामक ग्रन्थ में पार्वती
के प्रश्नोत्तर रूप में भगवान् शिव का कथन दिया गया है। उसके अनुसार “ब्रह्मा
विष्णुश्च रुद्रश्च ईश्वरश्च सदाशिवः। पञ्चप्रेता वरारोहे निश्चला एव ते सदा”। अर्थात्
ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर और सदाशिव ये पाँचों अपनी-अपनी शक्तियों से रहित
प्रेत माने जाते हैं। शक्तिसमन्वित रहने पर ही अपने कार्य करने में समर्थ होते
हैं। अन्यथा निश्चल ही रहते हैं। इनकी शक्तियाँ क्रमशः वामा, ज्येष्ठा, रौद्री,
अम्बिका और सदाशिवा मानी जाती हैं। इस विचार के पहले ही बिन्दुरूप देवी
के आसन पर ‘ऐं ग्लौं प्रेतपद्मासनाय सदाशिवाय नमः’ मन्त्र से देवी के प्रति
आस्थावान् होकर अभ्यर्थना करनी चाहिये।।१९।।
मूर्त्तिकरणीविद्यामाह
लृषाईं वाराहीमूर्त्तये ठः ठः ठः ठः हुं फट् इति
वाग्ग्लौमादिग्लौंवागन्ता मूर्त्तिकरणीविद्या ।।२०।।