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पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)

Paltoo Sahib Ki Bani Part 1: Belvedere Press Allahabad

सन्त पलटू साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished116 पृष्ठ

पलटू साहिब की बानी भाग—१ ६५
( २३७ )
जगत भगत से बैर है चारो जुग परमान ॥
चारो जुग परमान बैर ज्यों मूस बिलाई ।
नेवर भुवंगम बैर कँवल हिम¹ कर अधिकाई ॥
हस्ती केहरि² बैर बैर है दूध खटाई ॥
भैंस घोड़ से बैर चोर पहरू से भाई ॥
पाप पुन्य से बैर अगिन औ बैरी पानी ।
संतन यही बिचार जगत की बात न मानी ॥
पलटू नाहक भँकता जोगी देखे स्वान ।
जगत भगत से बैर है चारो जुग परमान ॥
( २३८ )
लेहु परोसिनि झोपड़ा नित उठि बढ़त रार ॥
नित उठि बढ़त रार काहिको सरबरि कीजै ।
तजिये ऐसा संग देस चलि दूसर लीजै ॥
जीवन है दिन चारि काहे को कीजै रोसा ।
तजिये सब जंजाल नाम कै करौ भरोसा ॥
भीख माँगि बरु खाय खटपटी नीक न लागै ।
भरी गोन गुड़ तजै तहाँ से साँझै भागै ॥
पलटू ऐसन बूझि कै डारि दिहा सिर भार ।
लेहु परोसिनि झोपड़ा नित उठि बढ़त रार ॥
( २३६ )
सिध चौरासी नाथ नौ बीचै सभै भुलान ॥
बीचै सभै भुलान भक्ति की मारग छूटी ।
हीरा दिहिन है डारि लिहिन इक कौड़ी फूटी ॥
खाँड़ माँड़ खुसी जक्त इतने में राजी ।
लोक बड़ाई तुच्छ नरक में अटकी बाजी ।
(१) पाला । (२) बाघ ।

६६ कुंडलिया
झूठ समाधि लगाय फिरै मन अत्तै भटका ।
उहाँ न पहुँचा कोय बीच में सब कोइ अटका ॥
पलटू अठएँ लोक में पड़ा दुपट्टा तान ।
सिध चोरासी नाथ नौ बीचै सबै भुलान ॥
( २४० )
हंस चुगैं ना घोंघी सिंह चरै न घास ॥
सिंह चरैं ना घास मारि कुंजर को खाते ।
जो मुरदा है जाय ताहि के निकट न जाते ॥
वे ना खाहिं असुद्ध रीत कुल की चलि आई ।
खाये बिनु मरि जाहिं दाग ना सक हें लगाई ॥
सन्त सभन सिरताज धरन धारी सो धारो ।
नई बात जो करें मिलत है उनको गारी ॥
भीख न माँगें सन्त जन कहि गये पलटूदास ।
हंस चुगैं ना घोंघी सिंह चरैं ना घास ॥
( २४१ )
कृस्न कन्हैया लाल है वह गोकुल के घाट ॥
वह गोकुल के घाट जाइ के गोता मारै ।
जीवन आसा त्यागि बूड़ि के ढूँढ निकारै ॥
मान बड़ाई छोड़ि चित्त हरि चरनन लावै ॥
कुंजगली के बीच जाय तब पिय को पावै ॥
देखे पिय को रूप सुन्दर बहु स्याम सलोना ।
बरै तेल की टेम आगि में बरता सोना ॥
कहि पलटू परसाद यह पावै प्रेम की बाट ।
कृस्न कन्हैया लाल है वह गोकुल के घाट ॥
( २४२ )
गिरहस्थी में जब रहे पेट को रहे हैरान ॥

पलटू साहिब की बानी भाग-१ ६७
पेट को रहे हैरान तसदिया१ से मिल्यौ अहारा ।
साग मिल्यौ बिनु लोन रही तब ऐसी धारा ॥
आये हरि की सरन बहुत सुख तब से पाई ।
लुचुई२ चारो जून खाँड औ खोवा खाई ॥
लेडू पेड़ा बहुत सेंत३ कोउ खाता नाहीं ।
जलेबी चीनी कन्द भरा है घर के माहीं ॥
पलटू हरि की सरन में हाजिर सब पकवान ।
गिरहस्थी में जब रहे पेट को रहे हैरान ॥
( २४३ )
भरि भरि पेट खिलाइये तब रीझैगा भेष ॥
तब रीझैगा भेष जगत में करै बड़ाई ।
लाख भगत जो होय खाये बिनु निंदत जाई ॥
रहनि लखै नहिं कोय नाहिं टकसार बिचारै ।
भाव भक्ति ना लखै खोजत सब फिरै अहारै ॥
भेष में नाहिं बिबेक भये दस बीस बिबेकी ।
कोटिन में दस बीस सन्त तिन रहनी देखी ॥
पलटू रहै अपान में आन में मारै मेख ।
भरि भरि पेट खिलाइये तब रीझैगा भेष ॥
( २४४ )
कौड़ी गाँठि न राखई हमा-नियामत४ खाय ॥
हमा-नियामत खाय नहीं कुछ जग की आसा ।
छत्तिस ब्यंजन रहै सबर से हाजिर खासा ॥
जेकरे है सत नाम नाम की चेरी माया ।
जोरू कहवाँ जाय खसम जब कैद में आया ॥
माया आवै चली रैनि दिन मैं दुरियावों ।
सतगुरु दास कहाय नहीं मैं माँगन जावों ॥
(१) कष्ट । (२) पूरी । (३) मुफ्त । (४) छप्पन प्रकार का भोजन ।
१३

६८ कुंडलिया
राजा औ उमराव हाथ सब बाँधे आवैं।
द्वारे से फिरि जायें नहीं फिर मुजरा पावैं॥
जंगल में मंगल करै पलटू बेपरवाय।
कौड़ी गाँठि न राखई हमा-नियामत खाय॥
( २४५ )
जब देखौ तब सादी नौबत आठौ पहर॥
नौबत आठौ पहर गैब की निसु दिन झरती।
पचरँग जोड़ा खुसी दुखेस को सादी चढ़ती॥
आफताब¹ भा सूर² रोसनी दिल में आई।
फिरै गैब का छत्र जिकर³ का मुस्क⁴ लगाई॥
अन्दर भूलै फील⁵ खाब में खतरा नाहीं।
सबर है पीढ़ी पलँग सेहरा नाम इलाही॥
पलटू जलवा नूर का ज्यों दरियाव में लहर।
जब देखौ तब सादी नौबत आठौ पहर॥
( २४६ )
रन का चढ़ना सहज है मुसकिल करना जोग॥
मुसकिल करना जोग चित्त को उलटि लगावै।
बिषय बासना तजै प्रान ब्रह्मंड चढ़ावै॥
साधै वायू प्रान कुण्डली करै उथपना⁶।
अष्ट कँवल दल उलटि कँवल दल द्वादस लखना॥
इँगला पिंगला सोधि बंक के नाल चढ़ावै।
चार कला को तोड़ि चक्र षट जाय बिधावै॥
पलटू जो संजम करै करै रूप से भोग।
रन का चढ़ना सहज है मुसकिल करना जोग॥
(१) सूरज। (२) अंधा। (३) सुमिरन। (४) कस्तूरी। (५) हाथी। (६) कुण्डलिन
नाड़ी का मुँह ऊपर करै।

पलटू साहिब की बानी भाग-१ ६६
( २४७ )
आगि लागि मसि जरि गई कागद जरै न कोय ॥
कागद जरै न कोय कागद है बहुत पुराना ।
अक्खर¹ आवै जाय अखर को नाहिं ठिकाना ॥
वो भी जरै बनाय अखर का लिखनेहारा ।
बाँचै सो जरि जाय जरै जो करै बिचारा ॥
कोटिन अक्खर बाद अन्त कागद भी जरता ।
कागद जरै के बाद रहै कागद का करता ॥
पलटू जब कागद जरै वा दिन मेरा होय ।
आगि लागि मसि जरि गई कागद जरै न कोय ॥
( २४८ )
तबक चारदह अन्दर है अस्थल बे दरियाव ॥
अस्थल बे दरियाव अर्श कुर्सी खुद दीदन ।
तूबा दरखत अज् हद शीरीं मेवा खुर्दन ॥
नूर तजल्ली रूह लाहूत रसीदा नादिर ।
रौशन-जमीर बेचूँ सीना-साफ़ काजी क़ादिर ॥
हूहू गुफ़्तन फ़ना रूह की सोई बातिन ।
पाक अल्लाह मकान तहाँ को भी वो साकिन ॥
पलटू आरिफ़ से कहै तू भी चाहो जाव ।
तबक चारदह अन्दर है अस्थल बे दरियाव ॥
(१) अक्षर। (२) कुण्डलिया नं० २४८ चौदहवें भुवन में बिना पानी के धरती
है जहाँ खुदा का तख्त [अर्श व कुर्सी] दीख पड़ता है और कल्प बृक्ष [तूबा दरख्त]
का अत्यन्त स्वादिष्ट फल खाने को मिलता है [खुर्दन]। उस शून्य लोक [लाहूत]
में पहुँची हुई [रसीदा] सूरत का प्रकाश विचित्र हो जाता है और वह अंतर-यामी,
अद्वितीय [बेचूँ] निर्मल हृदय [रौशन जमीर] अधिष्ठाता [काजी] और सर्ब
शक्तिमान [क़ादिर] हो जाती है। वहो पावन स्थान अल्लाह का है जहाँ ॐ ॐ का
शब्द गाजता है [हूहू गुफ़्तन और सुरत विदेह होने पर वहीं बासा पाती है
[साकिन]।

१०० कुंडलिया
( २४६ )
बस्ती माहिं चमार की बाम्हन करत बेगार ॥
बाम्हन करत बेगार लोग सब गैर-बिचारी ।
मूरख है परधान देहि ज्ञानी को गारी ॥
अद्वैता को मेटि द्वैत कै करते थापन ।
दौलत के सम्बन्ध अमल वे करते आपन ॥
ज्ञानि महरसी¹ सन्त ताहि की निन्दा करते ।
अज्ञानी के मध्य सिफत वे अपनी धरते ॥
पलटू पीतर कनक को कोउ न करै विचार ।
बस्ती माहिं चमार की बाम्हन करत बेगार ॥
( २५० )
कुत्ता हाँड़ी फँसि मुवा दोस परोसि क देय ॥
दोस परोसि क देय आपनौ हठ नहिं मानै ।
न्योत रही लगवार खसम से परदा तानै ॥
कपड़ा की सुधि नाहिं नंगी है पड़ी उतानी ।
कोऊ मने जो करै बोलती करकस बानी ॥
माया कै लग भूत खसम कौ नाहिं डेराती ।
घर की सम्पति छाड़ि और की जोगवै थाती ॥
पलटू कूसंगति पड़ी पिउ कै नाम न लेय ।
कुत्ता हाँड़ी फँसि मुवा दोस परोसि क देय ॥
( २५१ )
जा के रथ पर राम हैं को करि सकै अकाज ॥
को करि सकै अकाज बोर नहीं वा कौ बाँकै ।
चक्र सुदर्सन छुटै कोऊ कुनजर से ताकै ॥
लोहू ढारैं राम सन्त कौ ढरै पसोना ।
का बालक पहलाद भया हरिनाकुस पीना² ॥
(१) महर्षि = मह ऋषि । (२) मोटा ।

पलटू साहिब की बानी भाग—१ १०१
करि पंडौ की पैज भरथ१ कौ दिया जिताई ॥
अम्बरीक के हेतु दुर्बासै नाच नचाई ॥
पलटू मारयौ ग्राह कौ हाँक२ दियौ गजराज ।
जा के रथ पर राम हैं को करि सकै अकाज ॥
( २५२ )
होनी रही सो है गई रोइ मरै संसार ॥
रोइ मरै संसार काज कुछ उन से नाहीं ।
गये हाथ से निबुकि३ तेही सब पछिताहीं ॥
भये काग से हंस काग सब निन्दा करते ।
लोहा से भये कनक सोच सब लोहा मरते ॥
ज्ञानी अब हम भये रोवैं सब मूरख संगी ।
तिल से भये फुलेल तेल सब मार तिलंगी ॥
पलटू उतरे पार हम भाड़ झोकि सब भार ।
होनी रही सो है गई रोइ मरै संसार ॥
( २५३ )
सिव सक्ती के मिलन में मो कौ भयौ अनन्द ॥
मो कौ भयौ अनन्द मिल्यौ पानी में पानी ।
होऊ से भा सूत नहीं मिलि कै अलगानी ॥
मुलुक भयौ सलतन्त मिल्यौ हाकिम कौ राजा ।
रैयत करै अराम खोलि कै दस दरवाजा ॥
छूटी सकल बियाधि मिटी इन्द्रिन की दुतिया ।
को अब करै उपाधि चोर से मिलि गइ कुतिया ॥
पलटू सतगुरु साहिब काटौ मेरो बन्द ।
सिव सक्ती के मिलन में मो कौ भयौ अनन्द ॥
( २५४ )
ऐसा ब्राह्मन मिलै जो ता के परछौं पाँय ॥
(१) पांडवों के साथ अपना प्रण रख कर श्रीकृष्ण ने महाभारत की लड़ाई
उन्हें जिता दी । (२) पुकार । (३) निकल ।

१०२ कुंडलिया
ता के परछौं पाँय ब्रह्म अपने को पावै ।
भर्म जनेऊ तोरि प्रेम तिरसूत बनावै ॥
सब कर्मन को करै कर्म से रहता न्यारा ।
दुतिया देइ बहाय ब्रह्म का करै बिचारा ॥
ज्ञान दिवस में सयन मोह रजनी में जागै ।
पारब्रह्म भगवान ताहि घर भिच्छा माँगै ॥
चेतन देइ जगाय ब्रह्म की गाँठि को खोलै ।
करै गायत्री गुप्त सब्द ब्रह्मांड में बोलै ॥
पलटू तजै अठारह सहस बरन ह्वै जाय ।
ऐसा ब्राह्मन मिलै जो ता के परछौं पाँय ॥
( २५५ )
सब बैरागी बटुरि कै पलटुहि किया अजात ॥
पलटुहि किया अजात प्रभुता देखि न जाई ।
बनिया काल्हिक१ भक्त प्रगट भा सब दुतियाई२ ॥
हम सब बड़े महन्त ताहि को कोउ न जानै ।
बनिया करै पखंड ताहि को सब कोउ मानै ॥
ऐसी इर्षा जानि कोऊ ना आवै खाई ।
बनिया ढोल बजाय रसोई दिया लुटाई ॥
मालपुवा चारिउ बरन बाँधि लेत कछु खात ।
सब बैरागी बटुरि कै पलटुहि किया अजात ॥
( २५६ )
हींग लगाइस भात में भूल गई है नार ॥
भूल गई है नार आन कै आनै कीन्हा ।
कातिस मोटा सूत कातन को चाही झीना ॥
लहँगा पाछे जरै चूल्ह में पानी नावा ।
(१) कल्ह का । (२) अलग कर दिया ।

पलटू साहिब की बानी भाग—१ १०३
हँसिया को है ब्याह गीत खुरपा कै गावा ॥
देय महावर आँख गोड़ में काजर लावै ।
ऐसी भोली नारि ताहि कौ को समुझावै ॥
पलटू वाहि अबूझ है अंत खायगी मार ।
हींग लगाइस भात में भूल गई है नार ॥
( २५७ )
घरिया औटै तत्व की परै नाम टकसार ॥
पड़ै नाम टकसार द्वादस सन१ बहुत करकरा ।
ज्ञान चोख से चोख रैनि दिन पड़ै धरधरा ॥
चौकस करै बिबेक सरन जो जौ भरि आवै ॥
ऐसा सिक्का होय कोई ना बट्टा लावै ॥
देवै ठासा बेहद परै सनवाती सीका२ ।
चारि खूँट में चलै जियत इक होय रती का ॥
पलटू बानी परा कहँ लेहै सन्त बिचार ।
घरिया ओटै तत्व की परै नाम टकसार ॥
( २५८ )
सतगुरु के परताप से पकरा पाँचो चोर ॥
पकरा पाँचो चोर नगर में अदल चलाया ।
तिगुंन दिया निकारि आनि कै भक्ति बसाया ॥
लोभ मोह को पकरि ताहि की गरदन मारी ।
तृस्ना औ हंकार पेट दियो इनको फारी ॥
दुर्मति दई निकारि सुमति का चाबुक दीन्हा ।
चढ़े सिपाही संत अमल कायागढ़ कीन्हा ॥
पलटू संजम मैं किया परा मुलुक में सोर ।
सतगुरु के परताप से पकरा पाँचो चोर ॥
(१) सन १२ के सिक्के की चाँदी सोना बहुत खरा मशहूर है। (२) सिक्का।

१०४ कुंडलिया
( २५९ )
दूसर जनमत मारिये की बरु रहिये बाँझ ॥
दूसर जनमत मारिये की बरु रहिये बाँझ ॥
की बरु रहिये बाँझ कोख में दाग लगावै ।
जामै१ पेड़ मदार ताहि में क्या फल आवै ॥
जो जनमै हरि भक्त जगत में सोभा पावै ।
कुल में फूलै कमल पुत्रवंती कहवावै ॥
कौसिल्या देवकी बड़ी अब कहिये सोई ।
हरि जन में हरि रहै भार जिन लीन्हा दोई ॥
पलटू सोई पुत्रवती भक्त रहै जेहि माँझ२ ।
दूसर जनमत मारिये की बरु रहिये बाँझ ॥
( २६० )
आगि लगो वहि देस में जहँवाँ राजा चोर ॥
जहँवाँ राजा चोर प्रजा कैसे सुख पावै ।
पाँच पचीस लगाइ रैनि सदा मुसावै ॥
आठौ पहर उपाधि रहै नाना बिधि लागी ।
काम क्रोध हंकार सकै ना रैयत भागी ॥
लोभ मोह की दिनै३ गले बिच नावै फाँसी ।
लोक लाज मरजाद चलावै तिरगुन गाँसी ॥
पलटू रैयत क्या करै चलै न एकौ जोर ।
आगि लगो वहि देस में जहँवाँ राजा चोर ॥
( २६१ )
यह अचरज हम देखिया कानी काजर देइ ॥
कानी काजर देइ खसम के मन ना मानै ।
निसि दिन करै सिंगार भेद या बिरला जानै ॥
नख सिख खोटी मोटि पहिरि कै बैठो गहना ।
(१) उगै । (२) उदर में । (३) दिन दहाड़े ।

पलटू साहिब की बानी भाग—१ १०५
मूरख देखन जाय देखि कै करै सरहना ॥
बोलै मीठी बोल सबन को बेगि रिझावै ।
नाहिं खसम से भेंट बैठि कै बात बनावै ॥
पलटू या संसार में झूठ कहै सो लेय ।
यह अचरज हम देखिया कानी काजर देय ॥
( २६२ )
मुसलमान रब्बी मेरी हिन्दू भया खरीफ ॥
हिन्दू भया खरीफ दोऊ है फसिल हमारी ।
इनको चाहै लेइ काटि कै बारी बारी ॥
साल भरे में मिली यहो हम को जागीरी ।
चाकर भये हजूरी कौन अब करै तगीरी१ ॥
दूनों को समुझाइ ज्ञान का दफ्तर खोलै ।
सब कायल होइ जाय अमल दै कोऊ न बोलै ॥
दोऊ दीन के बीच में पलटूदास हरीफ२ ।
मुसलमान रब्बी मेरी हिन्दू भया खरीफ ॥
( २६३ )
नाचन को ढंग नाहिं है कहती आँगन टेढ़ ॥
कहती आँगन टेढ़ जक्त की लाज लजाई ।
लम्बा घूँघट काढि डरै३ फिर नाचन आई ॥
जाति बरन मरजाद छुटी ना लोक बड़ाई ।
करै खसम को चाह खसम का४ सहजै पाई ॥
अपनी बात उड़ाइ आपु से जैसे भूसा ।
भौंसै पेड़ बनाय पाछे से फड़िहै फरसा५ ॥
पलटू पावै खसम को रहै संत की खेढ़ ।
(१) तंगी । (२) निपुन । (३) लोक लाज के डर से लम्बा घूँघट काढ़ कर ।
(४) क्या । (५) लोक लाज और कुल कानि की पौध को झुलस डाले नहीं तो बढ़ जाने
पर फरसा से काटने की जरूरत होगी ।
१४

१०६ कुंडलिया
नाचन को ढंग नाहिं है कहती आँगन टेढ़ ॥
( २६४ )
पलटू खोजै पूरबे घर में है जगन्नाथ ॥
घर में है जगन्नाथ सकल घट व्यापक सोई ।
पसु पंछी चर अचर और नहिं दूजा कोई ॥
पूरन प्रगटे ब्रह्म देह धरि सब में आये ।
दिया कर्म को आड़ भेद यह बिरलन पाये ॥
उपजै बिनसै देह जीव सो मरता नाहीं ।
कहन सुनन को जुदा रहत है सब घट माहीं ॥
चलते चलते पग थका एकौ लगा न हाथ ।
पलटू खोजै पूरबे घर में है जगन्नाथ ॥
( २६५ )
आन को सेंदुर देखि कै तू का फोरै लिलार१ ॥
तू का फोरै लिलार नारि तू बड़ी अनारी ।
तू ना देवै जाय देखि क्या जरै हमारी ॥
तेरे करम में नाहिं देखि क्या सरबर२ करती ।
चलि जा अपनी राह सोच में नाहक परती ॥
जेकँ है चाहै पीव ताहि को करै सोहागिनि ।
समुझ आपनी चूक नारि तू बड़ी अभागिनि ॥
पलटू सेवै साधु को तब रीझै करतार ।
आन को सेंदुर देखि कै तू का फोरै लिलार ॥
( ६६ )
पलटू पारस नाम का मनै रसायन होय ॥
मनै रसायन होय करै या तन की सीसी ।
संपुट दै गुरु ज्ञान बिस्वास दवाई पीसी ॥
दसौ दिसा से मूँदि जोग की भाठी बारै ।
(१) माथा । (२) हिसका ।

पलटू साहिब की बानी भाग—१ १०७
तेहि पर देहि चढ़ाय ब्रह्म की अगिन से जारै ॥
ईंधन लावै ध्यान प्रेम रस करै तयारी ।
सबद सुरति के बीच तहाँ मन राखै मारी ॥
जड़ि बूटी के खोजते गई सिध्याई खोय ।
पलटू पारस नाम का मनै रसायन होय ।
( २६७ )
कहत फिरत हम जोगी, पक्का दुइ सेर खाय ॥
पक्का दुइ सेर खाय, कहै मैं बड़का जोगी ।
सोवै टाँग पसारि, देखत कै बड़ा बिरोगी ॥
हृष्ट पुष्ट होइ रहै, लड़न को नाहीं माँदा¹ ।
काम क्रोध और मोह, करत हैं बाद बिबादा ॥
पलटू ऐसा देखि कै, मुँह ना राखी लाय ।
कहत फिरत हम जोगी, पक्का दुइ सेर खाय ।
( २६८ )
जल पषान को छोड़ि कै पूजौ आतम देव ॥
पूजौ आतम देव खाय औ बोलै भाई ।
छाती दैकै पाँव पथर की मुरत बनाई ॥
ताहि धोय अन्हवाय बिंजन लै भोग लगाई ।
साच्छात भगवान द्वार से भूखा जाई ॥
काह लिये बैराग झूँठ के बाँधे बाना ।
भाव भक्ति की मरम है कोइ बिरले जाना ॥
पलटू दोउ कर जोरि कै गुरु संतन को सेव ।
जल पषान को छोड़ि कै पूजौ आतम देव ॥
(१) थका या निर्बल ।
॥ इति ॥

१७१
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