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पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)

पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)

Paltoo Sahib Ki Bani Part 1: Belvedere Press Allahabad

सन्त पलटू साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

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पृष्ठ 106

१०० कुंडलिया
( २४६ )
बस्ती माहिं चमार की बाम्हन करत बेगार ॥
बाम्हन करत बेगार लोग सब गैर-बिचारी ।
मूरख है परधान देहि ज्ञानी को गारी ॥
अद्वैता को मेटि द्वैत कै करते थापन ।
दौलत के सम्बन्ध अमल वे करते आपन ॥
ज्ञानि महरसी¹ सन्त ताहि की निन्दा करते ।
अज्ञानी के मध्य सिफत वे अपनी धरते ॥
पलटू पीतर कनक को कोउ न करै विचार ।
बस्ती माहिं चमार की बाम्हन करत बेगार ॥
( २५० )
कुत्ता हाँड़ी फँसि मुवा दोस परोसि क देय ॥
दोस परोसि क देय आपनौ हठ नहिं मानै ।
न्योत रही लगवार खसम से परदा तानै ॥
कपड़ा की सुधि नाहिं नंगी है पड़ी उतानी ।
कोऊ मने जो करै बोलती करकस बानी ॥
माया कै लग भूत खसम कौ नाहिं डेराती ।
घर की सम्पति छाड़ि और की जोगवै थाती ॥
पलटू कूसंगति पड़ी पिउ कै नाम न लेय ।
कुत्ता हाँड़ी फँसि मुवा दोस परोसि क देय ॥
( २५१ )
जा के रथ पर राम हैं को करि सकै अकाज ॥
को करि सकै अकाज बोर नहीं वा कौ बाँकै ।
चक्र सुदर्सन छुटै कोऊ कुनजर से ताकै ॥
लोहू ढारैं राम सन्त कौ ढरै पसोना ।
का बालक पहलाद भया हरिनाकुस पीना² ॥
(१) महर्षि = मह ऋषि । (२) मोटा ।