पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)
Paltoo Sahib Ki Bani Part 1: Belvedere Press Allahabad
सन्त पलटू साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०६ कुंडलिया
नाचन को ढंग नाहिं है कहती आँगन टेढ़ ॥
( २६४ )
पलटू खोजै पूरबे घर में है जगन्नाथ ॥
घर में है जगन्नाथ सकल घट व्यापक सोई ।
पसु पंछी चर अचर और नहिं दूजा कोई ॥
पूरन प्रगटे ब्रह्म देह धरि सब में आये ।
दिया कर्म को आड़ भेद यह बिरलन पाये ॥
उपजै बिनसै देह जीव सो मरता नाहीं ।
कहन सुनन को जुदा रहत है सब घट माहीं ॥
चलते चलते पग थका एकौ लगा न हाथ ।
पलटू खोजै पूरबे घर में है जगन्नाथ ॥
( २६५ )
आन को सेंदुर देखि कै तू का फोरै लिलार१ ॥
तू का फोरै लिलार नारि तू बड़ी अनारी ।
तू ना देवै जाय देखि क्या जरै हमारी ॥
तेरे करम में नाहिं देखि क्या सरबर२ करती ।
चलि जा अपनी राह सोच में नाहक परती ॥
जेकँ है चाहै पीव ताहि को करै सोहागिनि ।
समुझ आपनी चूक नारि तू बड़ी अभागिनि ॥
पलटू सेवै साधु को तब रीझै करतार ।
आन को सेंदुर देखि कै तू का फोरै लिलार ॥
( ६६ )
पलटू पारस नाम का मनै रसायन होय ॥
मनै रसायन होय करै या तन की सीसी ।
संपुट दै गुरु ज्ञान बिस्वास दवाई पीसी ॥
दसौ दिसा से मूँदि जोग की भाठी बारै ।
(१) माथा । (२) हिसका ।