पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)
Paltoo Sahib Ki Bani Part 1: Belvedere Press Allahabad
सन्त पलटू साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपलटू साहिब की बानी भाग—१ १०१
करि पंडौ की पैज भरथ१ कौ दिया जिताई ॥
अम्बरीक के हेतु दुर्बासै नाच नचाई ॥
पलटू मारयौ ग्राह कौ हाँक२ दियौ गजराज ।
जा के रथ पर राम हैं को करि सकै अकाज ॥
( २५२ )
होनी रही सो है गई रोइ मरै संसार ॥
रोइ मरै संसार काज कुछ उन से नाहीं ।
गये हाथ से निबुकि३ तेही सब पछिताहीं ॥
भये काग से हंस काग सब निन्दा करते ।
लोहा से भये कनक सोच सब लोहा मरते ॥
ज्ञानी अब हम भये रोवैं सब मूरख संगी ।
तिल से भये फुलेल तेल सब मार तिलंगी ॥
पलटू उतरे पार हम भाड़ झोकि सब भार ।
होनी रही सो है गई रोइ मरै संसार ॥
( २५३ )
सिव सक्ती के मिलन में मो कौ भयौ अनन्द ॥
मो कौ भयौ अनन्द मिल्यौ पानी में पानी ।
होऊ से भा सूत नहीं मिलि कै अलगानी ॥
मुलुक भयौ सलतन्त मिल्यौ हाकिम कौ राजा ।
रैयत करै अराम खोलि कै दस दरवाजा ॥
छूटी सकल बियाधि मिटी इन्द्रिन की दुतिया ।
को अब करै उपाधि चोर से मिलि गइ कुतिया ॥
पलटू सतगुरु साहिब काटौ मेरो बन्द ।
सिव सक्ती के मिलन में मो कौ भयौ अनन्द ॥
( २५४ )
ऐसा ब्राह्मन मिलै जो ता के परछौं पाँय ॥
(१) पांडवों के साथ अपना प्रण रख कर श्रीकृष्ण ने महाभारत की लड़ाई
उन्हें जिता दी । (२) पुकार । (३) निकल ।