पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)
Paltoo Sahib Ki Bani Part 1: Belvedere Press Allahabad
सन्त पलटू साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०२ कुंडलिया
ता के परछौं पाँय ब्रह्म अपने को पावै ।
भर्म जनेऊ तोरि प्रेम तिरसूत बनावै ॥
सब कर्मन को करै कर्म से रहता न्यारा ।
दुतिया देइ बहाय ब्रह्म का करै बिचारा ॥
ज्ञान दिवस में सयन मोह रजनी में जागै ।
पारब्रह्म भगवान ताहि घर भिच्छा माँगै ॥
चेतन देइ जगाय ब्रह्म की गाँठि को खोलै ।
करै गायत्री गुप्त सब्द ब्रह्मांड में बोलै ॥
पलटू तजै अठारह सहस बरन ह्वै जाय ।
ऐसा ब्राह्मन मिलै जो ता के परछौं पाँय ॥
( २५५ )
सब बैरागी बटुरि कै पलटुहि किया अजात ॥
पलटुहि किया अजात प्रभुता देखि न जाई ।
बनिया काल्हिक१ भक्त प्रगट भा सब दुतियाई२ ॥
हम सब बड़े महन्त ताहि को कोउ न जानै ।
बनिया करै पखंड ताहि को सब कोउ मानै ॥
ऐसी इर्षा जानि कोऊ ना आवै खाई ।
बनिया ढोल बजाय रसोई दिया लुटाई ॥
मालपुवा चारिउ बरन बाँधि लेत कछु खात ।
सब बैरागी बटुरि कै पलटुहि किया अजात ॥
( २५६ )
हींग लगाइस भात में भूल गई है नार ॥
भूल गई है नार आन कै आनै कीन्हा ।
कातिस मोटा सूत कातन को चाही झीना ॥
लहँगा पाछे जरै चूल्ह में पानी नावा ।
(१) कल्ह का । (२) अलग कर दिया ।