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पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)

पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)

Paltoo Sahib Ki Bani Part 1: Belvedere Press Allahabad

सन्त पलटू साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

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पलटू साहिब की बानी भाग—१ १०५
मूरख देखन जाय देखि कै करै सरहना ॥
बोलै मीठी बोल सबन को बेगि रिझावै ।
नाहिं खसम से भेंट बैठि कै बात बनावै ॥
पलटू या संसार में झूठ कहै सो लेय ।
यह अचरज हम देखिया कानी काजर देय ॥
( २६२ )
मुसलमान रब्बी मेरी हिन्दू भया खरीफ ॥
हिन्दू भया खरीफ दोऊ है फसिल हमारी ।
इनको चाहै लेइ काटि कै बारी बारी ॥
साल भरे में मिली यहो हम को जागीरी ।
चाकर भये हजूरी कौन अब करै तगीरी१ ॥
दूनों को समुझाइ ज्ञान का दफ्तर खोलै ।
सब कायल होइ जाय अमल दै कोऊ न बोलै ॥
दोऊ दीन के बीच में पलटूदास हरीफ२ ।
मुसलमान रब्बी मेरी हिन्दू भया खरीफ ॥
( २६३ )
नाचन को ढंग नाहिं है कहती आँगन टेढ़ ॥
कहती आँगन टेढ़ जक्त की लाज लजाई ।
लम्बा घूँघट काढि डरै३ फिर नाचन आई ॥
जाति बरन मरजाद छुटी ना लोक बड़ाई ।
करै खसम को चाह खसम का४ सहजै पाई ॥
अपनी बात उड़ाइ आपु से जैसे भूसा ।
भौंसै पेड़ बनाय पाछे से फड़िहै फरसा५ ॥
पलटू पावै खसम को रहै संत की खेढ़ ।
(१) तंगी । (२) निपुन । (३) लोक लाज के डर से लम्बा घूँघट काढ़ कर ।
(४) क्या । (५) लोक लाज और कुल कानि की पौध को झुलस डाले नहीं तो बढ़ जाने
पर फरसा से काटने की जरूरत होगी ।
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