निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
हिन्दी निरुक्त ( २२६ ) ९ अ० २ पा० १ खं०
लाती है । भाव यह कि— यह मुख्यतया राजा की स्तुति
नहीं, यज्ञ की ही है, उसी के संबन्ध से वह स्तुत होता है।
तथा इसके संस्रम्ध से युद्ध के साधन स्तुत होते हैं । ऐसा
कोई आचार्य मानते हैं ।
दूसरे आचार्य इसे “स्तुतिसंक्रमणन्याय” कहते हैं ।
उनका यह अभिप्राय है कि–उक्त मन्त्र में भावयव्य की स्तुति
का कारण वही है, जो युद्ध के उपकरणों की स्तुति का है,
किन्तु कोई पृथक् कारण नहीं है । इसी प्रयोजन को लक्ष्य
करके भाष्यकार–“यज्ञसंयोगात् राजा स्तुतिंलभते ।
राजसंयोगात् युद्धोपकरणानि” ऐसा कहते हैं ।
अर्थात्–यहां मन्त्र में राजस्तुति के प्रश्नका जो उत्तर
भाष्यकार ने दिया है, उसका अभिप्राय भगवद् दुर्गाचार्य कहते
हैं कि–पुराने टीकाकारों ने दो प्रकार से समझा है, उसमें
पहिले मतका अभिप्राय है कि– राजा की स्तुति का हेतु
वही है, जो मन्त्र में कहा हुआ है । अर्थात्–भावयव्य राजा
ने कक्षीवान् ऋषिके सहस्र यज्ञों में सहायता पहुंचाई, उसी
( यज्ञसंयोग ) से उसकी स्तुति मन्त्र में हुई और राजा के
संयोग से युद्धोपकरण रथ आदिकों की स्तुति मन्त्रों में आती
है । यहां इस प्रथम मत में, क्योंकि– यज्ञ कर्म प्रशंसायुक्त
है, इस से उस प्रशंसायुक्त कर्म के करने से राजा भी प्रशंसा-
युक्त होता है, इस लिये राजा भी मन्त्रों में स्तुति के योग्य
हो जाता है । अर्थात्–राजा की प्रशंसा यज्ञ की प्रशंसा के
अधीन है । एवम् युद्धोपकरण रथ आदिकों की जो मन्त्रों में
प्रशंसा आती है, उसका उत्तर भी इसी प्रकार से दिया जाता
हिन्दी निरुक्त ( २२७ ) ६ अ० २पा० १ खं०
है, कि राजा लोकमें प्रशंसा-युक्त होता है, उसके सम्बन्ध से
युद्ध के उपकरण रथ आदि भी प्रशंसा युक्त होते हैं। यहां
राजा की प्रशंसा के अधीन युद्धोपकरण रथ आदिकों की
प्रशंसा है, किन्तु स्वतः उनमें प्रशंसा की योग्यता नहीं है ।
दूसरे आचार्योंने इन पूर्वाचार्यों के हेतु को यों उचित
नहीं समझा कि वे मन्त्रों में राजा की स्तुतिका हेतु यज्ञसंयोग
बताते हैं, और रथ आदिकों की स्तुति का हेत उनमें राज-
संयोग को बताते हैं, सुतराम् दोनों स्थानोंमें अलग २ प्रशंसा
का हेतु आता है, किन्तु एक नही । तथा एक वस्तु रथ आदि
की प्रशंसा के कारण को पूछते हैं, तो उन में राजसंयोग को
हेतु बताते हैं, किन्तु राजा में भी क्या प्रशंसा का हेतु है ?
यह प्रश्न अवशिष्ट रहजाता है। जब उसका उत्तर उसमें यज्ञ
संयोग से देते हैं, तब वही प्रश्न उस यज्ञ में उपस्थित हो
जाता है, अतः उनके मतमें यह प्रश्न पूरा ही नहीं होता
तथा सब स्थानों में पृथक् २ ही हेतु रहता है । इस दोषकी
निवृत्तिके लिये दूसरे पण्डितों ने उस हेतु को खोज निकाला
जो सब स्थानों में समान रूप से मिलता है तथा वह सर्वो-
नुगत सर्वत्र व्यापक आत्मवस्तु ही है। जहां वह नहीं ऐसी
कोई वस्तु नहीं। अतः उस आत्मवस्तु के लक्ष्य से हम जिस
किसी वस्तु की भी स्तुति कर सकते हैं, और वह स्तुति
आत्म वस्तु से स्तुति संक्रमन्याय से सब बस्तुओं में धारा
प्रवाह रूपसे अनुवर्त्तमान होती है। यही वैदिक सनातन
सिद्धान्त है। यहां पर स्तुति संक्रमन्याय से राजा तथा रथ
आदिमें आत्मवस्तु से स्तुति किस प्रकार आती है, इस की
व्याख्या आगे पढ़िये ।
इस न्यायके अनुसार वे इस प्रकरण को इस प्रकार वर्णन
करते हैं कि-अश्वमेध यज्ञ में सब युद्ध के साधनों के
सहित रथ में बैठे हुए कवचको धारण किये हुये राजा की
“जीमूतस्येव भवति प्रतीकम्” इस मन्त्र से स्तुति की
जाती है। वह क्यों ? इस भूमिका को लेकर भाष्यकार कहते हैं
“यज्ञसंयोगाद् राजा स्तुतिं लभते” अर्थात्-
पहिले राजा यज्ञ के संयोग से स्तुति को प्राप्त होता है, और
उसके संबन्ध से युद्धोपकरण। ‘युद्धोपकरण’ क्यों हैं ? वे
युद्ध के लिये उपकृत = उपयुक्त होते हैं, या युद्ध में उपकार
करते हैं।
सो यह आचार्यने व्यापी = व्यापक “स्तुतिसंक्रमन्याय”
दिखाया है। अर्थात्- युद्ध के उपकरण राजा के संयोग से
स्तुति को प्राप्त होते हैं-उसके वे अङ्ग हैं, इस लिये उस के
संबन्ध से उनकी स्तुति होती है, राजा भी यज्ञ के संबन्ध
से, यज्ञ भी देवता के संबन्ध से और देवता भी आत्मा के
संबन्ध से स्तुति को प्राप्त होता है। सो यह आत्मा ही अङ्ग
और प्रत्यङ्ग (अङ्ग के अङ्ग) के रूप में स्थित हुआ सब अव-
स्थाओं में स्थित हुआ स्तुति किया जाता है। इस प्रकार यह
सब स्तुति आत्मा की ही है। सो कहा भी है-
“स्थाने स्थाने स्तुतिः सर्वा स्थानाधिपतिभागिनी।
आत्मप्रतिष्ठा बोद्धव्या तथोपकरणस्तुतिः ॥”
अर्थात्-स्थान स्थान में जो सब स्तुति है, वह स्थान के
अधिपति = स्वामी की है। वैसे ही उपकरणों (रथादिकों)
की स्तुति को आत्मा में समझना चाहिये प्रयोजन यह कि
हिन्दी निरुक्त ( २२९ ) ६ अ० २ पा० २ खं०
ऊपर दिखाई हुई प्रणाली के अनुसार यथासंभव मार्ग से
सब स्तुति क्रम २ से आत्मा में पहुंच जाती है । वह कहीं
बीच में नहीं रुकतीं । यही स्तुति संक्रमणन्याय का अभिप्राय
है, इस का उपयोग सब जगह करना चाहिये ॥ १ ( ११ ) ॥
( खं० २ )
निरु०-‘वनस्पते वीड्वङ्गो हिभूया अस्मत्सखा
प्रतरणः सुवीरः । गोभिः सन्नद्धो असिवीलयस्वा
स्थाता ते जयतुजेत्वानि ॥” (ऋ० सं० १,७.३५,१)॥
वनस्पते दृढाङ्गो हि भव अस्मत्सखा प्रतरणः
सुवीरः कल्याणवीरः गोभिः सन्नद्धो असि वीलयस्व
इति संस्तभस्व आस्थाता ते जयतु जेतव्यानि
‘दुन्दुभिः' इति शब्दानुकरणत् । द्रुमो भिन्नः
इति वा । दुन्दुभ्यतेर्वा स्यात् शब्दकर्मणः ।
तस्य- एषा भवति– ॥२ (१२) ॥
अर्थः- “वनस्पते” यह ऋचा गर्ग आर्षिकी है। ‘वन-
स्पते!’ हे वानस्पत्य ! बनस्पति के पुत्र रथ ! ‘ वीड्वङ्गः ’
( दृढाङ्गः ) दृढ अङ्गोंवाला ‘भूयाः’ ( भव ) हो। और फिर
‘अस्मत्सखा’ हमारा सखा ‘प्रतरणः’ संग्रामों के पार लेजाने
वाला ‘सुवीरः’ (कल्याणवीरः) नहीं डरने वाला तथा नहीं
खण्डित होने वाला आरोही (चढने वाले ) वाला हो। [और
तेरा बचाव हमने कर दिया है, क्योंकि-] तू ‘गोभिः’ गोओं
के चर्म से अथवा चर्बी से ‘सन्नद्धः सब ओर से मढाहुआ है,
हिन्दी निरुक्त । ( २३० ) ६ अ० २ पा० ३ खं०
इस कारण 'वीलयस्व' (संस्तम्भस्व) अपने को थाम । 'ते' तेरा
'आस्थाता' चढने वाला ' जेत्वानि ' ( जेतव्यानि ) जेय =
जीतने योग्य शत्रुओं 'जयतु' जीते ॥
'दुन्दुभिः' (८) यह शब्द के अनुकरण पर है जैसा ही
वह ताडित हुआ 'दुम् दुम् भि- दुम् दुम् भि'शब्द करता है,
वही उसका नाम है । अथवा 'द्रुमो भिन्नः' (वृक्ष कटा) इन
दो पदों से है- 'द्रुम' से पहिला भाग 'दुन्दु' और ' भिन्न '
से दूसरा भाग ' भि ', इस प्रकार 'दुन्दुभि' पद है । अर्थात्
द्रुम (वृक्ष) के एक भाग से छांटा हुआ और चर्म से मंढाहुआ
( बाजा ) है । अथवा शब्द अर्थ में ' दुन्दुभ ' ( दि० प० )
धातु से है ।
उसकी यह ऋचा है—॥ २ [१२] ॥
( ख० ३ )
निरु०– “उपश्वासय पृथिवी मुतद्यां पुरुत्रा ते
मनुतां विष्ठितं जगत् ।
सदुन्दुभे सजूरिन्द्रेण देवै ईराद्दवीयो अपसेध
शत्रून् ॥” [ऋ०सं०४,७,३५, ४] ॥
उपश्वासय पृथिवीं च दिवं च बहुधाते घोषं
मन्यतां विष्ठितं स्थावरं जङ्गमं च यत् स दुन्दुभे
सहजोषकः इन्द्रेण च देवैश्च दूराद् दूरतरम् अप-
सेध शत्रून् ॥
“इषुधिः” इषूणांनिधानम् ।
तस्य-एषा भवति-॥३ [१३] ॥
हिन्दी निरुक्त ( २३१ ) ६ अ० २ पा० ४ खं०
अर्थः- “उपश्वासय” यहां से सब ये युद्धोपकरण की
ऋचायें हैं । भारद्वाज ऋषि है ।
'दुन्दुभे,' हे दुन्दुभे ! (त्वम् तु 'पृथिवीम्' सारी पृथ्वी
को 'उत' और 'द्याम्' द्युलोक को उपश्वासय अपने शब्द से
पूरण करदे । जिससे कि- 'विष्ठितम्' स्थावर और 'जगत्,
जङ्गम ·ते' तेरे 'पुरुत्रा' बहुधा (घोषम्) शब्दको 'मनुताम् [मन्य-
ताम्] माने । 'सः' सो तू 'इन्द्रेण' इन्द्र के साथ 'देवैः' ( च )
और देवताओं के साथ 'सजूः' (सहजोषणाः) प्रीति युक्त होता
हुआ 'दूरात् दवीयः' ( दूराद् दूरतरम् ) दूर से भी बहुत दूर
'शत्रून्' शत्रुओं को 'अपसेध' हटादे, जिससे कि वे फिर न
आवे । (यह हम तुम से चाहते हैं) ॥
'इषुधि' (ह) क्या ? इषुओं का निधि- बाणों का कोश
= रखने का घर ।
“तस्य” उस बाणोंके घरकी स्तुतिकी यह ऋचाहै ॥१(१३)
( खं०४ )
निरु० - “बह्वीनां पिता बहुरस्य पुत्र श्चिश्चा
कृणोति समनावगत्य । इषुधिः सङ्काः पृतनाश्च
सर्वाः पृष्ठे निनद्धो जयति प्रसूतः ॥” (ऋ० सं०
५, १, १९, ५) ।'
बहूनां पिता, बहुः अस्य पुत्रः इति इषूनभि-
प्रेत्य प्रस्मयतेइव अपाव्रियमाणः। शब्दानुकरणवा।
'सङ्काः' सचेतः । सम्पूर्वाद् वा किरतेः ।
'• पृष्ठे निनद्धो जयति प्रसूतः ”- इति व्या-
ख्यातम् ॥
हिन्दी निरुक्त ( २३२ ) ६ अ ०२ पा० ४ खं०
'हस्तघ्नः' हस्ते हन्यतेः ।
तस्य एषा भवति- ॥४ [१४] ॥
अर्थः- “बह्वीनामू०” जो यह तूण 'बह्वीनां (बहूनाम्)
पिता बहुत बाणों का पिता = पालन करने वाला है, और
'अस्य' इसको (जिसका) 'बहुः' बहुत बाण समूह 'पुत्रः'
पुत्र = बहुत का त्राण करने वाला रक्षा करने वाला [पुत्र] है
(सः) सो यह 'चिश्चा कृणोति' (प्रस्मयते इव) (अपाव्रियमाणः)
खोला जाता हुआ मुसकिराता जैसा है। क्यों कि-चित्र विचित्र
रंग के बाणों के मुठिये होते हैं, जो कि-तूण के मुख की ओर
होते हैं और खोलते ही चमकते हैं, उन्हीं से तूण की ऐसी
शोभा वर्णन की गई है । इस पक्ष में 'चिश्चाति' धातु नया
कल्पित करना पड़ता है । क्यों कि- “विकारपक्षेष्वेतद-
र्थान्यधातूपादानम्” अर्थात्- 'शब्दों के अनित्यत्व पक्ष
में शब्द के अर्थ में और २ धातुओं का ग्रहण भी होता है'
यह आचार्यों की परिभाषा है । अथवा यह शब्द का अनु-
करण लेकर क्रिया पद है । 'चिश्चाकृणोति' 'चिश्चित्' शब्द
करता है' । कब ? 'समना' संग्राम में 'अवगत्य' जाकर (सः)
सो ऐसा 'इषुधिः' तूण 'पृष्ठे' पीठ में 'निनद्धः' बंधा हुआ
'प्रसूतः' धनुष् के धारण करने वाले से फेंका गया 'सर्वाः' सब
'सङ्गाः' संग्रामों को 'पृतनाश्च' और सब शत्रुओं की सेना-
ओं को 'जयति' जीत लेता है ॥
'हस्तघ्न' (१०) = कलापीपट्टक = हाथ की रक्षा के अर्थ
कलाई में बांधने का पट्टा = गोधा होता है। क्यों ? 'हस्ते
हिन्दी निरुक्त ( २३३ ) ६ अ० १ पा० १ खं०
हन्यते हाथ में बंधा हुआ धनुष की ज्या = तात से हत
होता है या ताडित होता है ।
‘तस्य” उसकी यह ऋचा है-॥४ (१४) ॥
( खं० ५ )
निरु०-“अहिरिव भोगैः पर्येति बाहुं ज्याया हेतिं
परिबाधमानः । हस्तघ्नो विश्वा वयुनानि विद्वान्
पुमान्पुमांसं परिपातु विश्वतः ॥” (ऋ०सं०५,१,२१,४)
अहिः इव परिवेष्टयति बाहुं ज्याया वधात्
परित्रायमाणः हस्तघ्नः सर्वाणि प्रज्ञानानि
प्रजानन् ।
‘पुमान्’ पुरुमना भवति । पुंसतेर्वा ।
‘अभीशवः’ व्याख्याताः ।
तेषाम्—एषा भवति- ॥५(१५)॥
अर्थः-“अहिरिव०” ( योऽयम् ) जो यह ‘ हस्तघ्नः ’
कलापोपट्ट ‘ज्यायाः’ प्रत्यञ्चा = धनुष् की तांत के ‘हेतिम्’
(वधात्) वध से ‘परिबाधमानः’ (बाहुं सर्वतः परित्रायमाणः)
भुजा को सब ओर से बचाता हुआ ‘अहिः’ (सर्पः) ‘इव’ सर्प
के समान ‘भोगैः’ कुटिल भावों से ‘बाहुम्’ भुजा को ‘पर्येति’
( परिवेष्टयति ) लपेट लेता है-सर्प के पकड़ने वाले पुरुष के
बाहु को जैसे वह लपेट लेता है, उसी प्रकार धनुष्मान् पुरुष
के हाथ में लिपटा हुआ = बंधा हुआ जो हस्तघ्न उस के
बाहुको धनुष की प्रत्यञ्चा के आघात से रक्षा करता है, वह
हस्तघ्न 'विश्वा' (सर्वाणि) सब 'वयुनानि' ( प्रज्ञानानि )
विज्ञानों को 'विद्वान्' (जानानः) जानते हुए 'पुमान्' पुरुष
के समान 'पुमांसम्' ( एतं धनुर्धरम् ) इस धनुष् के धारण
करने वाले पुरुष को 'विश्वतः' सब ओर से 'परिपातु' रक्षा
करे [ यह हम चाहते हैं ] ।
'पुमान्' क्या ? 'पुरुमनाः' वह स्त्री की अपेक्षा बड़े मन
वाला होता है । अथवा पुरुषार्थ अर्थ में 'पुंस' (भ्वा०प० )
धातु से है । क्योंकि-वह महाकार्यों के लिये उद्यम करता है ।
'अभीशवः' (११) ( अङ्गुलयः ) अङ्गुलियों का वाचक
'अभीशु' शब्द व्याख्यान किया जाचुका [अ०३पा०२खं०३में]
'तेषाम्०' उन अभीशुवों की = अङ्गुलियों की यह
ऋचा है-॥५(१५)॥
( खं० ६ )
निरु० “रथे तिष्ठन्नयति वाजिनः पुरो यत्र यत्र
कामयते सुषारथिः। अभीशूनां महिमानं पनायत
मनः पश्चादनुयच्छन्ति रश्मयः ॥” [ ऋ० सं० ५,
१, २०, १ ) ॥
रथे तिष्ठन् नयति वाजिनः पुरस्तात् सतो यत्र
यत्र कामयते सुषारथिः = कल्याणसारथिः ।
अभीशूनां महिमानं पूजयामि । मनः पश्चात्
सन्तः अनुयच्छन्ति रश्मयः ॥
'धनु;' धन्वतेर्गतिकर्मणः । वधकर्मणो वा ।
धन्वन्ति अस्माद् इषवः ।
हिन्दी निरुक्त ( २३५ ) ६ अ० २ पा० ७ खं०
तस्य- एषा भवति- ॥६ (१६)॥
अर्थः- “रथे तिष्ठन्०” जो कि- यह 'सुषारथिः'
(कल्याणसारथिः) चतुर सारथि 'रथे' रथ में = रथ के जूयें
पर 'तिष्ठन्' बैठा हुआ 'यत्र यत्र' जहां जहाँ 'कामयते' योद्धा
इच्छा करता है, उसकी इच्छा के अनुसार 'पुरः' (पुरस्तात्
सतः) आगे बढ़ते हुए 'वाजिनः' घोड़ों को 'नयति' लेजाता
है, उस सब 'अभीशूनाम्' अङ्गुलियों की महिमानम्' महिमा
को 'पनायत' (पूजयामि) मानता हूं = पूजता हूं - जो कि-
रश्मिएः (रासें) 'मनः पश्चात्' मन के अनुसार 'अनुयच्छन्ति'
घोड़ों को ले जाती हैं। अर्थात्-जिस प्रकार कि-कोई चतुर
सारथि अपने स्वामी योद्धा के इच्छानुसार युद्धस्थल में अति
वेग वाले भी घोड़ों को इधर उधर लेजाता है, वह सब
अङ्गुलियों की महिमा है, अङ्गुलियों के इशारे रासों पर
ऐसे पड़ते हैं, जिन से घोड़े ठीक मन के अनुसार काम करते
हैं, यदि अंगुलिएं न हों, तो चतुर सारथि भी क्या कर
सकता है, यह ऋषि अंगुलियों की महिमा को बड़े निरू-
पण के साथ देखता है।
'धनुः' (१३) पद गति अर्थ में 'धन्व' (भ्वा०प०) धातुसे
है। क्योंकि - उसी से बाण चलते हैं। अथवा वध अर्थ में
उसी धातु से है। क्योंकि वह शत्रु के वधके अर्थ ही उत्पन्न
होता है॥
तस्य०" उस धनुष् की स्तुति की यह ऋचा है॥६(१६)
(खं०७)
निरु०-“धन्वना गा धन्वनाजिं जयेम धन्वना
तीव्राः समदो जयेम । धनुः शत्रोरकामं कृणोति
धन्वना सर्वाः प्रदिशो जयेम ॥” ( ऋ सं ५, १,
१९, १) इति सा निगदव्याख्याता ॥
‘समदः’ समदो वा अत्तेः । सम्मदो वा मदतेः।
‘ज्या’ जयतेर्वा । जिनातेर्वा । प्रजावयति इषून्
इतिवा ।
तस्य एषा भवति ॥७।१७॥
अर्थः— “धन्वना०” “धन्वना गाः जयेम” धनुष्
से हमशत्रुओं से गोओ को जीतें। “धन्वनाआ।जिंजयेम”
धनुष् से हम चांद माली को जीतें जहां परस्पर की स्पर्द्धा
से योद्धा लोग अपनी लक्ष्य वेध की चतुराई को प्रकाश करने
के ही अर्थ अथवा वितर्क भाव से अपने प्रताप को दिखाने
के अर्थ बाण चलाते हैं, उस आजि ( वाजी ) को हम धनुष
से जीतें । “धन्वना तीव्राः समदो जयेम” धनुष से
हम दारुण संग्रामों को जीतें,–जहां अनेक शस्त्रों के सम्पात
संकट हैं अनेक वीर पुरुष व्याप्त हैं, उन्हें भी हम जीतें ।
“धनुः शत्रोः अकामं कृणोति”धनुष् शत्र को कामना
रहित कर देता है-उसकी सब कामनाओं को जो हम से हैं
नष्ट कर देता है । “धन्वना सर्वा प्रदिशो जयेम”
धनुष् से हम सब दिशाओं को जीतें ।
यह ऋचा अपने उच्चारण से ही व्याख्यान की हुई है ।
‘समदः’ (संग्राम) कैसे ? समदः = सम्—अद् । ‘सम्’ उप-
हिन्दी निरुक्त ( २३७ ) ६ अ० २ पा० ८ खं०
सर्ग सहित भक्षण अर्थ में 'अद्' ( अदा०प० ) धातु से है ।
क्योंकि उस में परस्पर योद्धाओं में एक दूसरे का भक्षित जैसा
होता है । अथवा 'सम्मद' होने से वह 'समद्' है । क्योंकि
उस में योद्धा बड़े मदयुक्त होते हैं । यह 'मद्' (भ्वा०आ०)
धातु से है ।
'ज्या' (१३) (प्रत्यञ्चा धनुष् की तांत) कैसे ? जय अर्थ
में 'जि' (भ्वा०प०) धातु से है । क्यों कि- उसके बल से जय
प्राप्त होता है । अथवा वयस् की हानि अर्थ में 'ज्या
(क्र्या०प०) धातु से है । क्योंकि-उस के द्वारा प्रतियोद्धाओं
के वय की हानि होती है । अथवा 'प्रजापयति इषून्' बाणों
का प्रजवन करती है-फेंकती है इस से 'ज्या' है ।
उस 'ज्या' की यह ऋचा है- ॥ ७ ( १७ ) ॥
( खं० ८ )
निरु०- “ वक्ष्यन्ती वेदा गनीगन्ति कर्णं प्रियं
सखायं परिषस्वजाना । योषेव शिङ्क्ते वितताधि
धन्वञ्जया इयं समने पारयन्ती ॥ ” [ ऋ० सं०
५, १, १९, ३ ] ॥
वक्ष्यन्ती-इव आगच्छति कर्णं प्रियमिव सखा-
यम् इषुं परिष्वजमाना योषाऽइव शिङ्क्ते शब्दं
करोति । वितता अधिधनुषि ज्या इयं समने संग्रामे
पारयन्ती पारं नयन्ती ॥
'इषुः' ईषतेर्गतिकर्मणः । वधकर्मणो वा ।
हिन्दी निरुक्त ( २३८ ) ६ अ० २ पा० ६ खं०
तस्य एषा भवति- ॥ ८ (१८) ॥
अर्थः- " वक्ष्यन्ती-इव-इद्-आगनी गन्ति
( आगच्छति ) कर्णम् " ' इयं ज्या ' यह ज्या कुछ
कहेगी जैसी कान के पास आती है-जैसे कोई स्त्री किसी इष्ट
पुरुष के लिये कुछ रहस्य = गुप्त बात कहने को उसके कान के
पास आती है, वैसे ही यह प्रत्यञ्जा ( तांत ) बाण चलाने की
इच्छा वाले पुरुष से बाएं हाथ से खेंची हुई बाएं कान के
पास और दाहिने हाथ से खेंची हुई दाहिने कान के पास
अपने मध्य में बाण को लिये हुए आती है । कैसे ! “ प्रियं
सखायं परिषस्वजाना ” ( प्रियमिव सखायं परिष्वज-
माना ) प्यारे सखा को जैसे बाण को आलिङ्गन करती हुई
“ योषा-इव शिङ्क्ते ( शब्दं करोति ) वितता
अधि धन्वन् ( धनुषि ) ” धनुष् के ऊपर तनी हुई
स्त्री के समान 'शी' कार शब्द करती है । “इयं ज्या समने
पारयन्ती ( अस्तु ) ” यह प्रत्यञ्चा हमें संग्राम में शत्रु-
ओं के पारको = अन्तको पहुंचाने वाली हो ॥
‘इषु’ (बाण ) (१४) पद गति अर्थ में 'ईष' (भ्वा०आ०
प०) धातु से है । क्योंकि-वह चलने के अर्थ ही किया जाता
है । अथवा वध अर्थ में उसी धातुसे है । क्योंकि- वह वधके
अर्थ ही जाता है ।
“तस्य०” उस इष (बाण) की यह ऋचा है-॥८ (१८) ॥
( खं० ६ )
निरु०“सुपर्णं वस्ते मृगो अस्या दन्तो गोभिः
हिन्दी निरुक्त (२३६) ६ अ० २पा० ६ खं
सन्नद्धा पतति प्रसूता। यत्रा नरः सञ्च विचाद्र-
वन्ति तत्रास्मभ्यमिषवः शर्म यंसन् ॥" [ऋ० सं०
५, १, २१, १ य० सं० २९, ४७ ] ॥
सुपर्णं वस्ते-इति वाजान्-अभिप्रेत्य । मृगमयः
अस्याः दन्तः । मृगयते र्वा । गोभिः संनद्धा
पतति प्रसूता-इति व्याख्यातम् । यत्र नराः सन्द्र-
वन्ति च विद्रवन्ति च, तत्र इषवः शर्म यच्छन्तु
शरणं संग्रामेषु ॥
'अश्वाजनी' कशा-इत्याहुः ।
'कशा' प्रकाशयति भयम् अश्वाय । कृष्यते
र्वा अणूभावात् ।
वाक् पुनः । प्रकाशयति अर्थान् । खशया ।
क्रोशते र्वा ।
अश्वकशाया एषा भवति ॥९[१९] ॥
अर्थ:- “सुपर्णं वस्ते०” (ये एते 'इषवः' जो ये 'इषु'
बाण 'सुपर्णम्' सुन्दर पांख को 'वस्ते' (वखते) धारण करते हैं
[वाजों के अभिप्राय से अर्थात्- वे चलते हुये देखने वालों
को वाज पक्षियों जैसे प्रतीत होंगे], 'अस्याः' (एषाम्) इनका
'मृगः' (मृगमयः) मृग का बना हुआ (मृगयतेर्वा) अथवा शत्रुओं
को या लक्ष्यों को ढूंढ़ने वाला दन्तः' दांत = अग्रभाग है।
[पहिले अर्थ में मृग के समान दौड़ने से वा मृग के चर्म से
हिन्दी निरुक्त ( २४० ) ६ अ ०२ पा० १० खं०
बधा हुआ होने से मृग या मृगमय कहा गया और दूसरे पक्ष
में ढूंढना अर्थ में 'मृग' (चु० आ०) धातु से है ] “ गोभिः
सन्नद्धा पतति प्रसूता” गो की चर्बी या बाधी से बंधे
हुये धनुर्धारी से फेंके हुये चलते हैं [यह वाक्य (निरु० २ अ०
२ पा० १ खं०) में व्याख्यान किया जा चुका है] । “यत्रानर
संच विचद्रवन्ति” (यत्रनराः संद्रवन्ति च विद्रवन्ति च)
जहां मनुष्य संघटित होते हैं = इकट्ठे होते हैं और विद्रुत हो
जाते हैं = निकल जाते हैं- “तत्र संग्रामेषु) अस्मभ्यम्
इषवः शर्म (शरणं) यंसन् [यच्छन्तु]” उन संग्रामों
में इषु (बाण) हमारे लिये कल्याण या शरण देवें ।
'अश्ववाजनी' [१५] को कशा = चाबुक ऐसा कहते हैं ।
' कशा ' क्यों ? अश्व के लिये भय प्रकाश करती है ।
अथवा चर्म से भी कृश या अणु = सूक्ष्म होती है, इससे
' कशा ' है ।
और वाक् (वाणी) भी 'कशा' होती है । क्यों कि- वह
अर्थों को प्रकाश करती है । अथवा खशया = आकाश में सोने
वाली होती है, इससे 'खशया' होती हुई 'कशा' होजाती है
अथवा शब्द अर्थ में 'क्रुश' (भ्वा० प०) धातु से है * क्यों कि
वह क्रोशन की जाती है । [अथवा तीव्र वाक्य कोड़े के समान
मर्म में लगता है, इससे वाणी भी कशा कही जाती है ।]
अश्वकशा = घोड़े की चाबुक की यह ऋचा है॥९(१६)॥
(खं०१०)
निरु०- “आजङ्घन्तिसान्वेषामघनाँउपजिघ्रते।
हिन्दी निरुक्त ( २४१ ) ६ अ० १ पा० १० खं०
अश्वाजनि प्रचेतसोऽश्वान् समत्सु चोदय ॥ "
[ऋ० सं० ५, ११, १, ३ ] ॥ ।
आजघन्ति सानूनि एषां सरणानि सक्थीनि ।
‘सक्थिः’ सचतेः । आसक्तः अस्मिन् कायः ।
जघनानि च उपघ्नन्ति ।
‘जघनं’ जङ्घन्यते । अश्वाजाने ‘ प्रचेतसः ’
प्रवृद्धचेतसः अश्वान् ‘समत्सु’ समरणेषु संग्रामेषु
चोदय ॥
‘उलूखलम्’उरुकरं वा । ऊर्ध्वखं वा । ऊर्करं
वा । उरुमे कुरु इति अब्रवीत् तद् उलूखलम्
अभवत् । “ उरुकरं वैतत्तदुलूखलम्-इत्याचक्षते
परोक्षेण ” इति च ब्राह्मणम् ।
तस्य एषा भवति ॥ १० (२०) ॥
अर्थ:- “आजङ्घनन्ति०» हे ‘अश्वाजनि !’ चाबुक!
‘एषाम्’ ( अश्वानां ) ‘सानू’ ( सानूनि = सरणानि सक्थीनि)
‘आजङ्घन्ति !’ इन घोड़ों के सानु = ऊंचे ऊंचे सक्थि ॥
पुट्ठों को आघात करनेवाली ! ‘जघना’ ( जघनानि ) ( च )
‘उपजिघ्रते !’ ( उपघ्नन्ति ! ) कमरके जोड़ों को ताड़न करने
वाली ! ( त्वम् ) तू ‘प्रचेतसः’ जोशीले 'अश्वान्’ घोड़ों को
‘समत्सु’ ( समरणेषु = संग्रामेषु) संग्रामों में ‘चोदय’ प्रेरणाकर,
जैसे कि- हम जीतें ॥
‘ सानु ’ क्या, सक्थि-( साथल = ऊंचे कटि प्रदेश )
हिन्दी निरुक्त ( २४२ ) ६ अ ०२ पा० १० खं ०
क्यों ! वे सरण होते हैं- उनके बल से चलने वाले चलते हैं।
'सक्थि' कैसे ? 'सञ्च' (भ्वा०प०) धातु से । क्यों कि-
इसमें सब शरीर आसक्त = लदाहुआ होता है ।
'जघन' क्यों ? वह बहुत फरके कोड़े से हनन = ताड़न
किया जाता है ।
'उलूखल' (१६) क्यों ? वह 'उरुकर' बहुत अन्न को करने
वाला होता है । 'उरु' शब्द से पहिला पद और 'करोति'
धातु से दूसरा पद है । अथवा 'ऊर्कर' = 'ऊर्क' शब्द करने
वाला होने से 'उलूखल' है । 'ऊर्क्' शब्द से पूर्व पद और
'करोति' धातु से ही दूसरा पद है । अथवा 'ऊर्ध्वख' =
ऊपर को छेद वाला = गड्ढे वाला होने से उलखल है ।
यहां 'ऊर्ध्व' शब्द से पहिला पद और 'ख' शब्द से दूसरा
पद है । अथवा उसने किये जाते हुये ने कहा कि- 'मेराउरु
(बहुत) ख (आकाश = छिद्र) कर' इससे वह 'उलूखल' हुआ
क्यों कि- उसमें वैसा ही गुण देखा जाता है ।
"उरुकरं वैतत तद्- उलूखलम्- इत्याचक्षते
परोक्षेण" अर्थात्- बहुत करने वाले को 'उरुकर' कहतेहैं,
सो यह 'उरुकर' प्रत्यक्ष अर्थ का वाचक (शब्द) ही परोक्ष
रूप में 'उलूखल' है ऐसा कहते हैं यह ब्राह्मण भी है । यहां
'उरुकर' प्रत्यक्ष शब्द में 'र' के स्थान में 'ल' और 'क'के स्थान
में 'ख' बदलने से 'उल खल' परोक्ष शब्द बनजाता है । क्यों
कि-इस रूप में वह अर्थ 'ल' और 'ख'से ढक(ढंप) जाता है ।
"तस्य०"उस'उलूखल'कीस्तुतिकीयहऋचाहै॥१० (२०)॥
हिन्दी निरुक्त ( २४३ ) ६ अ० २ पा० ११ खं०
(खं०११)
निरु०- “यच्चिद्धि त्वं गृहेगृहे उलूखलक युज्यसे ।
इह द्युमत्तमं वद जयता मिव दुन्दुभिः ॥”[ऋ०
सं० १, २, २५, ५]
इति सा निगद व्याख्याता ॥११[२१]॥
इति नवमाध्यायस्य द्वितीयः पादः ॥९।२॥
अर्थः-“यच्चिद्धि०” इस ऋचा का शुनःशेप ऋषि
है । और आयजी वाजसातमा” इसका भी । सोम के
अभिषव (कूटने) में विनियोग है । और अग्निचयन में इस
मन्त्र से उलूखल को अभिमन्त्रण करके रख दिया जाता है ।
हे ‘उलूखलक’ ऊखल ! ‘यच्चित् हि’ यद्यपि तू ‘गृहे गृहे’
घर घर में ‘युज्यसे’ अन्न के संस्कार के अर्थ रहता है, तथा-
पि (त्वम्) तू ‘इह’ इस हमारे घर में ही ‘जयतां दुन्दुभिः इव’
जय प्राप्त करने वालों के नगारे के समान ‘द्युमत्तमम्’ गम्भीर
शब्द ‘वद’ बोल = कर । क्यों कि- जो जीतते हैं उन्हीं का
दुन्दुभिः गम्भीर स्वर लगता है, और जो हारते हैं उनकी
दुन्दुभि का शब्द फींका होता है ॥
यह ऋचा अपने उच्चारण से ही व्याख्यान की हुई है ॥११(२१)॥
इति हिन्दीनिरुक्ते नवमाध्यायस्य द्वितीयः पादः ॥
तृतीयः पादः
( खं० १ )
निघ०- वृषभः॥१७॥ द्रुघणः ॥१८॥
हिन्दी निरुक्त ( २४४ ) ६ अ० ३ पा० २ खं०
पितुः ॥१९॥ नद्यः ॥२०॥ आपः ॥२१॥
ओषधयः॥२२॥रात्रिः॥२३॥ अरण्यानी
॥२४॥ श्रद्धा ॥२५॥ पृथिवी॥२६॥अप्व्रा
॥२७॥ अग्नायी ॥२८॥
निरु०-‘वृषभः’ प्रजां वर्षति इति वा । अतिबृहति
रेतः इतिवा । तद् वृषकर्म वर्षणाद् वृषभः॥
तस्य एषा भवति ॥१ [२२]॥
अर्थः- ‘वृषभ’ [१७] [सांड़] क्यों ? वह प्रजा = सन्तान
को बरसता है। अथवा रेत या वीर्य को सेचनकरनेको अपनेको
अतिशय से उद्यत करता है । सोही यह वृष ( बैल ) के कर्म
वाला वर्षण कर्म से ‘वृषभ’ है । यहां ‘वृष’ शब्द में ‘भ’(प्रत्यय)
जुड़ने से ‘वृषभ’ होता है ॥१[२२] ॥
( खं० २ )
निरु०- “न्यक्रन्दयन्नुपयन्त एनममेहयन् वृषभं
मध्य आजेः । तेन सूभर्वं शतमत् सहस्रं गवां
मुद्गलः प्रधने जिगाय ॥”(ऋ० सं० ८,५,२०,५ )॥
“न्यक्रन्दयन्नुपयन्त एनम्”-इति व्याख्यातम्।
अमेहयन् वृषभं मध्य आजेः = आजयनस्य =
आजवनस्य-इति वा । तेन तं सूभर्वं राजानम् ।
‘भर्वतिः’ अत्तिकर्मा । तद् वा सूभर्वं सहस्रं गवां
मुद्गलः प्रधने जिगाय ।
हिन्दी निरुक्त ( २४५ ) ६ अ० ३ पा० २ खं०
‘प्रधन’ इति संग्रामनाम । प्रकीर्णानि अस्मिन्
धनानि भवन्ति ॥
‘द्रुघणः’द्रुममयोघनः। तत्र इतिहासम्-आचक्षते
मुद्गलो भार्म्यश्व ऋषि वृषभं च द्रुघणं च युक्त्वा
संग्रामे व्यवहृत्य आजिं जिगाय ॥
तदभिवादिनी एषा ऋग् भवति ॥२(२३) ॥
अर्थ- “न्यक्रन्दयन्नुपयन्तएनम्” इसकी पृथक् २
पदों के रूप में व्याख्या होचुकी किन्तु एक वाक्य के रूप में
यह व्याख्या है—
मन्त्र को देखने वाला ऋषि कहता है—मुद्गल ऋषि मे
किसी ने पूछा कि— तुमने बैल से इस राजा को कैसे जीता
ऋषि ने उत्तर दिया कि— सुनो । — शत्रुओं ने ‘उपयन्तः
पास जा जा कर ‘आजे’ (संग्रामस्य) संग्राम के ‘मध्ये’, मध्य
में वर्त्तमान ‘एनम्’ इस ‘वृषभम्’ बैल को ‘न्यक्रन्दयन्’ थका-
ना चाहा = दम उखाड़ना चाहा = ऐसा यत्न किया कि यह
निष्क्रन्दन करे = हार कर बा बां करे और [ अपनी थकावट
मिटाने के लिये-]‘अस्नेहयन्’इसे गोबर कराने का यत्न किया
बीच में युद्ध बन्ध करके उसे अवकाश दिया कि- यह गोबर
करके ( क्यों कि बैलों का ऐसा स्वभाव होता है कि— वे
निचले खड़े होकर गोबर करते हैं) [किन्तु उनके दोनों यत्न
निष्फल हुये, और अन्त में] ( अहम् ) मैंने ‘तेन’ उन पूर्वोक्त
गुणों वाले ‘मुद्गलः’ मुद्गल इस बैल से ‘सूमर्ध’ (राजानम् )
सूमर्ध राजा से ‘ गवां’ ‘शतवत्-सहस्रम्’ गायों का एक लक्ष
‘जिगाय’ जीता ॥