निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( २४२ ) ६ अ ०२ पा० १० खं ०
क्यों ! वे सरण होते हैं- उनके बल से चलने वाले चलते हैं।
'सक्थि' कैसे ? 'सञ्च' (भ्वा०प०) धातु से । क्यों कि-
इसमें सब शरीर आसक्त = लदाहुआ होता है ।
'जघन' क्यों ? वह बहुत फरके कोड़े से हनन = ताड़न
किया जाता है ।
'उलूखल' (१६) क्यों ? वह 'उरुकर' बहुत अन्न को करने
वाला होता है । 'उरु' शब्द से पहिला पद और 'करोति'
धातु से दूसरा पद है । अथवा 'ऊर्कर' = 'ऊर्क' शब्द करने
वाला होने से 'उलूखल' है । 'ऊर्क्' शब्द से पूर्व पद और
'करोति' धातु से ही दूसरा पद है । अथवा 'ऊर्ध्वख' =
ऊपर को छेद वाला = गड्ढे वाला होने से उलखल है ।
यहां 'ऊर्ध्व' शब्द से पहिला पद और 'ख' शब्द से दूसरा
पद है । अथवा उसने किये जाते हुये ने कहा कि- 'मेराउरु
(बहुत) ख (आकाश = छिद्र) कर' इससे वह 'उलूखल' हुआ
क्यों कि- उसमें वैसा ही गुण देखा जाता है ।
"उरुकरं वैतत तद्- उलूखलम्- इत्याचक्षते
परोक्षेण" अर्थात्- बहुत करने वाले को 'उरुकर' कहतेहैं,
सो यह 'उरुकर' प्रत्यक्ष अर्थ का वाचक (शब्द) ही परोक्ष
रूप में 'उलूखल' है ऐसा कहते हैं यह ब्राह्मण भी है । यहां
'उरुकर' प्रत्यक्ष शब्द में 'र' के स्थान में 'ल' और 'क'के स्थान
में 'ख' बदलने से 'उल खल' परोक्ष शब्द बनजाता है । क्यों
कि-इस रूप में वह अर्थ 'ल' और 'ख'से ढक(ढंप) जाता है ।
"तस्य०"उस'उलूखल'कीस्तुतिकीयहऋचाहै॥१० (२०)॥