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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 999, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 999

हिन्दी निरुक्त ( २३३ ) ६ अ० १ पा० १ खं०
हन्यते हाथ में बंधा हुआ धनुष की ज्या = तात से हत
होता है या ताडित होता है ।
‘तस्य” उसकी यह ऋचा है-॥४ (१४) ॥
( खं० ५ )
निरु०-“अहिरिव भोगैः पर्येति बाहुं ज्याया हेतिं
परिबाधमानः । हस्तघ्नो विश्वा वयुनानि विद्वान्
पुमान्पुमांसं परिपातु विश्वतः ॥” (ऋ०सं०५,१,२१,४)
अहिः इव परिवेष्टयति बाहुं ज्याया वधात्
परित्रायमाणः हस्तघ्नः सर्वाणि प्रज्ञानानि
प्रजानन् ।
‘पुमान्’ पुरुमना भवति । पुंसतेर्वा ।
‘अभीशवः’ व्याख्याताः ।
तेषाम्—एषा भवति- ॥५(१५)॥
अर्थः-“अहिरिव०” ( योऽयम् ) जो यह ‘ हस्तघ्नः ’
कलापोपट्ट ‘ज्यायाः’ प्रत्यञ्चा = धनुष् की तांत के ‘हेतिम्’
(वधात्) वध से ‘परिबाधमानः’ (बाहुं सर्वतः परित्रायमाणः)
भुजा को सब ओर से बचाता हुआ ‘अहिः’ (सर्पः) ‘इव’ सर्प
के समान ‘भोगैः’ कुटिल भावों से ‘बाहुम्’ भुजा को ‘पर्येति’
( परिवेष्टयति ) लपेट लेता है-सर्प के पकड़ने वाले पुरुष के
बाहु को जैसे वह लपेट लेता है, उसी प्रकार धनुष्मान् पुरुष
के हाथ में लिपटा हुआ = बंधा हुआ जो हस्तघ्न उस के
बाहुको धनुष की प्रत्यञ्चा के आघात से रक्षा करता है, वह