निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( २३७ ) ६ अ० २ पा० ८ खं०
सर्ग सहित भक्षण अर्थ में 'अद्' ( अदा०प० ) धातु से है ।
क्योंकि उस में परस्पर योद्धाओं में एक दूसरे का भक्षित जैसा
होता है । अथवा 'सम्मद' होने से वह 'समद्' है । क्योंकि
उस में योद्धा बड़े मदयुक्त होते हैं । यह 'मद्' (भ्वा०आ०)
धातु से है ।
'ज्या' (१३) (प्रत्यञ्चा धनुष् की तांत) कैसे ? जय अर्थ
में 'जि' (भ्वा०प०) धातु से है । क्यों कि- उसके बल से जय
प्राप्त होता है । अथवा वयस् की हानि अर्थ में 'ज्या
(क्र्या०प०) धातु से है । क्योंकि-उस के द्वारा प्रतियोद्धाओं
के वय की हानि होती है । अथवा 'प्रजापयति इषून्' बाणों
का प्रजवन करती है-फेंकती है इस से 'ज्या' है ।
उस 'ज्या' की यह ऋचा है- ॥ ७ ( १७ ) ॥
( खं० ८ )
निरु०- “ वक्ष्यन्ती वेदा गनीगन्ति कर्णं प्रियं
सखायं परिषस्वजाना । योषेव शिङ्क्ते वितताधि
धन्वञ्जया इयं समने पारयन्ती ॥ ” [ ऋ० सं०
५, १, १९, ३ ] ॥
वक्ष्यन्ती-इव आगच्छति कर्णं प्रियमिव सखा-
यम् इषुं परिष्वजमाना योषाऽइव शिङ्क्ते शब्दं
करोति । वितता अधिधनुषि ज्या इयं समने संग्रामे
पारयन्ती पारं नयन्ती ॥
'इषुः' ईषतेर्गतिकर्मणः । वधकर्मणो वा ।