निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त । ( २३० ) ६ अ० २ पा० ३ खं०
इस कारण 'वीलयस्व' (संस्तम्भस्व) अपने को थाम । 'ते' तेरा
'आस्थाता' चढने वाला ' जेत्वानि ' ( जेतव्यानि ) जेय =
जीतने योग्य शत्रुओं 'जयतु' जीते ॥
'दुन्दुभिः' (८) यह शब्द के अनुकरण पर है जैसा ही
वह ताडित हुआ 'दुम् दुम् भि- दुम् दुम् भि'शब्द करता है,
वही उसका नाम है । अथवा 'द्रुमो भिन्नः' (वृक्ष कटा) इन
दो पदों से है- 'द्रुम' से पहिला भाग 'दुन्दु' और ' भिन्न '
से दूसरा भाग ' भि ', इस प्रकार 'दुन्दुभि' पद है । अर्थात्
द्रुम (वृक्ष) के एक भाग से छांटा हुआ और चर्म से मंढाहुआ
( बाजा ) है । अथवा शब्द अर्थ में ' दुन्दुभ ' ( दि० प० )
धातु से है ।
उसकी यह ऋचा है—॥ २ [१२] ॥
( ख० ३ )
निरु०– “उपश्वासय पृथिवी मुतद्यां पुरुत्रा ते
मनुतां विष्ठितं जगत् ।
सदुन्दुभे सजूरिन्द्रेण देवै ईराद्दवीयो अपसेध
शत्रून् ॥” [ऋ०सं०४,७,३५, ४] ॥
उपश्वासय पृथिवीं च दिवं च बहुधाते घोषं
मन्यतां विष्ठितं स्थावरं जङ्गमं च यत् स दुन्दुभे
सहजोषकः इन्द्रेण च देवैश्च दूराद् दूरतरम् अप-
सेध शत्रून् ॥
“इषुधिः” इषूणांनिधानम् ।
तस्य-एषा भवति-॥३ [१३] ॥