निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 997, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( २३१ ) ६ अ० २ पा० ४ खं०
अर्थः- “उपश्वासय” यहां से सब ये युद्धोपकरण की
ऋचायें हैं । भारद्वाज ऋषि है ।
'दुन्दुभे,' हे दुन्दुभे ! (त्वम् तु 'पृथिवीम्' सारी पृथ्वी
को 'उत' और 'द्याम्' द्युलोक को उपश्वासय अपने शब्द से
पूरण करदे । जिससे कि- 'विष्ठितम्' स्थावर और 'जगत्,
जङ्गम ·ते' तेरे 'पुरुत्रा' बहुधा (घोषम्) शब्दको 'मनुताम् [मन्य-
ताम्] माने । 'सः' सो तू 'इन्द्रेण' इन्द्र के साथ 'देवैः' ( च )
और देवताओं के साथ 'सजूः' (सहजोषणाः) प्रीति युक्त होता
हुआ 'दूरात् दवीयः' ( दूराद् दूरतरम् ) दूर से भी बहुत दूर
'शत्रून्' शत्रुओं को 'अपसेध' हटादे, जिससे कि वे फिर न
आवे । (यह हम तुम से चाहते हैं) ॥
'इषुधि' (ह) क्या ? इषुओं का निधि- बाणों का कोश
= रखने का घर ।
“तस्य” उस बाणोंके घरकी स्तुतिकी यह ऋचाहै ॥१(१३)
( खं०४ )
निरु० - “बह्वीनां पिता बहुरस्य पुत्र श्चिश्चा
कृणोति समनावगत्य । इषुधिः सङ्काः पृतनाश्च
सर्वाः पृष्ठे निनद्धो जयति प्रसूतः ॥” (ऋ० सं०
५, १, १९, ५) ।'
बहूनां पिता, बहुः अस्य पुत्रः इति इषूनभि-
प्रेत्य प्रस्मयतेइव अपाव्रियमाणः। शब्दानुकरणवा।
'सङ्काः' सचेतः । सम्पूर्वाद् वा किरतेः ।
'• पृष्ठे निनद्धो जयति प्रसूतः ”- इति व्या-
ख्यातम् ॥