निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( २४३ ) ६ अ० २ पा० ११ खं०
(खं०११)
निरु०- “यच्चिद्धि त्वं गृहेगृहे उलूखलक युज्यसे ।
इह द्युमत्तमं वद जयता मिव दुन्दुभिः ॥”[ऋ०
सं० १, २, २५, ५]
इति सा निगद व्याख्याता ॥११[२१]॥
इति नवमाध्यायस्य द्वितीयः पादः ॥९।२॥
अर्थः-“यच्चिद्धि०” इस ऋचा का शुनःशेप ऋषि
है । और आयजी वाजसातमा” इसका भी । सोम के
अभिषव (कूटने) में विनियोग है । और अग्निचयन में इस
मन्त्र से उलूखल को अभिमन्त्रण करके रख दिया जाता है ।
हे ‘उलूखलक’ ऊखल ! ‘यच्चित् हि’ यद्यपि तू ‘गृहे गृहे’
घर घर में ‘युज्यसे’ अन्न के संस्कार के अर्थ रहता है, तथा-
पि (त्वम्) तू ‘इह’ इस हमारे घर में ही ‘जयतां दुन्दुभिः इव’
जय प्राप्त करने वालों के नगारे के समान ‘द्युमत्तमम्’ गम्भीर
शब्द ‘वद’ बोल = कर । क्यों कि- जो जीतते हैं उन्हीं का
दुन्दुभिः गम्भीर स्वर लगता है, और जो हारते हैं उनकी
दुन्दुभि का शब्द फींका होता है ॥
यह ऋचा अपने उच्चारण से ही व्याख्यान की हुई है ॥११(२१)॥
इति हिन्दीनिरुक्ते नवमाध्यायस्य द्वितीयः पादः ॥
तृतीयः पादः
( खं० १ )
निघ०- वृषभः॥१७॥ द्रुघणः ॥१८॥