निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( २४० ) ६ अ ०२ पा० १० खं०
बधा हुआ होने से मृग या मृगमय कहा गया और दूसरे पक्ष
में ढूंढना अर्थ में 'मृग' (चु० आ०) धातु से है ] “ गोभिः
सन्नद्धा पतति प्रसूता” गो की चर्बी या बाधी से बंधे
हुये धनुर्धारी से फेंके हुये चलते हैं [यह वाक्य (निरु० २ अ०
२ पा० १ खं०) में व्याख्यान किया जा चुका है] । “यत्रानर
संच विचद्रवन्ति” (यत्रनराः संद्रवन्ति च विद्रवन्ति च)
जहां मनुष्य संघटित होते हैं = इकट्ठे होते हैं और विद्रुत हो
जाते हैं = निकल जाते हैं- “तत्र संग्रामेषु) अस्मभ्यम्
इषवः शर्म (शरणं) यंसन् [यच्छन्तु]” उन संग्रामों
में इषु (बाण) हमारे लिये कल्याण या शरण देवें ।
'अश्ववाजनी' [१५] को कशा = चाबुक ऐसा कहते हैं ।
' कशा ' क्यों ? अश्व के लिये भय प्रकाश करती है ।
अथवा चर्म से भी कृश या अणु = सूक्ष्म होती है, इससे
' कशा ' है ।
और वाक् (वाणी) भी 'कशा' होती है । क्यों कि- वह
अर्थों को प्रकाश करती है । अथवा खशया = आकाश में सोने
वाली होती है, इससे 'खशया' होती हुई 'कशा' होजाती है
अथवा शब्द अर्थ में 'क्रुश' (भ्वा० प०) धातु से है * क्यों कि
वह क्रोशन की जाती है । [अथवा तीव्र वाक्य कोड़े के समान
मर्म में लगता है, इससे वाणी भी कशा कही जाती है ।]
अश्वकशा = घोड़े की चाबुक की यह ऋचा है॥९(१६)॥
(खं०१०)
निरु०- “आजङ्घन्तिसान्वेषामघनाँउपजिघ्रते।