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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

हिन्दी निरुक्त ( ६३ ) ७ अ०३ पा० १० खं०
में अनावश्यक शब्दों के संग्रह से बडा गौरव होंगया था अतः
उन शब्दों को निकाल कर पञ्चाध्यायी के रूप में प्रधान
देवता नामों और आवश्यक नैघण्टुक तथा ऐकपदिक शब्दों
का उन्होंने संग्रह किया और उसी पर यह “निरुक्त” नाम
भाष्य निर्माण किया है ।
इस स्थल के निरुक्त को देखने से यह बात स्पष्ट होजाती
है कि-जिस प्रकार व्याकरण शास्त्र को अनादि परम्परागत
होने पर भी उस के ग्रन्थों की रचना समय २ पर बदलती
आई है, उसी प्रकार “निघण्टु” शास्त्र की भी परम्परा है
इस की भी समय २ में आचार्यों के द्वारा नई ३ रचना हुई
है और अब हम जिस निघण्टु को पढ रहे हैं, वह यास्क
मुनिका ही किया हुआ परिष्कृत संग्रह है । जिस का प्रमाण
यह प्रकरण ही है-
“यत्तु संविज्ञानभूतं स्यात् प्राधान्यस्तुति
तत् समामने ” अर्थात्-जो संविज्ञानभूत प्राधान्य से
स्तुति युक्त नाम हो उसी को मैं समाम्नान करता हूं ।
इस के अतिरिक्त आरम्भ की प्रतिज्ञा भी यही बात
कह रही है, कि आचार्य अपने ही समाम्नान किये हुए
समाम्नाय की व्याख्या करते हैं-
“समाम्नायः समाम्नातः, स व्याख्यातव्यः ”
अर्थात् समाम्नाय का समाम्नान हो चुका, उसकी व्याख्या
करना चाहिये ।
यदि समाम्नाय पहिले से प्रस्तुत होता, तौ “समा-
म्नायो व्याख्यातव्यः ” समाम्नाय की व्याख्या करना

हिन्दी निरुक्त ( ६४ ) ७ अ० ३ पा० १० खं०
चाहिए, इतना ही पर्याप्त था । जैसे "अथातो धर्मजि-
ज्ञासा" आदि अन्य आर्ष ग्रन्थों में प्रतिज्ञा वाक्य हैं
किन्तु "समाम्नायः समाम्नातः" 'समाम्नाय का समा-
म्नान किया गया'—इस अनुवाद की क्या अपेक्षा थी ? सुतराम्
समाम्नाय का समाम्नान स्वयम् यास्काचार्य ने ही किया है
इसी से उनको ऐसा कहना उचित था । इसी की पुष्टि
"यत्त संविज्ज्ञानभूतं०" यह उपरिलिखित वाक्य
स्पष्ट शब्दों में कर ही रहा है। अतः यह असन्दिग्ध सिद्ध
होगया कि- यह संग्रह यास्काचार्य का ही है, और का
नहीं ॥ १० ( १३ ) ॥
इति हिन्दीनिरुक्ते सप्तमाध्यायस्य तृतीयः पादः ॥ ७, ३ ॥
( समाप्त उपोद्घातः )

हिन्दी निरुक्त ( ६५ ) ७ अ० ४ पा० १ खं०
चतुर्थः पादः ।
( खं० १ )
अथ निघण्टुपञ्चमोऽध्यायः । ५ ।
( अथ त्रीणि पदानि )
ॐ ॥ अग्निः ॥ १ ॥
( निरु०- ) अथातोऽनुक्रमिष्यामः । अग्निः
पृथिवीस्थानः तं प्रथमं व्याख्यास्यामः ।
'अग्निः' कस्मात् ? अग्रणीर्भवति । अग्रं यज्ञेषु
प्रणीयते । अङ्गं नयति सन्नममानः । अक्नोपनो
भवति इति स्थौलाष्ठीविः । न क्नोपयति, न स्नेह-
यति ।
त्रिभ्य आख्यातेभ्यो जायते इति शाकपूणिः ।
इताद्, अक्ताद्, दग्धाद् वा नीतात् । स खलु एतेः
अकारम् आदत्ते, गकारम्- अनक्तेर्वा, दहतेर्वा,
नीः परः ।
तस्य एषा भवति ॥ १ ( १४ ) ॥
अर्थः- “अथातो०” अब यहां से अनुक्रमण करेंगे-
सामान्यरूप से 'अग्नि' आदि देवपत्नी पर्यन्त सब देवताओं
की व्याख्या होचुकी, अब विशेष रूप से 'अग्नि' आदि
( १५१ ) शब्दों की प्रतिपद व्याख्या होगी ।
'अग्नि' ( देवता ) पृथिवी स्थान है-इस का पृथिवी

हिन्दी निरुक्त ( ६६ ) ७ अ० ४ पा० १ ख०
ही स्थान है, किन्तु अन्तरिक्ष या द्युलोक नहीं है। [ क्यों
कि-उसको कर्म का अधिकार पृथिवी लोक ही में है, जो कुछ
वह करता है, पृथिवी में ही करता है। ] "तं प्रथमं०"
उस (अग्नि) को पहिले व्याख्यान करेंगे-क्योंकि-इस का
पृथिवी स्थान है और वह हमारे निकट तथा वही लोकों
की गणना में पहिले आती है, इससे प्रथम पृथिवी स्थान
अग्नि की ही व्याख्या करेंगे। [ कारण के विना प्रथम का
लङ्घन नहीं किया जाता।
'अग्नि' क्यों है ? वह अग्रणी होता है-सब कामों में
अपने को आगे लेजाता है-वह सब जगह ऐसा उपकार
करता है, जिससे अग्र (आगा) बन जावे। अथवा यज्ञों
में आगे (आहवनीय आदि स्थानों में) पहुंचाया जाता है,
इस से 'अग्रणी' होता हुआ 'अग्नि' हो जाता है। "अङ्गं
नयति संनममानः" झुकता हुआ ही अङ्ग को लेजाता
है- जिस किसी लौकिक वैदिक कर्म में जाता है, अङ्ग को
झोंक देता है-अपनी तत्परता से आप वहां प्रधान बन
जाता है, और और सबको अपना अङ्ग (पिछलगू) बना
लेता है।
'अक्नोपन' है (इसी से अग्नि है) यह स्थौलाष्ठीवी
आचार्य मानता है। (अक्नोपन क्या ?) "न क्नोपयति =
न स्नेहयति" चिकनाता नहीं = सचिक्कण नहीं करता-
जहां तृण काष्ठादि में जाता है सबको रूखा बना देता है।
'त्रिभ्य आख्यातेभ्यः" तीन आख्यातों से (अग्नि)
होता है,- तीन आख्यातों की क्रियाएं इसमें प्रतीत होती

हिन्दी निरुक्त ( ६७ ) ७ अ० ४ पा० २ खं०
हैं,–यह शाकपूणि आचार्य मानता है । [जैसे–] 'इतात्' गति
अर्थ में 'इ' ( अदा० प० ) धातु से 'अक्तात्' प्रकाशन अर्थ में
'अञ्ज' ( रु० प० ) धातु से 'दग्धाद्वा' अथवा भस्मीकरण
(जलाना) अर्थ में 'दह' (भ्वा०प०) धातु से 'नीतात्' प्रापण
( प्राप्त करना ) अर्थ में 'नी' ( भ्वा० उ० ) धातु से है । वह
शाकपूणि 'इ, (अ०प० ) से अकार को लेता है, 'ग' कार को
'अञ्ज (रु०प०) से अथवा 'दह' (भ्वा०प०) से (लेता है) 'नी'
(भ्वा०उ०) धातु पर है- तीसरे स्थान में है ।
"तस्य एषा०" उस अग्नि की यह ऋचा है– ॥१(१४)॥
(खं० २ )
(निरु०) "अग्निमीळे पुरोहितं यज्ञस्य देव-
मृत्विजम् । होतारं रत्नधातमम्" ॥ (ऋ०सं०१,१,१)
"अग्निम्-ईले" अग्निं याचामि । 'ईलिः' अध्ये-
षणाकर्मा, पूजाकर्मा वा ।
'पुरोहितो' व्याख्यातः [२,३,३]
'यज्ञ'श्च [ ३, ४, २ ]
'देवो' दानाद् वा । दीपनाद् वा । द्योतनाद् वा ।
द्युस्थानो भवति-इति वा ।
योदेवः सा देवता ।
'होतारं' ह्वातारम् ।
जुहोतेर्होता-इति-और्णवाभः ।
'रत्नधातमम्' रमणीयानां धनानां दातृतमम् ।
तस्य एषा अपरा भवति ॥ २ (१५) ॥

हिन्दी निरुक्त ( ६८ ) ७ अ० ४ पा० २ सं०
अर्थ :- “अग्निमीले०” इस ऋचा का मधुच्छन्दस्
ऋषि, गायत्री छन्द और आश्विन शस्त्र में विनियोग है ।
(अहम्) मैं ‘अग्निम्’ ‘देवम्’ अग्नि देवको ‘ईले’ ( या-
चामि ) याचना करता हूं-उस से प्रार्थना करता हूं, जो
'पुरोहितम्' देवताओं का पुरोहित, “यज्ञस्य ऋत्विजम्”
यज्ञ में ऋत्विज् (कर्म करने वाला), ‘होतारम्’ देवताओं का
बुलाने वाला 'रत्नधातमम्' और रमणीय ( सुन्दर ) धनों का
बहुत करके देने वाला है, उसको [ बुलाता हूं या याचना
करता हूं ] ।
[ एक पद निरुक्त-] 'ईड' (अदा०आ०) धातु का सत्कार
पूर्वक बरताव करना या पूजा अर्थ है ।
'पुरोहित' शब्द की व्याख्या हो चुकी (२,३,३) ।
'यज्ञ' शब्द की भी व्याख्या हो चुकी (३,४,२) ।
'देव' क्यों ? दान करने से । अथवा दीपन ( जलाने )
से । अथवा द्योतन (प्रकाश) से । अथवा द्युस्थान है- द्युलोक
में रहता है इससे [ देव है ] ।
“योदेवः” जो देव है, वही 'देवता' है-‘देव’ शब्द
और 'देवता' शब्द दोनों समान अर्थ में हैं ।
'होता' क्या होता ( बुलाने वाला ) ।
(हु) ( जु० प० ) धातु से 'होतृ' शब्द है, यह और्णवाभ
[आचार्य मानता है] ।
'रत्नधातम' रमणीय धनोंका अति दान करने वाला।
“रत्नानिदधाति इति रत्नधा,” रत्नों का धारण करने

[Header] हिन्दी निरुक्त ( ६६ ) ७ अ० ४ पा० ३ खं०

वाला 'रत्नधा' (सायणः) अति 'रत्नधा', 'रत्नधातम'
होता है।
“तस्य एषा०” उस (अग्नि) की यह और ऋचा है
२ (१५)”
(खं० ३)
(निरु०-) “अग्निः पूर्वेभि ऋषिभिरीड्यो
नूतनैरुत। स देवान् एह वक्षति” ॥ [ ऋ० सं०
१, १, २ ]॥
अग्निर्यः पूर्वैः ऋषिभिः इडितव्यो वन्दितव्योऽ-
स्माभिश्च नवतरैः । स देवान् इह आवहतु-इति ॥
स न मन्येत- अयमेव अग्निः इति। अपि
एते उत्तरे ज्योतिषी अग्नी उच्येते। ततो नु
मध्यमः ॥ ३ ( १६ ) ॥
अर्थ.- “अग्निः पूर्वेभिः०” इस ऋचा का पूर्व ऋचा
के समान ही ऋषि छंद और विनियोग है।
‘तद्’ (उस) शब्द की अपेक्षाबल से भाष्यकार ने ‘यद्’
(जिस या जो) शब्द का अध्याहार किया है- (यः) जो
(अग्निः) अग्नि देव ‘पूर्वेभिः’ (पूर्वैः) पूर्व ‘ऋषिभिः’
ऋषियों से ‘ईड्यः’ (ईडितव्यः = वन्दितव्यः) स्तुति करने
योग्य है, ‘नूतनैः’ (उत) (अस्माभिश्चनवतरैः) और हम
बहुत नए ऋषियों से जो स्तुति करने योग्य है, ‘सः’ वह
(अग्नि देव) ‘इह’ हमारे इस यज्ञ में ‘देवान्’ देवताओं को

हिन्दी निरुक्त ( ७० ) ७ अ० ४ पा० ४ खं०
'आ-वक्षति' (आवहतु) बुलावे या लावे । 'इति' ऐसे उदाहरण
इस पार्थिव अग्नि के होंगे, यह आचार्य दिखाते हैं ॥
जिस प्रकार 'अग्नि' शब्द पार्थिव ज्योति में मिलता है
उसी प्रकार मध्यम और उत्तम ज्योतियों में भी उपलब्ध होता
है, इस कारण यह संकीर्ण (सांकर्ययुक्त = साधारण) शब्द
है, इसीसे यहां इस विषय का विचार आरम्भ होता है-
“स न मन्येत०” इत्यादि । वह (शिष्य) न मानेगा-
यही (पार्थिव) अग्नि है-इस 'अग्नि' शब्द को मुख्य अर्थ
यही पृथिवी का प्रसिद्ध अग्नि है, यह न मानेगा, [क्योंकि-
और भी ये दूसरी ज्योतिएं = मध्यम उत्तम ज्योतिएं 'अग्नि'
कहलाती हैं ।
“ततो नु मध्यमः” 'नु' शब्द वितर्क अर्थ में है ।
देखो ! तिस वक्ष्यमाण या दिखाई जाने वाली ऋचा के प्रा-
माण्य से अग्नि शब्द का वाच्य मध्यम ज्योति होता है-
॥ ३ (१६) ॥
(खं० ४)
(निरु०-) “अभिप्रवन्त समनेव योषाः कल्याण्यः
स्मयमानासो अग्निम् । घृतस्य धाराः समिधो
नसन्त ता जुषाणो हर्य्यति जातवेदाः ॥”
[ऋ० सं० ३, ८, ११, ३]
अभिनमन्त समनस इव योषाः । समनं समन-
नाद् वा । सम्मानाद् वा । कल्याण्यः स्मय-
मानाः ।

हिन्दी निरुक्त ( ७१ ) ७ अ० ४ पा० ४ खं०
'अग्निम्'–इति औपमिकम् ।
“घृतस्य धारा.” उदकस्य धाराः ।
“समिधो नसन्त” 'नसति' आप्नोतिकर्मा वा ।
नमतिकर्मा वा ॥
“ता जुषाणो हर्य्यति जातवेदाः” 'हर्य्यतिः'
प्रेप्साकर्मा-‘विहर्य्यति’–इति ॥
“समुद्रादूर्मिमधुमाँ उदारत्” (ऋ०सं०३,८, १०१
इति आदित्यमुक्त मन्यन्ते ।
“समुद्राद्धयेषोऽद्भ्य उदेति” इति च ब्राह्मणम् ।
अथापि ब्राह्मणं भवति—“अग्निः सर्वा देवताः”
इति ।
तस्य उत्तरा भूयसे निर्वचनाय ॥ ४ (१७) ॥
अर्थः-‘‘अभिप्रवन्त०” इस ऋचा का बामदेव ऋषि,
सप्तम अहन् में दशरात्र के आज्य शस्त्र में विनियोग है ।
'इव' (यथा) जिस प्रकार 'समनाः' (समनसः = एकस्मिन्
भर्त्तरि समानमनसः) एक भर्त्ता में समान मन वालीं (स्मय-
मानासः) मन्दहसन वालीं 'कल्याण्यः' रूप यौवन आदि
गुणों वालीं 'योषाः' स्त्रिएं 'अभिप्रवन्त' (अभिनमन्त) संमुख
भाव से नम्र होती हैं । (तथा) वैसे ही 'घृतस्य' ( उदकस्य )
'धाराः' जलकी धाराएं 'समिधः' (समिधयन्त्यः) दीपन करती
हुईं 'अग्निम्' मध्यम स्थान की ज्योति को 'नसन्त (प्राप्नु-
वन्ति ) प्राप्त होती हैं, या उसको नमस्कार करती हैं । 'नस'

हिन्दी निरुक्त ( ७२ ) ७ अ० ४ पा० ४ खं०
(भ्वा० प०) धातु आप्नोति के अर्थ (प्राप्ति) में है, या 'नम'
नमस्कार करना = झुकना) (भ्वा० प०) धातु के अर्थ-
में है । 'ताः' उन जल धाराओं को जुषाणः, सेवन करता हुआ
या प्यार करता हुआ 'जातवेदाः' (वैद्युतोऽग्निः) मध्यम-
स्थान का वैद्युत अग्नि 'हर्यति' (विहर्य्यति) विहार करता
है या कामना करता है । 'हर्य' (भ्वा० प०) धातु प्रेप्सा या
अति इच्छा अर्थ में है ॥
व्याख्या
“अभिप्रवन्त०” मन्त्र में घृतधारा उदक धारा ही हैं।
क्योंकि एक पति के संमुख अनेक योषायों के समान मध्यम
ज्योति के प्रति अनेक जलधाराओं के ही जानेका संभव है ।
घृत की हवनाहुतिएं अग्नि में मन्त्र के साथ एक २ करके
क्रमसे दीजाती हैं, इस से घृतधाराओं के स्वीकार में उपमान
उपमेय भाव नहीं बन सकता । इसीसे यहाँ अग्नि पदसे मध्यम
ज्योति (वैद्युतअग्नि) ही उक्त होता है इसी सामर्थ्य को लेकर
जलके नामों में “घृत” नाम पढ़ा है ॥
'समन' कैसे ? समनन से—'सम्' (उप०) 'अन' प्राणने
(अदा० प०) धातु से है। अथवा संमानन से—'सम्' (उप०)
'मन' अवबोधने (त०आ०) धातु से है ॥
'अग्नि' शब्द से उत्तम ज्योति के ग्रहण में निगम-
अर्थः- “समुद्रादूर्मिः०” अर्थात्-समुद्र या जल के समूह
से ऊर्मि या अपने प्रकाश से सब जगत् को ढांपने वाला मधु-
मान् (जलवाला) आदित्य 'उदारत्' नित्य २ उदय होता है।

हिन्दी निरुक्त ( ७३ ) ७ अ० ४ पा० ५ खं०
[ यद्यपि इस मन्त्र में 'अग्नि' शब्द नहीं, तथापि कोई शा-
खावालों के सूक्त में “इमं स्तनम्०” इस ऋचा में “अपा
प्रपीनमग्ने०” यह 'अग्नि' शब्द है, इस से यह निगम साधु
है । ] यहां आदित्य को उक्त (कहा गया) मानते हैं ॥
“समुद्राद्ध्येषोदूह्यतः” यह आदित्य अग्नि समुद्र के
जलों से उदय होता है । यह ब्राह्मण है । [ समुद्र से पार्थिव
अग्नि के उदय होने का संभव नहीं इसी से यहां अग्नि आ-
दित्य ही है । ]
“अथापि०” और भी ब्राह्मण है— “अग्निः सर्वा
देवताः” अर्थात्-अग्नि सब देवता हैं ॥
“तस्य०” उस ( ब्राह्मण वाक्य ) के अगली ऋचा बहुत
निर्वचन के लिये है-उसका अर्थ अगली ऋचा में स्पष्टरूप से
वर्णन किया हुआ है ॥ ४ ( १७ ) ॥
( खं० ५ )
(निरु०) “इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहुरथो दिव्यः
ससुपर्णो गरुत्मान् । एकं सद् विप्रा बहुधा वद-
न्त्यग्निं यमं मातरिश्वानमाहुः ॥” [ऋ०सं०२·३,२२,६]
इममेव अग्निं महान्तम् आत्मानम् एकम् आ-
त्मानं बहुधा मेधाविनो वदन्ति—इन्द्रं मित्रं
वरुणम् अग्निं दिव्यं च गरुत्मन्तम् ।
‘दिव्यः’ दिविजः ।
‘गरुत्मान्’ गरणवान् । गुर्वात्मा । महात्मा-इतिवा।

हिन्दी निरुक्त ( ७४ ) ७ अ० ४ पा० ५ खं०
यस्तु सूक्तं भजते यस्मै हविर्निरुप्यते अयमेव
सोऽग्निः । निपातमेव एते उत्तरे ज्योतिषी एतेन
नामधेयेन भजेते ॥ ५ (१८) ॥
इति सप्तमाध्यायस्य चतुर्थः पादः ॥७,४॥
अर्थ :- “इन्द्रं मित्रम्०” इस ऋचा का अस्यवाम
ऋषि है ।
( इममेव ) 'अग्निम्' इसी अग्नि को 'इन्द्रम्' इन्द्र
'मित्रम्' मित्र 'वरुणम्' वरुण 'आहुः' कहते हैं- [ तत्वविद्
पुरुष ]-इन्द्र, मित्र और वरुण आदि नामों से इस अग्नि
को ही कहते हैं-उन नामों से अग्नि के अतिरिक्त कोई दूसरा
अर्थ नही है । 'अथो' ( अपि च ) और भी ( यः अयम् )
जो यह 'दिव्यः' ( दिविजः ) द्युलोक में होने वाला = रहने
वाला 'सुपर्णः' (सुपतनः) सुन्दर पतन ( गमन ) करने वाला
'गरुत्मान्' (गरणवान्) स्तुतिओं वाला अथवा रसों को नि-
गलने वाला ( गुर्वात्मा = महात्मा ) अथवा गुरु आत्मा वाला
या महान् आत्मा आदित्य है यह भी 'सः वह अग्नि ही
है । [ बहुत क्या ? ] ( इममेव अग्नि महान्तम् आत्मानम् )
इसी महान् अग्नि आत्मा को 'एकम्' 'सत्' ( आत्मानम् )
एक होते हुये आत्मा को 'विप्राः' (मेधाविनः) अभेद भाव से
देखते हुए मेधावी ब्राह्मण 'बहुधा' बहुत प्रकार से 'वदन्ति
कहते हैं-'अग्निम्' अग्नि, 'यमम्' यम, 'मातरिश्वानम्' मात-
रिश्र्वा, (वायु) 'आहुः' कहते हैं मेधावी ब्राह्मण इसी अग्नि
महान् आत्मा को एक होते हुये को भी इन्द्र, मित्र, वरुण,
आदित्य, यम, और मातरिश्वा कहते है ॥

हिन्दी निरुक्त ( ७५ ) ७ अ० ४ पा० ५ ख०
“यस्तु०” किन्तु जो सूक्त को भजता है-सूक्तों में जिस
की प्राधान्य से स्तुति होती है और जिसके लिये हविः का
निर्वाप होता है, वह यही (पार्थिव अग्नि है, और ये दूसरे
(मध्यम उत्तम) ज्योति इस अग्नि नाम से निपात को ही
भजते हैं-उन में यह (अग्नि) नाम गौण रूपसे ही आता है
॥ ५ (१८) ॥
व्याख्या
अष्टधा व्याख्या । (१) अभिधान (देवता का नाम) ।
(२) अभिधेय (उस नामका मुख्य या प्रसिद्ध अर्थ) । (३)
अभिधानव्युत्पत्ति (उसी नाम की व्युत्पत्ति) । (४) प्राधा-
न्यस्तुति का उदाहरण (उस नाम से उस देवता की ऋचा)
(५) तन्निर्वचन (उस ऋचा की व्याख्या) । (६) विचार
(प्रश्नोत्तर) । (७) उपपत्ति (युक्ति) । (८) अवधारणा
(एक पक्ष की स्थिति) ।
‘अग्नि’ शब्द में अष्टधा व्याख्या का प्रदर्शन (१) ‘अग्नि’
यह अभिधान । (२) यह पार्थिव अग्नि मुख्य अर्थ । (३)
“अग्रणीर्भवति” यह ‘अग्नि’ नाम की व्युत्पत्ति । (४)
“अग्निमीळे०” यह ऋचा उदाहरण । (५) ‘अग्निं याचामि’
यह मन्त्र की व्याख्या । (६) “स न मन्येत अयमेव
अग्निः” (वह शिष्य न मानेगा यही अग्नि है) यह
विचार । (७) यस्तु सूक्तं भजते यस्मै हविर्निरुप्यते (जो सूक्त
को भजता हो, जिसके लिये हविः का निर्वाप हो) यह उप-
पत्ति । (८) “अयमेव अग्निः” (यही अग्नि ‘अग्नि’
शब्द का मुख्य अर्थ है) यह अवधारणा ।

हिन्दी निरुक्त ( ७६ ) ७ अ० ४ पा० ५ खं०
'अग्नि' पद के अर्थ में मतभेद ।
१-आत्मवित् के मत में 'अग्नि' आत्मा है । “ एकं
सद् विप्रा बहुधा वदन्ति ” [ऋ०सं० २,३,२२,६]
'एक होते हुए आत्म वस्तु को मेधावी ब्राह्मण बहुत प्रकार
से कहते हैं' यह मन्त्र दर्शन उनके मत में प्रमाण है ।
२-याज्ञिकों के मत में-जिसका कोई स्थान विशेष
माना हुआ नहीं, जिनका 'अग्नि' यह नाम ही जाना हुआ
है, ऐसा देवताविशेष लोक और वेद में प्रसिद्ध, कर्म का
अङ्ग 'अग्नि' शब्द का अर्थ है ।
३--नैरुक्त मतमें-जिसका यह पृथिवी लोक स्थान नियत
है, जिस का हविर्वहन आदि विशेष कर्म नियत है, जो
मध्यम उत्तम ज्योतियों से अन्य है, ऐसा यह पार्थिव अग्नि
'अग्नि' शब्द का अर्थ है ॥
नैरुक्त मत से प्रकरण का आरम्भ ।
क्योंकि नैरुक्त आचार्य तीन ही देवता मानते
हैं इससे आचार्य अपने मत के अनुसार ही इस प्रकरण का
आरम्भ करते हैं- “अग्निः पृथिवीस्थानस्तं प्रथमं
व्याख्यास्यामः” अग्नि पृथिवी स्थान का है, इससे पहिले
उसी को व्याख्यान करेंगे ।
निर्वचन का प्रयोजन ।
प्रायः देवताओं के जितने नाम हैं वे सब परोक्षवृत्ति हैं ।
मन्त्रों में जिन नामों से उनकी स्तुतियां आती है, उनमें स्तो-
ता ऋषि छिपाए हुये जैसे देवतात्तत्व को देखते हैं - जैसे कूट

हिन्दी निरुक्त ( ७७ ) ७ अ० ४ पा० ५ खं०
शब्दों में वक्ता का अभिप्राय गुप्तजैसा रहता है, और उसे उस
छिपे हुये अर्थ को देखते हुये प्रीति होती है-वैसे ही देवता-
ओं को अपने ऐसे कूट नामों से बहुत प्रीति है, और जो
प्रत्यक्षवृत्ति शब्द हैं, उनसे वे अप्रसन्न रहते हैं, “परोक्ष-
प्रिया इव हि देवाः प्रत्यक्षद्विषः” ‘परोक्षप्रिय जैसे,
प्रत्यक्षस्तुति के द्वेषी देवता होते हैं’ यह श्रुति है। क्योंकि-
देवतानाम सब परोक्षवृत्ति हैं, उनके निर्वचन से पुरुष को
आगम प्रमाणित देवता का सारूप्य मिलता है, इसी से
आचार्य “अग्निः कस्मात्” इस प्रश्न के द्वारा निर्वचन
को आरम्भ करते हैं। इसी प्रकार सब देवता पदों में उपोद्-
घात (प्रश्न) और उस के उत्तर की स्थापना देखना चाहिये।
किन्तु आत्मवित् पक्षमें सब नाम आत्मा के लिये ही हैं
इससे सब अवस्थाओं में अवस्थित आत्मा को सब नामों की
व्युत्पत्ति से निर्वचन करके यथार्थ रूपसे जानकर सर्वात्मा
आत्मा की सब अवस्थाओं की विभूतियों को अनुभव करता
है यह सब पदों की व्युत्पत्ति का प्रयोजन है। जैसे-कि-
स्मृति है-
“शब्दब्रह्मणि निष्णातः परब्रह्माधिगच्छति ।”
अर्थात् शब्द ब्रह्ममें निष्णात ( पारंगत ) होकर परब्रह्म को
प्राप्त होता है। इति ॥
“अग्निमीले”
देवताकाण्ड में तीनों लोकोंके देवताओं में पहिले पृथिवी
स्थान देवता हैं, और उनमें ‘अग्नि’ देवता प्रथमहै, उधर सबवेदों
में प्रथम ऋग्वेद है, और ऋग्वेद में भी सबसे पहिले अग्नि देवताका

हिन्दी निरुक्त ( ७८ ) ७ अ० ५ पा० १ खं०
ही ‘अग्निमीळे’ यह सूक्त है, यह देवता और उदाहरण
दोनों की योग्यता को बोधन करने के लिये आचार्य ने “अग्नि-
मीळे” यही उदाहरण दिया है, सम्पूर्ण निघण्टु और सम्पूर्ण
ऋग्वेद पर ध्यान देने से यह भी प्रतीत होता है कि-निघण्टु
की रचना का घनिष्ठ सम्बन्ध ऋग्वेद से ही है ॥
विचार की आवश्यकता
यद्यपि शब्द का मुख्य अर्थ एक ही होता है, तथापि
गौण अर्थों की संख्या नहीं है । शब्द के गौण अर्थों को भी
अल्प बुद्धि पुरुष मुख्य अर्थ मान बैठते हैं, इससे विचार की
आवश्यकता हुई । और इसी से अग्नि शब्द के मुख्य और गौण
अर्थों का विवेचन किया गया है ॥ ५ ( १८ ) ॥
इति हिन्दी निरुक्ते सप्तमाध्यायस्य
चतुर्थः पादः समाप्तः॥७ ४॥
अथ पञ्चमः पादः ।
( खं० १ )
(निघ०) जातवेदाः ॥ २ ॥
(निरु०) जातवेदाः कस्मात् ।
जातानि वेद ।
जातानि वा एनं विदुः ।
जाते जाते विद्यते इतिवा ।
जातवित्तो वा जातधनः ।
जातविद्योवा जातप्रज्ञानः ।

हिन्दी निरुक्त ( ७६ ) ७ अ० । पा० १ खं०
“यत्तज्जातः पशूनविन्दत इति तज्जातवेदसो
जातवेदस्त्वम्”-इति ब्राह्मणम् । “तस्मात्सर्वा-
नृतून् पशवोऽग्निमभिमर्पन्ति”-इति च ।
तस्य एषा भवति—॥ १ (१९) ॥
अर्थ :-‘जातवेदाः’ (२) [ नैरुक्त मत में माहाभाग्य से
अथवा कर्म के भेद से यह अग्नि ही है । याजक मत में नाम
के भेदसे और स्तुति के भेदसे दूसरा कोई देवता है । ] क्यों?
“जातानि वेद” वह जातों ( उत्पत्ति वालों ) को
जानता है संसार में कोई ऐसी वस्तु नहीं है, जिसे वह न
न जानता हो,—अर्थात् सर्वज्ञ है ।
“जातानि वा” अथवा जात = जो हैं, वे सब इसे
जानते हैं । ( इन दोनों व्युत्पत्तिओं में ‘जात’ शब्द पूर्व पद
और ज्ञानार्थ ‘विद्’ ( अदा० प० ) धातु उत्तर पद है ।
पहिली व्युत्पत्ति पे सबका ज्ञाता और दूसरी में सबका
ज्ञेय है । )
“जाते जाते” अथवा जात जात में विद्यमान है, इस
से ‘जातवेदस्’ है । [ इस में ‘जात’ शब्द पूर्व और सत्ताथंक
‘विद्’ (दि०आ०) धातु उत्तर पद है । ]
“जातविद्यो वा०” अथवा इसको विद्या हुई हुई है
इसे सब वस्तुओं का प्रज्ञान होगया है । [ इस पक्ष में ‘जात’
शब्द पूर्व और ज्ञानार्थ ‘विद्’ ( अदा० प० ) धातु से उत्तर
पद है । ]
“यत्तज्जान.०” जो कि- वोह उत्पन्न होता हुआ

हिन्दी निरुक्त ( ८१ ) ७ अ० ५ पा० ३ खं०
प्रहिणुत जातवेदसं कर्मभिःअभ्रनुवानम्, अपि
वा उपमार्थे स्यात्-अश्वमिव जातवेदसम्-इति ।
इदं नो बर्हिः आसीदतु-इति ।
तदेतद् एकमेव जातवेदसं गायत्रं तृचं दश-
तयीषु विद्यते यत्तु किञ्चिद् आग्नेयं तद् जात-
वेदसानां स्थाने युज्यते ।
म न मन्येत अयमेवाग्निः-इति, अपि-एते उत्तरे
ज्योतिषी जातवेदसी उच्येते । ततो नु मध्यमः ।
“अभिप्रवन्त समनेव योषाः०” इति तत् पुर-
स्ताद् व्याख्यातम् [ ७, ४, ४ ]
अथामौ आदित्यः-
“उदुत्यं जातवेदसम्०,. इति तद् उपरिष्टाद्
व्याख्यास्यामः [ १२, २, ४ ]
यस्तु सूक्तं भजते यस्मै हविर्निरुप्यते अयमेव
सोऽग्निर्जातवेदाः, निपातमेव उत्तरे ज्योतिषी
एतेन नामधेयेन भजेते ॥ ३ ( २० ) ॥
इति सप्तमाध्यायस्य पञ्चमः पादः ॥ ७,५ ॥
अर्थ :-“जातवेदसे०,, ।
· · ( वयं ) “जातवेदसे सोमंसुनवाम” हम जातवेदस्
(अग्नि) के लिये सोम का सवन करते हैं -सोम को निचो-

हिन्दी निरुक्त ( ८२ ) ७ अ० ५ पा० ३ ख०


ड़ते हैं। “वेदः अरातीयतः निदहति” ज्ञानवान्
( जातवेदाः ) हमसे शत्रुता करने वालों को भस्म करता है।
“सः नः दुर्गाणि पर्षदति” वह ( जातवेदाः ) हमें दुर्गम
स्थानों से लंघावे “अग्निः नावा सिन्धुमिव विश्वा
( विश्वानि ) दुरिता ( दुरितानि ) अतितारयति”
अग्नि देव ( हमें ) नौका से नदी के समान सब पापों से उतारे।
यहां भाष्य अस्पष्ट है। भगवद्दुर्गाचार्य की टीका में यह मन्त्र
और इसका भाष्य दोनों नहीं हैं॥ “तस्य०” उस ( जात-
वेदस् ) की यह और ऋचा है—॥२॥

( खं० ३ )

अर्थः—प्रनूनं जातवेदसम्०” इस ऋचा का श्येन अग्नि-
पुत्र ऋषि। गायत्री छंदः।
( हे स्तोतारः ) यूयम् ऊच्यध्वे ) हे स्तुति करने वालो तुम से
कहा जाता है-- ‘नूनम्’ निश्चयही तुम सब ‘अश्वम्’ (कर्मभिः
समश्नुवानम् ) कर्मों के द्वारा सब जगत् को व्यापन करने वाले
( अपिवा उपमार्थे स्यात् ) अथवा उपमा अर्थ में हो-- अश्व-
मिव अश्व के समान ‘वाजिनम्’ ( अन्नवन्तम् ) अन्नवाले
‘जातवेदसम्’ जातवेदा ( अग्नि ) को ‘प्रहिनोत’ ( प्रहिणुत)
प्रेरणा करो। “इदम् नः बर्हिः आसदे” (आसीदतु) इस
हमारी बिछाई हुई कुशा पर ( वह जातवेदा ) बैठे॥
‘तदेतद्०’ सो यह एक ही जातवेदस् देवका गायत्री छन्द
में तृच ( तीनऋचाओं का सूक्त) दश मण्डल के ऋग्वेद में है।

किन्तु जो कुछ मन्त्रजात अग्नि देवता का है, वह सब जातवेदस्
देवके मन्त्रों के स्थानमें प्रयोग किया जाता है पढा जाता है॥
आक्षेप । “सनमन्येत०” वह (शिष्य) न मानेगा कि यही
(पार्थिव) अग्नि जातवेदाः है। क्यों कि ये और भी दूसरे (मध्यम
उत्तम) दोनो ज्योतिएं जातवेदस् कही जाती हैं।
“ततोऽनुमध्यमः” तिस कारण पहिले “मध्यम है” इस के
अनुसार ऋचा है—
“अभिप्रवन्त समनेव योषाः” यह ऋचा पहिले
व्याख्यान की जा चुकी है (७,४,४)। इस ऋचामें जातवेदा
को जलधाराओं का सेवन करने वाला कहा गया है, और वह
मध्यम ही होसकता है किन्तु यह पार्थिव अग्नि नहीं ॥
अब “वोह आदित्य है” इसके अनुसार ऋचा—
“उदुत्यं जातवेदसम्० यह है। इस की व्याख्या आगे
होगी [१२, २, ४] इस मन्त्र में “जातवेदसम्” यह पद
“सूर्यम्” पदका विशेषण है, इससे जातवेदस् उत्तम ज्योति
है; यह सिद्ध होता है ॥
उत्तर “यस्तु सूक्तं भजते०” किन्तु जो सूक्त को भजता
है, और जिस के लिए हविः का निर्बाप होता है, वह यही
पार्थिव अग्नि जातवेदाः है। दूसरे (मध्यम उत्तम) ज्योतिएं
इस नामसे निपात का ही भजन करती हैं— उनका यह (जात-
वेदस्) गौण नाम है, किन्तु मुख्य नहीं ॥ ३ (२०) ॥
इति हिन्दी निरुक्ते सप्तमाध्यायस्य पञ्चमः पादः ॥ ७, ५ ॥