निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ७० ) ७ अ० ४ पा० ४ खं०
'आ-वक्षति' (आवहतु) बुलावे या लावे । 'इति' ऐसे उदाहरण
इस पार्थिव अग्नि के होंगे, यह आचार्य दिखाते हैं ॥
जिस प्रकार 'अग्नि' शब्द पार्थिव ज्योति में मिलता है
उसी प्रकार मध्यम और उत्तम ज्योतियों में भी उपलब्ध होता
है, इस कारण यह संकीर्ण (सांकर्ययुक्त = साधारण) शब्द
है, इसीसे यहां इस विषय का विचार आरम्भ होता है-
“स न मन्येत०” इत्यादि । वह (शिष्य) न मानेगा-
यही (पार्थिव) अग्नि है-इस 'अग्नि' शब्द को मुख्य अर्थ
यही पृथिवी का प्रसिद्ध अग्नि है, यह न मानेगा, [क्योंकि-
और भी ये दूसरी ज्योतिएं = मध्यम उत्तम ज्योतिएं 'अग्नि'
कहलाती हैं ।
“ततो नु मध्यमः” 'नु' शब्द वितर्क अर्थ में है ।
देखो ! तिस वक्ष्यमाण या दिखाई जाने वाली ऋचा के प्रा-
माण्य से अग्नि शब्द का वाच्य मध्यम ज्योति होता है-
॥ ३ (१६) ॥
(खं० ४)
(निरु०-) “अभिप्रवन्त समनेव योषाः कल्याण्यः
स्मयमानासो अग्निम् । घृतस्य धाराः समिधो
नसन्त ता जुषाणो हर्य्यति जातवेदाः ॥”
[ऋ० सं० ३, ८, ११, ३]
अभिनमन्त समनस इव योषाः । समनं समन-
नाद् वा । सम्मानाद् वा । कल्याण्यः स्मय-
मानाः ।