निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ८२ ) ७ अ० ५ पा० ३ ख०
ड़ते हैं। “वेदः अरातीयतः निदहति” ज्ञानवान्
( जातवेदाः ) हमसे शत्रुता करने वालों को भस्म करता है।
“सः नः दुर्गाणि पर्षदति” वह ( जातवेदाः ) हमें दुर्गम
स्थानों से लंघावे “अग्निः नावा सिन्धुमिव विश्वा
( विश्वानि ) दुरिता ( दुरितानि ) अतितारयति”
अग्नि देव ( हमें ) नौका से नदी के समान सब पापों से उतारे।
यहां भाष्य अस्पष्ट है। भगवद्दुर्गाचार्य की टीका में यह मन्त्र
और इसका भाष्य दोनों नहीं हैं॥ “तस्य०” उस ( जात-
वेदस् ) की यह और ऋचा है—॥२॥
( खं० ३ )
अर्थः—प्रनूनं जातवेदसम्०” इस ऋचा का श्येन अग्नि-
पुत्र ऋषि। गायत्री छंदः।
( हे स्तोतारः ) यूयम् ऊच्यध्वे ) हे स्तुति करने वालो तुम से
कहा जाता है-- ‘नूनम्’ निश्चयही तुम सब ‘अश्वम्’ (कर्मभिः
समश्नुवानम् ) कर्मों के द्वारा सब जगत् को व्यापन करने वाले
( अपिवा उपमार्थे स्यात् ) अथवा उपमा अर्थ में हो-- अश्व-
मिव अश्व के समान ‘वाजिनम्’ ( अन्नवन्तम् ) अन्नवाले
‘जातवेदसम्’ जातवेदा ( अग्नि ) को ‘प्रहिनोत’ ( प्रहिणुत)
प्रेरणा करो। “इदम् नः बर्हिः आसदे” (आसीदतु) इस
हमारी बिछाई हुई कुशा पर ( वह जातवेदा ) बैठे॥
‘तदेतद्०’ सो यह एक ही जातवेदस् देवका गायत्री छन्द
में तृच ( तीनऋचाओं का सूक्त) दश मण्डल के ऋग्वेद में है।