सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 849, कुल 1282 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 849

हिन्दी निरुक्त ( ७६ ) ७ अ० । पा० १ खं०
“यत्तज्जातः पशूनविन्दत इति तज्जातवेदसो
जातवेदस्त्वम्”-इति ब्राह्मणम् । “तस्मात्सर्वा-
नृतून् पशवोऽग्निमभिमर्पन्ति”-इति च ।
तस्य एषा भवति—॥ १ (१९) ॥
अर्थ :-‘जातवेदाः’ (२) [ नैरुक्त मत में माहाभाग्य से
अथवा कर्म के भेद से यह अग्नि ही है । याजक मत में नाम
के भेदसे और स्तुति के भेदसे दूसरा कोई देवता है । ] क्यों?
“जातानि वेद” वह जातों ( उत्पत्ति वालों ) को
जानता है संसार में कोई ऐसी वस्तु नहीं है, जिसे वह न
न जानता हो,—अर्थात् सर्वज्ञ है ।
“जातानि वा” अथवा जात = जो हैं, वे सब इसे
जानते हैं । ( इन दोनों व्युत्पत्तिओं में ‘जात’ शब्द पूर्व पद
और ज्ञानार्थ ‘विद्’ ( अदा० प० ) धातु उत्तर पद है ।
पहिली व्युत्पत्ति पे सबका ज्ञाता और दूसरी में सबका
ज्ञेय है । )
“जाते जाते” अथवा जात जात में विद्यमान है, इस
से ‘जातवेदस्’ है । [ इस में ‘जात’ शब्द पूर्व और सत्ताथंक
‘विद्’ (दि०आ०) धातु उत्तर पद है । ]
“जातविद्यो वा०” अथवा इसको विद्या हुई हुई है
इसे सब वस्तुओं का प्रज्ञान होगया है । [ इस पक्ष में ‘जात’
शब्द पूर्व और ज्ञानार्थ ‘विद्’ ( अदा० प० ) धातु से उत्तर
पद है । ]
“यत्तज्जान.०” जो कि- वोह उत्पन्न होता हुआ