निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ७२ ) ७ अ० ४ पा० ४ खं०
(भ्वा० प०) धातु आप्नोति के अर्थ (प्राप्ति) में है, या 'नम'
नमस्कार करना = झुकना) (भ्वा० प०) धातु के अर्थ-
में है । 'ताः' उन जल धाराओं को जुषाणः, सेवन करता हुआ
या प्यार करता हुआ 'जातवेदाः' (वैद्युतोऽग्निः) मध्यम-
स्थान का वैद्युत अग्नि 'हर्यति' (विहर्य्यति) विहार करता
है या कामना करता है । 'हर्य' (भ्वा० प०) धातु प्रेप्सा या
अति इच्छा अर्थ में है ॥
व्याख्या
“अभिप्रवन्त०” मन्त्र में घृतधारा उदक धारा ही हैं।
क्योंकि एक पति के संमुख अनेक योषायों के समान मध्यम
ज्योति के प्रति अनेक जलधाराओं के ही जानेका संभव है ।
घृत की हवनाहुतिएं अग्नि में मन्त्र के साथ एक २ करके
क्रमसे दीजाती हैं, इस से घृतधाराओं के स्वीकार में उपमान
उपमेय भाव नहीं बन सकता । इसीसे यहाँ अग्नि पदसे मध्यम
ज्योति (वैद्युतअग्नि) ही उक्त होता है इसी सामर्थ्य को लेकर
जलके नामों में “घृत” नाम पढ़ा है ॥
'समन' कैसे ? समनन से—'सम्' (उप०) 'अन' प्राणने
(अदा० प०) धातु से है। अथवा संमानन से—'सम्' (उप०)
'मन' अवबोधने (त०आ०) धातु से है ॥
'अग्नि' शब्द से उत्तम ज्योति के ग्रहण में निगम-
अर्थः- “समुद्रादूर्मिः०” अर्थात्-समुद्र या जल के समूह
से ऊर्मि या अपने प्रकाश से सब जगत् को ढांपने वाला मधु-
मान् (जलवाला) आदित्य 'उदारत्' नित्य २ उदय होता है।