निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ७८ ) ७ अ० ५ पा० १ खं०
ही ‘अग्निमीळे’ यह सूक्त है, यह देवता और उदाहरण
दोनों की योग्यता को बोधन करने के लिये आचार्य ने “अग्नि-
मीळे” यही उदाहरण दिया है, सम्पूर्ण निघण्टु और सम्पूर्ण
ऋग्वेद पर ध्यान देने से यह भी प्रतीत होता है कि-निघण्टु
की रचना का घनिष्ठ सम्बन्ध ऋग्वेद से ही है ॥
विचार की आवश्यकता
यद्यपि शब्द का मुख्य अर्थ एक ही होता है, तथापि
गौण अर्थों की संख्या नहीं है । शब्द के गौण अर्थों को भी
अल्प बुद्धि पुरुष मुख्य अर्थ मान बैठते हैं, इससे विचार की
आवश्यकता हुई । और इसी से अग्नि शब्द के मुख्य और गौण
अर्थों का विवेचन किया गया है ॥ ५ ( १८ ) ॥
इति हिन्दी निरुक्ते सप्तमाध्यायस्य
चतुर्थः पादः समाप्तः॥७ ४॥
अथ पञ्चमः पादः ।
( खं० १ )
(निघ०) जातवेदाः ॥ २ ॥
(निरु०) जातवेदाः कस्मात् ।
जातानि वेद ।
जातानि वा एनं विदुः ।
जाते जाते विद्यते इतिवा ।
जातवित्तो वा जातधनः ।
जातविद्योवा जातप्रज्ञानः ।