निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ७३ ) ७ अ० ४ पा० ५ खं०
[ यद्यपि इस मन्त्र में 'अग्नि' शब्द नहीं, तथापि कोई शा-
खावालों के सूक्त में “इमं स्तनम्०” इस ऋचा में “अपा
प्रपीनमग्ने०” यह 'अग्नि' शब्द है, इस से यह निगम साधु
है । ] यहां आदित्य को उक्त (कहा गया) मानते हैं ॥
“समुद्राद्ध्येषोदूह्यतः” यह आदित्य अग्नि समुद्र के
जलों से उदय होता है । यह ब्राह्मण है । [ समुद्र से पार्थिव
अग्नि के उदय होने का संभव नहीं इसी से यहां अग्नि आ-
दित्य ही है । ]
“अथापि०” और भी ब्राह्मण है— “अग्निः सर्वा
देवताः” अर्थात्-अग्नि सब देवता हैं ॥
“तस्य०” उस ( ब्राह्मण वाक्य ) के अगली ऋचा बहुत
निर्वचन के लिये है-उसका अर्थ अगली ऋचा में स्पष्टरूप से
वर्णन किया हुआ है ॥ ४ ( १७ ) ॥
( खं० ५ )
(निरु०) “इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहुरथो दिव्यः
ससुपर्णो गरुत्मान् । एकं सद् विप्रा बहुधा वद-
न्त्यग्निं यमं मातरिश्वानमाहुः ॥” [ऋ०सं०२·३,२२,६]
इममेव अग्निं महान्तम् आत्मानम् एकम् आ-
त्मानं बहुधा मेधाविनो वदन्ति—इन्द्रं मित्रं
वरुणम् अग्निं दिव्यं च गरुत्मन्तम् ।
‘दिव्यः’ दिविजः ।
‘गरुत्मान्’ गरणवान् । गुर्वात्मा । महात्मा-इतिवा।