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सर्वकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 839, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 839

[Header] हिन्दी निरुक्त ( ६६ ) ७ अ० ४ पा० ३ खं०

वाला 'रत्नधा' (सायणः) अति 'रत्नधा', 'रत्नधातम'
होता है।
“तस्य एषा०” उस (अग्नि) की यह और ऋचा है
२ (१५)”
(खं० ३)
(निरु०-) “अग्निः पूर्वेभि ऋषिभिरीड्यो
नूतनैरुत। स देवान् एह वक्षति” ॥ [ ऋ० सं०
१, १, २ ]॥
अग्निर्यः पूर्वैः ऋषिभिः इडितव्यो वन्दितव्योऽ-
स्माभिश्च नवतरैः । स देवान् इह आवहतु-इति ॥
स न मन्येत- अयमेव अग्निः इति। अपि
एते उत्तरे ज्योतिषी अग्नी उच्येते। ततो नु
मध्यमः ॥ ३ ( १६ ) ॥
अर्थ.- “अग्निः पूर्वेभिः०” इस ऋचा का पूर्व ऋचा
के समान ही ऋषि छंद और विनियोग है।
‘तद्’ (उस) शब्द की अपेक्षाबल से भाष्यकार ने ‘यद्’
(जिस या जो) शब्द का अध्याहार किया है- (यः) जो
(अग्निः) अग्नि देव ‘पूर्वेभिः’ (पूर्वैः) पूर्व ‘ऋषिभिः’
ऋषियों से ‘ईड्यः’ (ईडितव्यः = वन्दितव्यः) स्तुति करने
योग्य है, ‘नूतनैः’ (उत) (अस्माभिश्चनवतरैः) और हम
बहुत नए ऋषियों से जो स्तुति करने योग्य है, ‘सः’ वह
(अग्नि देव) ‘इह’ हमारे इस यज्ञ में ‘देवान्’ देवताओं को